किसानों की उचित मांगों की ओर ध्यान दें सरकारें

ज़िंदा रहने का हक मिलेगा उसे,
जिस में मरने का हौसला होगा।  
—सऱफराज़ अबद
संयुक्त किसान मोर्चा एक बार फिर सड़कों पर उतर आया है। चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर 7 दिनों के लिए स्थायी मोर्चा शुरू है। हमारी जानकारी के अनुसार आज तीसरे दिन दोपहर तक भी पंजाब तथा केन्द्र सरकार द्वारा मोर्चा के नेताओं को किसी बातचीत के लिए निमंत्रण नहीं दिया गया और न ही कोई गुप्त ट्रैक-2 बातचीत की कोई सूचना है। यह स्थिति किसान नेताओं में हताशा बढ़ा रही है और सम्भावना बनती जा रही है कि धरना 7 दिनों की बजाय लम्बा लटक जाए। 
किसानों द्वारा दिए गए ज्ञापन में बहुत-सी मांगें केन्द्र सरकार से संबंधित हैं और अनेक मांगें पंजाब सरकार से भी संबंधित हैं, जिनमें प्रमुख रूप से पानी से संबंधित सभी गैर-कानूनी समझौते और पंजाब पुनर्गठन एक्ट की धाराएं 78, 79 और 80 विधानसभा में रद्द करके केन्द्र से यह संसद में में रद्द कराने की मांग रखी गई है। डैम सेफ्टी एक्ट भी विधानसभा में रद्द करने की मांग की गई है। इस ज्ञापन में मांगों की एक लम्बी-चौड़ी सूची है। हम समझते हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा की अधिकतर मांगें सिर्फ किसानों की नहीं, अपितु समूचे पंजाब की मांगें हैं और पंजाब सरकार को पहल के आधार पर उनके साथ बातचीत करके, जो उसके हाथ में है, वह करके पंजाब की मांगें केन्द्र से मनवाने का रास्ता तलाशना चाहिए।
बात हक है तो फिर कबूल करो, 
ये ना देखो कि कौन कहता है। 
—दिवाकर राही
लाइसैंसी हथियार और सरकार
कुछ तो सोचा भी करो फैसले लेते वक्त,
कुछ तो सरकार ह़क़ीकत को देखा भी करो।
सरकार ने ज़ुबानी आदेशों से पंजाब में असला लाइसैंस बनाने पर रोक लगा दी है, जबकि सरकारी डाटा साफ बताता है कि हथियारों से होने वाली हिंसा तथा हत्याएं 99 प्रतिशत गैर-लाइसैंसी अवैध हथियारों से ही होती हैं। पंजाब सरकार ने विगत 3 वर्षों में ही 2300 से अधिक अवैध हथियार पकड़े हैं, जो पाकिस्तान या बाहरी राज्यों से तस्करी के ज़रिये पंजाब पहुंचे थे। पंजाब में लाइसैंसी हथियारों से हुए अपराधों की संख्या तो एक प्रतिशत से भी कम है। यह आंकड़ा साफ और स्पष्ट बयान करता है कि चाहे पंजाब में देश के तनासब में लाइसैंसी हथियारों की संख्या कहीं अधिक है, परन्तु आम तौर पर ये कानूनी हथियार आत्म-रक्षा के लिए ही इस्तेमाल किए जाते हैं, अपराध के लिए नहीं। इसलिए पंजाब सरकार द्वारा हथियारों के लाइसैंस देने पर रोक लगाना किसी भी तरह उचित नहीं समझी जा सकती, क्योंकि पंजाब में चल रहा फिरौतियों एवं गैंगस्टरवाद का दौर आत्म-रक्षा के लिए लाइसैंस हथियार रखना ज़रूरी बनाता है और यह अपराध पर अंकुश लगाने में सहायक भी होता है। यदि ईमानदार एवं शरीफ लोगों को लाइसैंस नहीं मिलेंगे तो, वे भी अवैध हथियारों की ओर रुचित हो सकते हैं। ये हथियार कानूनी हथियारों से लेने भी सस्ते हैं और इनमें कागज़ों की समस्या भी नहीं, चाहे पकड़े जाने पर बड़ी सज़ा भी मिलती है। आज़ाद विधायक राणा इन्द्रप्रताप सिंह ने आरोप लगाया है कि पंजाब में एक लाइसैंस बनाने पर 3 से 5 लाख रुपये की रिश्वत ली जा रही है। सरकारी फीस भी कुल मिला कर लगभग 50 से 70 हज़ार लगती है। यह भी आश्चर्यजनक बात है कि अपराधी तो अवैध हथियार जहां मज़र्ी लिए फिरते हैं, परन्तु आत्म-रक्षा के लिए लिए गए लाइसैंसी हथियार जब उनको सबसे अधिक ज़रूरत होती है, उस समय जमा करवाने के आदेश हो जाते हैं। चुनावों में चुनाव बूथ के निकट हथियार ले जाने पर पाबंदी तो समझ आती है, परन्तु उस समय घर और बाज़ार में आत्म-रक्षा की सबसे अधिक ज़रूरत भी होती है, और हथियार थाने में जमा करवा लिए जाते हैं, ऐसा क्यों? नि:संदेह हथियार का लाइसैंस देते समय व्यक्ति की गहन और सख्त जांच की जाए, परन्तु उस पर विश्वास भी दिखाया जाए। यह अपराध कम करने में भी मदद करेगा। असली खतरा अवैध हथियारों से है जिसका पता ही नहीं चलता, अपितु चाहिए तो यह कि लाइसैंस की फीस कम की जाए, लाइसैंस बनाने की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी की जाए। हां, गलत इस्तेमाल की सज़ा कड़ी हो। अवैध हथियार पकड़े जाएं। लाइसैंसी हथियार होने से शरीफ व्यक्ति फिरौतियों तथा गैंगस्टरवाद के दौर में थोड़ा मुतमइन (निश्ंिचत) हो कर रह सकता है। शारिक क़ैफी के शब्दों में :
गए भी जान से और कोई भी मुतमइन ना हुआ,
कि फिर दिफा न करने की हम पे तोहमत थी।
(मुतमइन = चिन्ता रहित, तोहमत = इल्ज़ाम, दिफा = हिफाज़त)
डी.ए. का मामला और राजनीति 
इस समय पंजाब में सरकारी कर्मचारियों एवं पैंशनरों का डी.ए. संबंधी विवाद सिर्फ वित्तीय या अदालती विवाद ही नहीं रह गया, अपितु यह विवाद 2027 के चुनावों से पहले एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। इसने मुफ्त की सरकारी सुविधाओं (फ्रीबीज़) तथा अधिकार की बहस भी छेड़ दी है। कर्मचारी एवं विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार के पास वोट को लिए मुफ्त सुविधाएं देने के लिए तो पैसा है, परन्तु कर्मचारियों का बनता हक अदालती फैसले के बावजूद देने के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन पंजाब सरकार कह रही है कि पंजाब में वेतन सबसे अधिक हैं। गुजरात से पंजाब में 28 प्रतिशत अधिक वेतन है। पंजाब के कुल राजस्व का 51 प्रतिशत कर्मचारियों के खाते में जा रहा है, परन्तु उल्लेखनीय है कि पंजाब में डी.ए. दर 42 प्रतिशत है और केन्द्र में 60 प्रतिशत। पंजाब सरकार कहती है कि यह मामला पिछली सरकारों के समय का विरासत में मिला है। उसने यह भुगतान 5 किस्तों में करने का प्रस्ताव बनाया था, परन्तु हाईकोर्ट ने 15 दिनों में पूरा भुगतान करने का आदेश दिया है। कर्मचारियों ने हाईकोर्ट की अवमानना का केस भी दायर किया है और पंजाब सरकार कुल कितना पैसा पंजाब के कर्मचारियों को मिल रहा है, के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में है। 
परन्तु मामले का राजनीतिक पक्ष भी मज़बूत है, क्योंकि अब यदि सुप्रीम कोर्ट में फैसला सरकार के पक्ष में हो जाता है तो कर्मचारी वर्ग और नाराज़ हो जाएगा। यदि कर्मचारियों के पक्ष में हुआ तो सरकार की आर्थिक मुश्किलें बढ़ जाएंगी। पंजाब पर पहले ही अब तक 4.35 लाख करोड़ का ऋण होने का अनुमान है। मार्च 2027 तक यह और बढ़ेगा। कुल लगभग साढे 7 लाख कर्मचारी हैं। यदि एक परिवार के 4 वोट गिने जाएं तो यह लगभग 30 लाख बनते हैं, जो चुनाव परिणाम को बहुत ज़्यादा प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए विपक्षी दल कर्मचारियों के पक्ष में खुल कर बोल रहे हैं। ऐसी हालत में पंजाब सरकार के लिए सबसे अच्छा मार्ग तो यही है कि वह अदालत से बाहर कर्मचारियों एवं पैंशनर यूनियनों के नेताओं से बातचीत के ज़रिये कोई बीच का रास्ता निकाले। वैसे वोट के लिए मुफ्त की योजनाएं किसी भी कौम के विकास के लिए कांटे बोने का काम ही करती हैं। इतिहास गवाह है कि जिन कौमों में मुफ्त की चेटक ला दी जाए, वे बर्बाद हो जाती हैं और स्वाभिमान खत्म कर बैठती हैं।
माल-ए-म़ुफ्त इक मीठा-सा ज़हर है यारो, 
माल-ए-म़ुफ्त से कौमें ज़लील हो जाएं।
बादल पुराने साथी वापस बुलाने लगे?
अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल चुनाव अभियान सम्भालने के लिए अपने पुराने सलाहकारों एवं साथियों को वापस बुलाने के बारे में कोई रणनीति बना रहे हैं। इसका संकेत गत दिवस उनकी ओर से अपने एक राजनीतिक सलाहकार से की गई बैठक से मिलता है। पता चला है कि वह चुनाव अभियान सम्भालने वाले उन साथियों की सेवाएं दोबारा लेने के बारे में सोच रहे हैं, जिन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव दोबारा जीतने में अहम भूमिका निभाई थी तथा वे प्रत्यक्ष राजनीति में भी नहीं उतरे थे। 

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