बहुत गहरी हैं दलित विरोधी मानसिकता की जड़ें
उत्तराखंड के हल्द्वानी रामलीला मैदान में गत 8 अगस्त को कांग्रेस पार्टी द्वारा ‘विजय शंखनाद रैली’ का आयोजन किया गया था। इस रैली को मुख्य रूप से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने संबोधित किया था। इसके बाद 11 अगस्त को उसी मंच पर ‘श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास’ नाम के संगठन से जुड़े कुछ लोगों ने मंच पर गंगाजल छिड़का, उसकी सफाई की और हवन यज्ञ किया। इसे ‘शुद्धिकरण’ आयोजन का नाम दिया गया। इसके बाद कांग्रेस ने इसे दलित अपमान के रूप में मुद्दा बनाया। स्वयं मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुये भावुक होकर कहा कि ‘इस शुद्धिकरण ने मुझे छुआछूत के डंक का अहसास कराया है और मेरा गहरा अपमान किया है। मैं एक दलित समाज से आता हूँ, इसलिए भाजपा विचारधारा के लोगों ने यह कृत्य किया’। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी इसे सीधे तौर पर दलित समाज का अपमान और संविधान विरोधी मानसिकता करार दिया।
राहुल गांधी ने आरोपियों के खिलाफएससी/एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न शहरों व ज़िलों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस घटना के विरोध में जमकर प्रदर्शन किए और सचिवालय कूच किया। युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां और उसके अनेक पन्ने जलाये। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह लड़ाई दो विचारधाराओं के बीच है। एक विचारधारा डा. भीमराव अंबेडकर के संविधान की है, जबकि दूसरी भाजपा और आरएसएस की है जो मनुस्मृति के आधार पर देश चलाना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि खड़गे के भाषण के बाद मंच को अपवित्र मानकर गंगाजल से उसका शुद्धिकरण करना देश के करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों व उनकी अस्मिता का अपमान है। नागपुर स्थित संघ के केंद्रीय मुख्यालय के बाहर भी मनुस्मृति जलाकर विरोध दर्ज कराया गया। गोया ‘शुद्धिकरण’ की इस घटना को लेकर उपजा राजनीतिक विवाद इस समय देश के सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दों में से एक बन गया है।
देश में इस तरह के कई ऐसे ‘हाई प्रोफाइल’ मामले सार्वजनिक होते हैं जो संघ व भाजपा से जुड़े नेताओं की दलित विरोधी मानसिकता को उजागर करते रहते हैं। दलित कार्यकर्ता, लेखक और पत्रकार भंवर मेघवंशी को ही देख लीजिये। उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में 1987 में आरएसएस की शाखा में जाना शुरू किया था। मेघवंशी संगठन में भीलवाड़ा के ज़िला प्रमुख के पद तक पहुंचे और 1990 के राम जन्मभूमि आंदोलन में एक सक्रिय कारसेवक के रूप में भी भाग लिया। परन्तु ऐसे समर्पित स्वयंसेवक को जातिगत भेदभाव के कारण हमेशा के लिए संघ से नाता तोड़ना पड़ा। संघ छोड़ने के मुख्य कारणों को उन्होंने अपनी चर्चित आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ में बयान किया है।
उन्होंने लिखा है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी उनके गृह ज़िले भीलवाड़ा (राजस्थान) आए, तो उन्होंने बड़े उत्साह से अपने घर पर भोजन तैयार करवाया। परन्तु संघ के वरिष्ठ ‘सवर्ण’ नेताओं ने उनके घर आकर भोजन करने से यह कहते हुये साफ इन्कार कर दिया कि वे समय की कमी के कारण भोजन पैक करवाकर साथ ले जा रहे हैं। बाद में संघ के उन्हीं ‘सवर्ण’ नेताओं ने उनके घर का बना वह भोजन खाया नहीं, बल्कि उसे एक नाली में फेंक दिया। इस घटना से उन्हें यह एहसास हुआ कि हिंदू राष्ट्र की बात करने वाले संगठन में आज भी छुआछूत और भेदभाव कायम है। उन्होंने अपना व्यक्तिगत अनुभव सांझा करते हुये लिखा कि आरएसएस के भीतर एक आंतरिक ब्राह्मणवादी पदानुक्रम काम करता है। दलित होने के कारण ही उन्हें संघ का ‘प्रचारक’ बनने का दर्जा भी नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी महसूस किया कि संघ की शाखाओं और बौद्धिकों में अन्य धर्मों विशेषकर अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत का भाव भरा जाता है। उन्हें लगने लगा कि संगठन समाज को जोड़ने के बजाय वैचारिक रूप से विभाजित कर रहा है जो उनकी खुद की अंतरात्मा को स्वीकार नहीं था। उन्हें यह एहसास हुआ कि संघ में रहकर जिस ‘हिंदू राष्ट्र’ और समानता के दावे के लिए वे लड़ रहे थे, उसमें एक दलित के रूप में उनकी सामाजिक हैसियत को स्वीकार नहीं किया जा रहा था।
इन अपमानजनक घटनाओं और भेदभाव को इस तरह भी समझा जा सकता है कि गांवों और अर्ध-शहरी इलाकों में दलितों को उनकी सामाजिक स्थिति का एहसास कराने के लिए कई अमानवीय प्रथाओं और पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरणत: कई राज्यों में दलित दूल्हे द्वारा शादी में घोड़ी चढ़ने या सज-धज कर बारात निकालने पर सवर्णों द्वारा हमला या पत्थरबाज़ी की जाती है। दलित युवाओं द्वारा मूंछ रखने, महंगे जूते पहनने, अथवा सवर्णों के सामने पैर पर पैर रखकर बैठने पर मारपीट और जानलेवा हमलों की घटनाएं प्रकाश में आती रही हैं। अनेक सार्वजनिक कुओं, हैंडपंपों, तालाबों या मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर आज भी हिंसक टकराव होते हैं। शिक्षण संस्थानों तक में दलित छात्र जातिगत पूर्वाग्रहों और अपमान का शिकार होते हैं। कई सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों को भोजन की कतार में अलग बैठाने, उनके द्वारा बनाए गए भोजन को सवर्ण बच्चों द्वारा न खाने, या उन्हें अलग बर्तनों में खाना देने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। कई बार दलित छात्रों को पढ़ाई के बजाय स्कूल या कॉलेज के शौचालय और परिसर साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है। आईआईटी, एम्स, और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों या सहपाठियों द्वारा योग्यता पर सवाल उठाने और जातिसूचक टिप्पणियों के कारण कई मेधावी दलित छात्रों को आत्महत्या तक के लिए मजबूर होना पड़ा है। दलित महिलाएं लैंगिक और जातिगत दोनों स्तरों पर दोहरे शोषण का शिकार होती हैं।
हाथरस और खैरलांजी जैसी ऐतिहासिक और भयावह घटनाओं से लेकर रोज़मर्रा की अनेक घटनाओं तक दलित महिलाओं को डराने, दबाने और पूरे दलित समुदाय को ‘सबक सिखाने’ के लिए यौन हिंसा को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आम मामलों की तुलना में दलित महिलाओं के साथ हुए यौन अपराधों में दोषियों को सज़ा मिलने की दर बेहद कम अर्थात करीब 2 प्रतिशत से भी कम रहती है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर पुलिस और व्यवस्था में रसूखदार लोगों का प्रभाव होता है।



