बिश्केक में मोदी ने विश्व को दिये कई संदेश
ईरान से चल रहे युद्ध को लेकर अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इतने कुंठित हो गये हैं कि उन्होंने जंग का एक नया मैदान खोज निकाला है— आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दायरा, जिसमें वह की-बोर्ड की मदद से ईरान के तेल टर्मिनल नष्ट कर रहे हैं, त्वरित सैन्य विजय घोषित कर रहे हैं और असहज प्रश्नों को संपादित कर रहे हैं। 30 अगस्त, 2026 की रात को उन्होंने एआई की मदद से बनाया गया वीडियो पोस्ट किया, जिसमें ईरान के स्ट्रेटेजिक खड़ग द्वीप को नष्ट होते हुए दिखाया गया है और ट्रम्प कह रहे हैं कि महत्वपूर्ण तेल हब को ‘चकनाचूर कर दिया गया है’। वीडियो में विस्फोट व बर्बादी दिखायी गई, जिसके बारे में रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, हालांकि लगभग एक माह की तनावपूर्ण शांति के बाद अमरीका व ईरान ने एक दूसरे के ठिकानों पर निशाने साधे हैं और यूएई व जॉर्डन को भी निशाना बनाया गया है। पेंटागन ने खड़ग द्वीप पर किसी भी हमले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन ट्रम्प को यह घोषणा करने से कोई नहीं रोक सका कि ईरान असफल देश है और उसके ‘समर्थन में केवल अमरीकी फेक न्यूज़ हैं’ जो अमरीका की महान विजय को मानने से इंकार करती हैं। ट्रम्प के मुताबिक ‘ईरान तो मर चुका है’। दूसरी ओर रूस व यूक्रेन की जंग भी बंद होने का नाम नहीं ले रही है।
इस पृष्ठभूमि में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन व ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन से अलग-अलग द्विपक्षी मुलाकातें करते हुए अपने शांति संदेश को पुन: दोहराया और कहा कि अब इस अनंत युद्ध का अंत करने का समय आ गया है। गौरतलब है कि मोदी अन्य विश्व नेताओं के साथ किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हैं, एससीओ के राज्य प्रमुखों के सम्मेलन के लिए। सम्मेलन के हाशिये पर मोदी ने पुतिन व पेज़ेशकियन से अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। पुतिन से उन्होंने कहा कि मानवता की खातिर अनंत युद्ध पर विराम लगाया जाये। इसके अतिरिक्त दोनों नेताओं ने ऊर्जा, रक्षा, इनोवेशन, स्पेस, खाद और पीपल-टू-पीपल सम्पर्क के क्षेत्रों में सहयोग को विस्तृत करने पर फोकस किया।
ज़ाहिर है, मोदी व पुतिन की वार्ता से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों नेता नई दिल्ली व मास्को के बीच व्यापारिक संबंधों को मज़बूत करने के पक्ष में हैं। इससे क्या नई दिल्ली व वाशिंगटन के संबंध प्रभावित होंगे? यह प्रश्न इस लिहाज़ से प्रासंगिक है कि अमरीकी सीनेट ने 7 अगस्त 2026 को एक विधेयक 86-11 के प्रभावी अंतर से पारित किया, जिसका नाम बदलकर अब लिंडसे ओ ग्राहम सेंशनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑ़फ 2026 कर दिया गया है और जिसके तहत भारत व चीन आदि देशों पर अमरीका 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकता है; क्योंकि ये रूस के पेट्रोलियम उत्पाद के मुख्य खरीदार हैं। अमरीका का तर्क है कि इस खरीदारी के चलते ही रूस यूक्रेन पर युद्ध जारी रखे हुए है। गौरतलब है कि इज़रायल की विस्तारवादी नीति के कट्टर समर्थक लिंडसे ग्राहम का विचार था कि रूस को नियंत्रित करने और यूक्रेन युद्ध को बंद करवाने के लिए आवश्यक है कि जो देश रूस के पेट्रोलियम उत्पाद खरीदते हैं, उन पर भारी-भरकम टैरिफ लगाया जाये। रिपब्लिकन सीनेटर ग्राहम की हाल में मृत्यु (11 जुलाई, 2026) के बाद इस बाईपार्टीजन (दो पार्टियों द्वारा समर्थित) विधेयक को सीनेट में पारित कराने में अधिक बल दिया गया और सम्मान स्वरूप विधेयक में भी उनका नाम जोड़ दिया गया। विधेयक का एक रिपब्लिकन और 10 डेमोक्रेट्स सदस्यों ने विरोध किया।
हालांकि यह विधेयक 31 अगस्त 2026 को हाउस ऑ़फ रिप्रेजेंटेटिव में पेश कर दिया गया, लेकिन इस लेख के लिखे जाने तक इस सदन में उस पर मतदान होना शेष था। इस विधेयक के पारित होने से ट्रम्प को यह छूट मिल जाती है कि वह उन देशों के सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगायें जो रूसी तेल व गैस आयात करते हैं। वर्तमान में रूसी तेल व गैस को आयात करने वाले टॉप पांच देश हैं— चीन, भारत, अज़रबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया। रूस पर पाबंदियों के अतिरिक्त इस विधेयक की अवधि का विस्तार 2031 तक रहेगा, जोकि ईरान पर पाबंदी कानून, 1996 की एक्सपायरी डेट है। ईरान एक्ट से उन कम्पनियों पर जुर्माना लगाया जाता है, जो ईरान के ऊर्जा सेक्टर में निवेश करती हैं। यहां यह याद दिलाना भी आवश्यक है कि हाल ही में वाइट हाउस भारत पर यह आरोप लगाते हुए कि वह उन प्रथाओं का उल्लंघन कर रहा है, जिन्हें वाशिंगटन फेयर ट्रेड प्रैक्टिस (निष्पक्ष व्यापार) समझता है, ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें उसने भारत सहित 40 देशों पर अमरीकी टैरिफ से बचने के लिए चीन की मदद करने का आरोप लगाया है।
इससे ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीका भारत के विरुद्ध टैरिफ में अतिरिक्त वृद्धि करने जा रहा है, जिसका नई दिल्ली व वाशिंगटन के बीच जो व्यापार समझौता संभावित है उस पर भी गहरा असर पड़ सकता है। नई दिल्ली व वाशिंगटन के संबंध इस लिहाज़ से भी प्रभावित हो सकते हैं कि बिश्केक में पेज़ेशकियन के साथ द्विपक्षीय मुलाकात में मोदी ने नौपरिवहन व वाणिज्य में आज़ादी पर बल देते हुए कहा कि किसी भी सूरत में नागरिकों व नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। मोदी ने यह इच्छा व्यक्त करते हुए कि ‘आने वाले समय में’ भारत ईरान के साथ ट्रेड बास्केट में ‘विस्तार व विविधता’ चाहता है, कहा कि पश्चिम एशिया का टकराव बातचीत व डिप्लोमेसी से हल किया जाना चाहिए। बाद में मोदी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, ‘राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन से मुलाकात के दौरान भारत की ईरान के साथ विविध सेक्टर्स में लम्बी दोस्ती को मज़बूत करने के हमारे कमिटमेंट को दोहराया। ...भारत स्थायी शांति के लिए सभी प्रयासों का समर्थन करेगा।’
मोदी का यह कहना एकदम सही है कि ‘युद्ध में गुज़ारा गया प्रत्येक दिन मानवता को पीछे धकेल देता है और शांति की ओर बढ़ाया गया हर कदम मानवता को नई उम्मीद व उत्साह से भर देता है’। लेकिन शांति के इन उपदेशों से किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही है। वर्ष 2024 में अपनी मास्को और फिर कीव यात्राओं के दौरान भी मोदी ने कहा था कि ‘जंग के मैदान पर कोई समाधान नहीं निकलता है’। यह बात भी सही थी कि हल के लिए आखिरकार वार्ता की मेज़ पर ही आना पड़ता है। लेकिन जंग तो अभी तक जारी है। बहरहाल, बिश्केक में मोदी के बयानों का सही अर्थ तभी सामने आ सकता है जब शब्दों के पर्दे में कही गई बातों को समझ लिया जाये।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



