22,000 करोड़ रुपये का कज़र् साढ़े छ: करोड़ में निपटाने की कोशिश
ज़ी-मीडिया समूह के मालिक सुभाष चंद्रा पर 22,006.57 करोड़ रुपये के कर्ज को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) द्वारा महज 6.25 करोड़ रुपये में समायोजित किये जाने की जो घोटाले के माफिक सुर्खियां इन दिनों मीडिया में छायी हुई हैं और जिससे इन्कार करते हुए सुभाष चंद्रा ने देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी पर उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने का न सिर्फ आरोप लगाया है बल्कि चंद्रा ने धमकी भी दी है कि अगर उनके स्वामित्व वाले टीवी चैनलों द्वारा उन पर (सुभाष चंद्रा पर) कीचड़ उछालना बंद न किया गया, तो उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि उनके पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन वह मुकेश अंबानी को कहीं का नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि उनकी अलमारी में उनके (मुकेश अंबानी के) गुनाहों के कई कंकाल कैद हैं।
दरअसल यह सारा मामला उद्योगपतियों द्वारा कर्ज लेकर उसे लौटाने की जगह समायोजित कराये जाने की साज़िश का एक ऐसा जलेबी जाल है, जो अगर समझ में आ गया तो इसके लिए इस्तेमाल किये गये तिकड़म से आप खौफ से भर जाएंगे और अगर नहीं समझ में आया, तब तो दहशत हर तरफ व्याप्त है ही। वास्तव में यह बेहद करीने से बुना ऐसा षड्यंत्र है, जो पहली नज़र में षड़यंत्र की जगह कर्ज प्रावधानों में मौजूद ‘लूप होल्स’ जैसा लगता है लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह चोर दरवाजा पूरी तिकड़म और साज़िश से तैयार किया गया है।
आइये, पहले पूरे मामले को जान लेते हैं। एस्सेल ग्रुप और ज़ी-मीडिया समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से 22,000 करोड़ रुपये का कर्ज नहीं लिया गया बल्कि एस्सेल ग्रुप की कंपनियों द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों सहित कई ऋणदाताओं से लिये गये ऋण को जब ये नहीं चुका पायीं और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने इस कर्ज के मुख्य गारंटर सुभाष चंद्रा को पुनर्भुगतान के रूप में महज 6.25 करोड़ रुपये में एडजस्ट कर दिया, तब लेनदारों की तरफ से यह आंकड़ा आया है कि वास्तव में लेनदारी तो 22,006.57 करोड़ रुपये बनती है और जो पुनर्भुगतान योजना के तहत भुगतान राशि तय की गई है, वह महज .003 प्रतिशत यानि 6.25 करोड़ रुपये है यानी पूरी चुकता की जाने वाली रकम में 99.97 प्रतिशत का हेयरकट किया गया है।
वास्तव में इसी के बाद मीडिया में यह सारा मामला एक सनसनीखेज घोटाले के रूप में सामने आया। सवाल है कि अगर लेनदारों का यह आरोप है तो फिर एनसीएलटी ने आखिर 6.25 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना कैसे मंजूर की? यह तो कुल देनदारी की .003 प्रतिशत ही बनती है और इतनी कम धनराशि से एडजेस्टमेंट की कोई तुक ही नहीं है। यह तो भुगतान की एक प्रतिशत राशि भी नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि अगर लेनदारों का आंकड़ा सच है, तो आखिर एनसीएलटी ने यह योजना मंजूर कैसे कर ली? इस मंजूरी का गणित यह है कि किसी रि-पेंमेंट प्लान को क्रेडिटर्स की जो समिति मंजूरी देती है। उस समिति में 77.48 प्रतिशत वोट इस प्लान की मंजूरी के पक्ष में आये व महज 18.42 प्रतिशत वोट इस मंजूरी के विरुद्ध पड़े, जबकि 4.10 प्रतिशत लेनदारों ने इस मामले में वोट नहीं दिया, वह पूरी वोट प्रक्रिया से बाहर रहे। इस तरह देखा जाए तो वास्तव में इस भारी भरकम राशि के बदले में जो सुषाभ चंद्रा को गारंटर के रूप में 6.25 करोड़ रुपये और एस्सेल ग्रुप की मूल कंपनियों को 1494 करोड़ रुपये के जिस पुनर्भुगतान को मंजूरी दी गई है, उसके पीछे का सारा खेल इस योजना को मंजूरी देने वाली समिति का खेल है।
अब सवाल है, यह समिति कौन है? जब एनसीएलटी पर यह आरोप लगाये गये कि वह आखिर किसी देनदार को इतनी छूट कैसे दे सकती है, तो उसका तर्क था कि अदालत क्रेडिर्ट्स की कॉमर्शियल विजडम की जगह अपना फैसला नहीं सुना सकती और क्रेडिर्ट्स को लगता है कि चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति से बैंक्रैप्सी की स्थिति में मिलने वाली रकम प्रस्तातिव योजना से भी कम हो सकती है। इसलिए उपलब्ध रकम स्वीकार करने में ही भलाई है लेकिन इस पूरे खेल का या साजिश के इस पूरे जलेबी जाल का सबसे पेचीदा हिस्सा ये है कि जिन लेनदारों से बहुमत से आखिर इस पुनर्भुगतान योजना को सहमति दी, वो कौन हैं, और अगर देखा जाए तो विवाद की असली धुरी वही हैं। वास्तव में ये पांच लेनदार जिन्होंने सुभाष चंद्रा को सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये की देनदारी को मंजूरी दी, वे हैं- वीना इंवेस्टमेंट, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स, लेमोनडे कैप्टिल एडवाजइर्स और क्रॉप्स सेल कैप्टिल एडवाइजर्स। इन पांच के पास मिलकर 61.71 प्रतिशत का वोटिंग शेयर बनता है और यही चाहते थे कि सुभाष चंद्रा को सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये के पुनर्भुगतान पर छोड़ दिया जाए।
इन पांचों में वर्ल्ड क्रेस्ट के पास अकेले 28.49 प्रतिशत का वोट शेयर था, जबकि लेमोनडे के पास 16.85 प्रतिशत के शेयर थे। अब सवाल है ये पांचों आखिर सुभाष चंद्रा को इतनी बड़ी छूट के पक्ष में क्यों थे? वास्तव में इन सबका एस्सेल ग्रुप से ही संबंध है। वीना इन्वेस्टमेंट की चेयरमैन सुशीला देवी गोयल हैं, जो कि उनके भाई जवाहर गोयल की पत्नी और उनकी भाभी हैं। इस तरह ये पांचों लेनदार चंद्रा से एसोसिएट या रिलेटिड हैं। इसलिए जब बाकी लेनदारों एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, कैनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी बैंक आदि ने विरोध किया कि इनके वोट शेयर को न माना जाए, तो एनसीएलटी का कहना था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इन लेनदारों की चंद्रा के साथ साझेदारी साबित नहीं होने के कारण उसका फैसला सही था। जिन लेनदारों ने उनका विरोध किया है, उनके पास 18 प्रतिशत ही मत होने के कारण वे शायद ही किसी दूसरी अदालत में केस बारे अपील कर सकेंगे। इस तरह देखा जाए तो इस पूरे मामले में असली परीक्षा नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की है। हालांकि सवाल और भी हैं कि आखिर किसने यह तय किया कि सुभाष चंद्रा के पास मौजूद कुल संपत्ति 6 करोड़ रुपये से भी कम ही है?
अब असली सवाल ये है कि क्या यह जो तथाकथित 22,006 करोड़ रुपये का घोटाला है, वह आम जनता की जेब से जायेगा? अगर सारे तिकड़मों को छोड़कर इसकी मूल तह पर जाएं तो अंतत: इस घोटाले की कीमत आम लोगों को ही चुकानी पड़ेगी। अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की जमा पूंजी से यह रकम निकलती है तो न सिर्फ आम डिपोजिटर को किसी न किसी रूप में इसकी भरपायी करनी पड़ेगी बल्कि बैंकों की इस पूंजी हानि से जो वास्तविक कर्ज चाहने वाले हैं, उन्हें कर्ज नहीं मिल पायेगा या कई तरह की कठिनाइयां होंगी। चाहे एस्सेल गु्रप से संबंधित कंपनियों ने इस पुनर्भुगतान के पक्ष में मंजूरी दी है, इस कारण होने वाला नुकसान उनका निजी नुकसान नहीं होगा क्योंकि यहां भी आम लोगों का ही पैसा लगा हुआ है। इसे तकनीकी रूप से कह सकते हैं कि बैंकों को चूना नहीं लगा है, क्योंकि इस धोखाधड़ी का पैसा अंत में आम लोगों और टैक्स देने वालों के हिस्से में से ही जाएगा। परन्तु ताज़ा जानकारी के अनुसार अब दीवाला ट्रिब्यूनल एन.सी.एल.टी., जिसका पुनर्गठन किया गया है, ने निपटारे वाले अपने पहले आदेश पर रोक लगाते हुए सुभाष चंद्रा को अपनी किसी भी जायदाद को बेचने पर रोक लगा दी है और इस मामसे की अगली सुनवाई 23 सितम्बर हो होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



