आपदा-पीड़ित नेपाल की सुध
सप्ताह भर पहले 26 अगस्त को तिब्बत में एक ग्लेशियर टूटने से नेपाल में आई बाढ़ से एकाएक वहां भारी विनाश का दृश्य बन गया था। अभी पूर्ण रूप से नुकसान का जायज़ा लिया जाना तो कठिन है परन्तु प्राप्त समाचारों के अनुसार वहां बहुत-सी इमारतें तथा कई पुल नष्ट हो गए हैं, अनेक पुल इस भीषण बाढ़ में बह गए हैं। अब तक हज़ारों मृत्यु होने की और भारी संख्या में 4000 से भी अधिक लोगों के लापता होने के समाचार हैं। कम से कम 4-5 बिजली प्रोजैक्टों में पानी भर गया है। सैकड़ों ही कर्मचारी सुरंगों में फंसे हैं या मारे जा चुके हैं।
एकाएक ऐसे विनाश के कारण बड़े से बड़े राहत कार्य भी छोटे प्रतीत होने लगे हैं। 26 अगस्त को इस विनाश का समाचार सुन कर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल के समकक्ष बालेन शाह के साथ बातचीत की और उसी समय बड़ी राहत सामग्री और दवाइयों की खेप भेजने का काम आरम्भ किया गया जो अब तक जारी है। बुधवार को पांचवीं बार लगभग 5 टन दवाइयां भेजी गई हैं और 11 सदस्यीय एक बचाव कार्यों में निपुण टीम भी भेजी गई है। भारत की ओर से लगातार यह सिलसिला जारी है। बालेन शाह ने इसके लिए भारत का धन्यवाद भी किया है। इसके साथ-साथ भारत के ज्यादातर सभी संगठन और सोसायटियों ने भी अपने-अपने ढंग से राहत के लिए कार्य आरम्भ कर दिए हैं। शिरोमणि कमेटी की एक प्रतिनिधि टीम ने वहां पहुंच कर जायज़ा लेते हुए राहत सामग्री भेजने की ज़िम्मेदारी उठाई है। इतने भयावह विनाश के दृष्टिगत नेपाल सरकार ने भी अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को सहायता के लिए आगे आने की अपील की है। उसने यह भी कहा है कि इस काम में अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारे को इसके लिए भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए क्योंकि ज्यादातर देशों में स्थापित उद्योगों से निकलती गैसों ने भी सांसारिक तपिश में वृद्धि की है, जिस कारण ग्लेशियर पिघलने लगे हैं, जिन्होंने वातावरण संतुलन को गड़बड़-ग्रस्त बना दिया है। नि:संदेह आज बढ़ती वैश्विक तपिश ने ज्यादातर देशों को चिंता में डाल दिया है। लगातार उठती ग्रीन हाऊस गैसों ने समूचे पर्यावरण को प्रभावित किया है और उससे पड़ने वाले प्रभाव ने विश्व भर में चिंता पैदा की है। इससे ज्यादातर स्थानों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन भी अनिश्चित एवं असुरक्षित बनता जा रहा है।
नेपाल भारत का निकटवर्ती पड़ोसी देश है। सदियों से इसके भारत के साथ अटूट संबंध बने हुए हैं। आज लाखों ही नेपाली और भारतीय एक-दूसरे के देशों में रह रहे हैं और इन देशों में बसे हुए हैं। दोनों देशों की ज्यादातर योजनाएं भी सांझी हैं। भारत आज अनेक नेपाली परियोजनाओं को सफल बनाने में भारी सहायता कर रहा है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे विशाल देश का यह फज़र् बन जाता है कि वह अपने निकटवर्ती पड़ोसी की प्रत्येक तरह से पूरी सुध ले, ताकि दोनों देशों के लोगों की आपसी सद्भावना और भी गहरी हो सके। कोरोना महामारी के समय भी भारत ने बखूबी ऐसी भूमिका निभाई थी और भारी मात्रा में कोरोना के टीके और दवाइयां विश्व भर के ज्यादातर देशों को भेजी थीं जिन्होंने भारत के सुहृदयी होने के प्रभाव को बढ़ाया था और अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर देश के कद को और भी ऊंचा किया था। ऐसी सद्भावना के रिश्ते का लगातार बने रहना ज़रूरी है ताकि देश के नैतिक-मूल्यों की पहचान विश्व भर में बन सके। जहां तक नेपाल का संबंध है, इसके साथ हमेशा ही भारत के संबंध बड़े भाई जैसे बने रहे हैं। ऐसी आपदा के समय इस रिश्ते का और भी मज़बूत होना बेहद ज़रूरी है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

