आकर्षक हैं मण्डोर संग्रहालय की प्राचीन निधियां

मारवाड़ की प्राचीन राजधानी माण्डव्यपुर जो आजकल मंडोर के नाम से जानी जाती है मंडोर उद्यान के रूप में तो चर्चित है ही, लेकिन यहां के भव्य देवल व छतरियों के अलावा संग्रहालय भी है। मंडोर संग्रहालय की स्थापना सन् 1968 में यहां के जनाना बाग के प्राचीन महलों में की गई थी इस संग्रहालय में प्राचीन वास्तुकला, के अवशेष, शिलालेख तथा प्रस्तर कला और मूर्तियों के अवशेष के साथ-साथ हस्तकला, शरीर और प्रकृति विज्ञान से संबद्ध वस्तुओं का दर्शनीय संग्रह है। इस तमाम कला सामग्री को अलग-अलग कमरों में प्रदर्शित किया गया है जिसे प्रतिदिन मण्डोर देखने आने वाले पर्यटक देखकर अभिभूत हुए बिना नहीं रहते हैं।
यहां के एक कक्ष में मूर्तियां रखी हुई है जिसमें मण्डोर, ओसियां, किराडू, घटियाला, सालवास, जूना और जालौर आदि से प्राप्त कर सज्जित किया गया है। मण्डोर से प्राप्त अवशेषों के लिए अलग से एक कक्ष है। जिसमें 9-10 वीं शताब्दी की सूर्य, त्रिविक्रम, सुरा-सुन्दरी, यक्ष-नट, शिव, कीचक, दुर्गा तथा नवगृह इत्यादि प्रतिमाओं के साथ अलंकृत वास्तुकला के नायाब खंड भी रखे गये हैं। स्थानीय कला को देखकर लगता है कि धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर भी कलाकार जन-जीवन की झांकी पाषाण पर अंकित करना नहीं भूले हैं। कला के रूप में तो मण्डोर यूं भी जनसाधारण पर छाप छोड़ चुका है लेकिन मण्डोर की प्राचीन निधियां, सौन्दर्य भाव तथा अभिव्यक्ति तीनों ही दृष्टि से उच्चकोटि की दिखाई देती है। प्राचीन अवशेषों में भद्रता, सरलता, सौन्दर्य व जन-जीवन का अनूठा परिचय देखने को मिलता है।
मण्डोर के शिलालेख पर उत्कीर्ण अरहट जो कि 10वीं शताब्दी के है और वे अत्यन्त महत्वपूर्ण माने जाते हैं आयाताकार शिल्प के दो खण्ड है जिसमें एक खण्ड में योद्धा अपने शस्त्रों से सुसज्जित होकर जाते दिखाई दे रहे हैं तो एक अश्वारोही तथा कुछ लोग ऊंटगाड़ी पर सवार है अरहट के अंकन में पास ही पानी पीता हुआ ऊंट दिखाई दे रहा है जो मारवाड की झांकी को दर्शाता है अरहट अंकन प्राचीन काल में कुएं से पानी निकालने के पद्धति का परिचायक है। दूसरे शिलाफलक पर युद्ध करते सैनिकों का भी अकंन है।
मण्डोर से प्राप्त रक्त पाषाण के दो स्तम्भों पर स्त्री-पुरूष के परस्पर प्रेम के दृश्य अंकित हैं इस फलक में कीर्तिमुख, गोलघेरे में प्रेमालाप दृश्य देखे जा सकते है। इसी स्तम्भ में गवाक्ष, फूल-पत्तियों व अन्य मनमोहक आकृतियां भी कुरेदी गई हैं दूसरे स्तम्भ में भी एक प्रेमालिंगन दृश्य के साथ-साथ नृत्य गायन, वादन मुद्रा में पुरूषाकृति तो मानों सजींव चित्रण का आभास दे रहा है जो कलामर्मज्ञ की प्रवीणता को दर्शाता है। प्रणयलीला से ओतप्रोत आकृतियों का अंकन खजुराहो की कलाकृतियों से कम नहीं आंका जा सकता जो कि मण्डोर से प्राप्त वास्तुखंडो एवं प्रतिमाओं में अंकित स्त्री पुरूष के केश विन्यास तथा आभूषण अत्यन्त आकर्षक है। इस संग्रहालय में घंटियाली से प्राप्त सर्वतोभ्रद गणेश की प्रतिमा जो कि जोधपुर से 22 मील उत्तर-पश्चिम से प्राप्त हुई थी को भी स्तम्भ पर प्रदर्शित की गई है। संग्रहालय में एक ऐसा स्तम्भ भी है जिसके शीर्ष पर चारों दिशाओं में मुख किये गणपति है। इस स्तम्भ को मण्डोर के पूर्व शासक बाऊक के भाई कक्कुक प्रतिहार ने उत्कीर्ण करवाया था जो विक्रम संवत् 918 का है।
मण्डोर संग्रहालय में 10वीं शताब्दी की ओसियां से प्राप्त प्रस्तर प्रतिमाओं का शिखर भाग है जिसके मध्य में शेषशायी विष्णु दिखाई दे रहे हैं तो ऊपर स्थ पर सूर्य विराजित हैं इसके अलावा 12वीं शताब्दी की किराडू से प्राप्त ब्रह्मा, कुबेर, युद्धरत स्त्री एवं विभिन्न मुद्राओं में स्त्रियों के चित्र अंकित है। इन प्रतिमाओं में अंग-सौस्टव की झलक देखने को मिलती है। संग्रहालय के कक्षों में जोधपुर, कुसुमा (सिरोही) नागौर तथा मण्डोर से प्राप्त ऐतिहासिक व धार्मिक शिलालेखों का भी अपना महत्व है। यहां फारसी भाषा में उत्कीर्ण एक शिलालेख जो कि हिजरी संवत् 1092 का है, जिसके जरिये यहां की धार्मिक व राजनीतिक परिस्थिति का परिचय मिलता है।
मण्डोर के संग्रहालय का नैसर्गिक सौन्दर्य बढ़ाने वाली यहां की कलाकृतियों के अलावा प्राचीन प्रतिमाएं व शिलालेख तो हैं ही किन्तु खुदाई से प्राप्त अन्य सामग्रियों में कालीबंगा, रंगमहल तथा भीनमाल की सामग्री भी उल्लेखनीय है। संग्रहालय के चित्रकक्ष में चित्ताकर्षक कलाकृतियों में कई तो कामसूत्र व विभिन्न काम में रत चित्र हैं, इसके अलावा मण्डोर के शासक रावचूंडा, मालदेव, उदयसिंह, सूरसिंह, गजसिंह, अजीत सिंह, जसवंत सिंह, अजीत सिंह, विजय सिंह, अभय सिंह, मान सिंह, तथा तख्त सिंह महाराजाओं के साथ वीर दुर्गा दास राठौड़ की आदमकर चित्र यहां की विशेष निधियों के रूप में है। इसी विशाल कक्ष में राठौड़ वंशों की वंशावली, महाराजा गज सिंह द्वारा अहमदनगर के युद्ध का ऐतिहासिक दृश्य, अप्पाजी सिंधिया का खुखरी द्वारा हत्या का प्रयास व जसवंत सिंह की विधवा रानियों द्वारा अटक नदी से पार होना व मुगलों द्वारा घेराव के चित्र भी देखे जा सकते है।
मारवाड़ के इस बहुचर्चित संगहालय की दुर्लभ निधियां शोध का विषय है। इस बहुचर्चित संग्रहालय का रखरखाव पुरातत्व विभाग की देखरेख में चल रहा है व संग्रहालय देखने हेतु पर्यटकों को बकायदा टिकट लेना पड़ता है। जोधपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटको की भीड़ इस संग्रहालय में प्राय: लगी रहती है। 
(सुमन सागर)
 

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