पीड़ा और व्यंग्य

पीड़ा का व्यंग्य से भला क्या संबंध हो सकता है? पीड़ा का आंसुओं से संबंध होता है, चीखों से संबंध होता है, विलाप से संबंध होता है, लेकिन आप कहते हैं, आज की बदलती दुनिया में पीड़ा का व्यंग्य से भी संबंध हो गया है। जी नहीं, यह दूर की कौड़ी नहीं है जनाब! जब आंसू बहेंगे, चीत्कार होगा, विलाप होगा, तो उसके कारणों की ओर जाइए। कहीं न कहीं किसी शोषक, मनोवृत्ति के आदमी ने ऐसी विसंगत स्थिति पैदा कर दी है, कि उसमें कुचला जाता हुआ आदमी जो विलाप करता है, और बहुमंज़िली इमारत पर शीर्ष हो गया कोई बड़ा आदमी अपनी जीत पर जो ठहाका लगाकर हंसता है, वही व्यंग्य है। ऐसा सदियों से हो रहा है और सदियों से इस विरोधाभासी स्थिति पर ऐसे ही व्यंक्य लिखे जा रहे हैं।
चार्ली चैपलिन की याद आती है। भूख लगने पर वह जूता उबाल कर खा रहे हैं, और इस भूख से जो व्यंग्य उभरा है, वह सदियों से आपकी दहलीज़ पर ठिठका है। आपकी अर्थात गरीब आदमी की दहलीज पर, क्योंकि सदियों से वह जो खाना खा रहा है, वह जूता उबाल कर खाने जैसा ही है। न बड़े आदमी की चरण वन्दना उसका पीछा छोड़ती है, और न जूता उबाल कर खाने जैसा उसका दुर्भाग्य।
कहां-कहां नहीं खाते आप इस जूते को उबाल कर? सत्ता की कुर्सी से किसी ने कहा, हम लालफीताशाही को खत्म करके ही दम लेंगे। ‘एक नया सुविधा केन्द्र नहीं, पूरा जगत आपके लिए शुरू हो जाएगा, जहां आपका कुल काम एक ही खिड़की पर हो जाया करेगा।’ लेकिन खिड़की खुलेगी तभी न, उसके पीछे काम करता आदमी काम करेगा तभी न, लेकिन वह कहता है, मेरा सर्वर चलेगा तभी तो मैं काम करूंगा और सर्वर चलाने के लिए चाहिए पूरा सांस्कृतिक विकास। जी हां, वही सम्पर्क संस्कृति का विकास, जिसमें मध्यजन या आम भाषा में मियां दलाल सर्वर की ऊर्जा बनते हैं। आपने उनसे सम्पर्क किया चन्द चांदी के सिक्कों का अर्घ्य देकर। सर्वर चलने लगा और असुविधा केन्द्र नहीं, असुविधाजनक होता आपका पूरा जगत सुविधापूर्ण हो गया। आप चिल्लाये लालफीताशाही खत्म हो गई, लेकिन इस चिल्लाहट के पीछे कितनी पीड़ा है जो एक आम आदमी को यह सम्पर्क संस्कृति स्वीकार करने पर हुई।
‘हैं कितने मधुर वे गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।’ कभी जनाब तलत महमूद साहिब महान कवि शैले का हिन्दीकरण करके गाते थे। अब इन गीतों की धुन बदल गई। धुन कहती है, ‘मान लो यहां सब चलता है। नेतागिरी से लेकर महंगाई तक।’ कभी नेतागिरी का मतलब था निरन्तर जन-सेवा, त्याग, बलिदान और फिर देश पर कुर्बान। अब नेतागिरी का मतलब है शार्टकट संस्कृति के मसीहा, जो हर गलत काम को सही करवा देने की योग्यता रखते हैं। तलबगार झल्ला कर कहता है, ‘आप कैसे नेता हैं जो इस गैर-कानूनी काम को कानूनी नहीं बनवा सकते।’ तब नेता निकलता है अपनी योग्यता सिद्ध करने। शार्टकट संस्कृति की बन आती है। गलत काम सही हो जाते हैं। कैग रिपोर्ट चाहे इसका जितना विरोध करती रहे। आम आदमी भरे नेत्रों से नेताओं की गारंटियों को खण्डित होते देखता है, और उसका पीड़ा से उभरता है व्यंग्य। देखा, मैंने तो पहले ही कहा था, कि एक न्याय संगत समाज की पहचान ही यही है कि जो अन्याय को उचित ठहराये और इस पीड़ा से उभरते हैं महंगाई के वे दंश, जो प्रसारित सूचकांकों से बिल्कुल उल्टी बात कहते हैं। सूचकांक कहते हैं, ‘थोक महंगाई की दर शून्य से नीचे चली गई’ परचून की दर तो उससे ऊपर रहेगी ही, लेकिन बाज़ार का असली भाव तो इससे कहीं ऊपर हो गया साहब क्योंकि इसे निर्धारित करते हैं जमाखोर, काला बाज़ारिये, और कमी का मनोविज्ञान पैदा करने वाले। जीना है तो आपको इनके सामने ही अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी। पीड़ा हो भी तो क्या? आपने तो यही कहना है, बाज़ारों ने कितनी तरक्की कर ली। ज़रा शेयर बाज़ार का सम्मान तो देखिये।
जी हां आप ऊंची छलांग लगाते हुए शेयरों का रुझान देखिये। सोने और चांदी की आकाश छूती कीमतें देखिये, लोगों की मासिक किस्तों पर ली गई अपनी अमीरी दिखाने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियां देखिये, और अभिनन्दन कीजिये देश की अभूतपूर्व तरक्की का। रिकार्ड समय में दुनिया की सबसे ताकतवर चौथी शक्ति बन जाने का, लेकिन सस्ते राशन की दुकानों के बाहर लगती लम्बी कतारों को न देखना, बरसों से बेकार नौजवानों का कॉकरोच विद्रोह न देखना क्योंकि इसमें से आपको विलाप की ध्वनि आएगी। टूटते सपनों की आवाज़ आएगी। भ्रमित नौजवान नशों के अन्धकूप में डूबते नज़र आएंगे। नहीं, उधर ध्यान मत देना, क्योंकि इसमें से कारुणिक व्यंग्य उभरता है। सड़क छाप व्यंग्य नहीं। तो केवल सड़क छाप व्यंग्य पर ही खीसें निपोर सकते हैं।

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