बढ़ती विकास दर का दावा

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा, देश की अर्थ-व्यवस्था  वित्तीय वर्ष 2026-27 के अप्रैल-जून में उम्मीद से तेज़ 7.8 प्रतिशत बढ़ने की जानकारी दी गई है। ऐसा वर्षों से रूस और यूक्रेन में युद्ध होने के साथ-साथ पिछले 6 माह से अमरीका और ईरान के बीच जारी युद्ध के बावजूद हुआ है। रिज़र्व बैंक का इस तिमाही में आर्थिकता के 6.7 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था परन्तु परिणाम उसके अनुमान से भी ज्यादा आए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस वृद्धि पर बेहद संतोष प्रकट किया है। विगत दिवस बैल्ज़ियम के प्रधानमंत्री के भारत दौरे पर आने से जहां दोनों देशों के बीच अहम समझौते हुए, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने देश की आर्थिक वृद्धि का भी ज़िक्र किया है। न्यूयॉर्क में केन्द्रीय वित्त मंत्री सीतारमण ने भी सम्बोधित करते हुए भारत के मज़बूत होते आर्थिक विकास की बात की है और कहा कि विश्व में कई स्थानों पर युद्ध  जारी होने के बावजूद भारत दृढ़ता से आगे बढ़ता जा रहा है। इस कारण विश्व भर के देश भारत के साथ व्यापारिक सहयोग बढ़ाने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं और प्राथमिकता के आधार पर उन्होंने अन्य देशों की बजाय भारत में कामकाज करने की इच्छा प्रकट की है।
पिछले दशकों में कई पक्षों से भारत विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी लगातार यह दावा किया है कि पिछले दशक में 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे हैं। इसलिए मध्यम वर्ग का दायरा बढ़ता जा रहा है। लगभग 40 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अनुपातन अच्छी सुविधाओं से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इन आंकड़ों को फज़र्ी बताते हुए देश में बेरोज़गारी, महंगाई और बढ़ती असमानता की आलोचना की है। जयराम रमेश ने कहा कि सरकार बार-बार ढंग-तरीका बदल कर इन आंकड़ों को अपने हिसाब से सैट कर रही है। हम देश की बढ़ती विकास गति के साथ-साथ यहां अब तक लोगों को दरपेश समस्याओं की भी बात करेंगे। किसी भी देश के आगे बढ़ने का पैमाना रोज़गार और जन-साधारण की आय का आधार ही होना चाहिए। कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में अनेक आंकड़ों को शामिल किया जाता है, जिनमें कृषि, उद्योग, निर्माण की गतिविधियां और सरकार को होने वाली आय शामिल होती है। देश में मज़बूत होते आर्थिक विकास का प्रभाव जन-साधारण को महसूस होना चाहिए। यह भी देखना ज़रूरी है, कि रोज़गार के कितने स्रोत पैदा हो रहे हैं और महंगाई किस सीमा तक बढ़ रही है या सीमित हो रही है। निजी निवेश कितना हो रहा है और प्रति व्यक्ति आमदन कितनी बढ़ रही है। जहां तक भारत का सवाल है यह आम प्रभाव बना हुआ है कि यहां लगातार अमीरों और जन-साधारण में अंतर बढ़ता जा रहा है। पिछले 4 वर्ष में देश में एक अरब से अधिक वार्षिक आय वाले लोग 4 गुणा बढ़ गए हैं और उनकी संख्या साढ़े 500 से भी बढ़ गई है। ‘वर्ल्ड इन इक्वॉलिटी रिपोर्ट-2026’ अनुसार भारत के 10 प्रतिशत लोगों की कुल आय 58 प्रतिशत है, जबकि 50 प्रतिशत लोगों के पास इसका सिर्फ 15 प्रतिशत हिस्सा है। हमारे एक प्रतिशत बेहद अमीर लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 22.7 प्रतिशत हिस्सा है। नि:संदेह बढ़ रही विकास दर के पेश किए गए इन आंकड़ों ने बड़ी उम्मीद पैदा की है, परन्तु विकास दर के साथ महंगाई का बढ़ना अच्छा संकेत नहीं है। सरकार ने खाड़ी देशों के तेल संकट के बावजूद अब तक पेट्रोल और डीज़ल के मूल्य उस ऊंची दर तक नहीं बढ़ाए, जिसका लगभग सभी बड़े देशों को आज सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ-साथ भारतीय निर्यात में वृद्धि होना भी एक अच्छा पक्ष माना जा सकता है, जो देश की अर्थ-व्यवस्था को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है।
हम सरकार की उत्पादन में स्वदेशी पहल की नीति की प्रशंसा ज़रूर करते हैं परन्तु अभी तक इसे पूरी तरह क्रियात्मक रूप में लाने में सरकार सफल नहीं हो सकी। प्रत्येक तरह के स्वदेशी सामान के उत्पादन से जन-साधारण के लिए अधिक अवसर पैदा हो सकते हैं। आर्थिक विकास दर के बढ़ने से ही प्रधानमंत्री ने लोगों को सोना कम खरीदने और विदेशों में पर्यटन हेतु जाने से गुरेज़ करने का आह्वान किया है। जहां सोने का कारोबार उत्पादकता के अवसर पैदा नहीं करता, वहीं विदेशों में किया गया प्रत्येक तरह का खर्च भी देश की आर्थिकता पर प्रभावशाली ज़रूर होता है। सरकार के ऐसे दावों के बावजूद देश के लोगों का जीवन प्रत्येक पक्ष से ऊंचा करने के लिए अभी बहुत बड़े यत्नों की ज़रूरत होगी। ऐसे यत्न ही सही अर्थ में देश को विकास के मार्ग पर लाने में बड़ी सीमा तक सहायक हो सकेंगे।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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