नेपाल आपदा : भारत में भी उठा पीड़ितों की सही पहचान का सवाल
काठमांडू के पुलिस अस्पताल के बाहर 100 से अधिक लोग अपना रक्त सैंपल देने के लिए प्रतीक्षा में थे। यह 3 सितम्बर, 2026 की सुबह की बात है। इनमें प्रकैती जुरंज भी थीं। उनकी माता अभी तक लापता हैं, लेकिन उनके परिवार ने उनके पिता की पहचान कर ली है, अस्पताल के बाहर की दीवार पर लगी मृतकों की तस्वीरों में, जिन्हें पीड़ितों की शिनाख्त करने के उद्देश्य से लगाया गया है। यह जुरंज का कहना है कि मेरे दोनों माता व पिता गांव नुकावोट में थे। बाढ़ उन दोनों को बहा ले गई। बाढञ की खबर सुनते ही हमने उनसे संपर्क करने का प्रयास किया था, लेकिन अभी तक कोई संपर्क नहीं हो पाया है। हां, मेरे पिता का शव मिल गया है, मेरे भाई ने दीवार पर लगी उनकी फोटो पहचान ली है। जुरंज अपनी दादी व भाभी से भी संपर्क करने का प्रयास कर रही हैं, जिनके बारे में उनका ख्याल है कि वे ऊपर पहाड़ी पर रहने के कारण संभवत: बच गई हैं, लेकिन उनका गांव अभी भी ब्लैक आउट में है, जिससे संपर्क करना लगभग असंभव हो गया है।
यह आपदा ग्लेशियर के ध्वस्त होने से आयी थी, जिसके कारण चीन से लगे नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में अत्यधिक तेज़ वेग से पानी, बर्फ, चट्टानें व मिट्टी की भयावह बाढ़ आ गई और नेपाल की छह माह पुरानी सरकार के लिए ज़बरदस्त चुनौती खड़ी हो गई। इस बाढ़ से त्रिशूली नदी के आसपास बसे गांव के गांव साफ हो गये। हालांकि त्रिशूली नदी के किनारे रहने वाले लोग रात में जूते पहनकर और अपने ज़रूरी कागज़ात व कीमती समान एक बैग में रखकर सोते हैं कि जैसे ही नदी का पानी खतरे के निशान पर आये तो वह ऊपर पहाड़ों की तरफ दौड़ लगा दें और पानी के उतरने के बाद वापस आ जायें। लेकिन इस बार मौत ने आने से पहले दस्तक नहीं दी। आधिकारिक तौरपर फिलहाल मृतकों की संख्या 1204 बतायी गई है और लापता लोगों की तादाद लगभग 5,000 है। अब नष्ट हो चुके हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स में जो लगभग 900 श्रमिक काम कर रहे थे, उनको बचाने करने का प्रयास जारी है।
बहरहाल, सबसे बड़ी समस्या मृतकों की शिनाख्त को लेकर है, जिनमें से कुछ के तो सिर्फ शरीर के अंग ही मिल सके हैं। इस सिलसिले में किया यह जा रहा है कि मृतकों के शवों की तस्वीरें अस्पताल की दीवारों पर लगायी गई हैं, जिनके परिजन लापता हैं, उनसे उनका रक्त सैंपल लिया जा रहा है व लापता की दो पासपोर्ट साइज़ फोटो भी। यह सब डीएनए के ज़रिये पहचान करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। नेपाल की लापता सूची में 592 विदेशी नागरिक भी हैं, जिनका संबंध भारत, अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया व कनाडा से है। ये पर्यटक थे, जो माउंटेन ट्रेकिंग के लिए आये थे या तीर्थयात्री थे, जो तिब्बत के पवित्र कैलाश पर्वत की यात्रा के लिए आये थे। इनके विदेशी रिश्तेदारों से आग्रह किया गया है कि वह अधिकृत लैब में अपना डीएनए प्रोफाइलिंग कराएं और डीएनए प्रोफाइल की सॉफ्ट कॉपी नेपाल पुलिस के ई-मेल पते पर भेज दें। गौरतलब है कि नेपाल के कुछ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सैंकड़ों शवों को सामूहिक दफना दिया गया है, जिनकी पहचान नहीं हो पायी थी, क्योंकि अस्पतालों या मुर्दाघरों में जगह नहीं बची थी और शव सड़ने लगे थे। इन शवों का डीएनए सैंपल ले लिया गया था। भारतीय फोरेंसिक टीम के 19 सदस्य अन्य फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ डीएन, सैंपलों का विश्लेषण कर रहे हैं। भारतीय टीम काठमांडू घाटी के खुमाल्टर क्षेत्र में स्थित नेपाल पुलिस सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी और नेशनल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में कार्य कर रही है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से जो डीएनए सैंपल एकत्र किये गये हैं, उनकी प्रोसेसिंग में तेज़ी लाने व पीड़ितों व लापता व्यक्तियों की पहचान स्थापित करने के लिए भारतीय टीम, नेपाल व चीन विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर रही है। भारत जो नेपाल की मदद कर रहा है, उसी के प्रयासों के तहत भारतीय फोरेंसिक टीम को भेजा गया है। नेपाल पुलिस का कहना है कि अभी तक जो शव बरामद हुए हैं, उनमें से 400 के तो सिर्फ शरीर के कुछ अंश ही मिले हैं, जिससे पहचान प्रक्रिया जटिल हो गई है। भविष्य में पहचान प्रयासों की मदद करने हेतु ‘लावारिस’ शवों के भी डीएनए सैंपल एकत्र किये गये हैं। अब तक सबसे अधिक शव चितवन ज़िले से मिले हैं। डीएनए सैंपल एकत्र करने के बाद सैंकड़ों शवों को नदी के किनारे खुली जगहों पर दफना दिया गया है। गत 26 अगस्त को जो भोटेकोशी-त्रिशूली गलियारे में बाढ़ आयी थी, उसमें नेपाल पुलिस के अनुसार 4,858 व्यक्ति लापता हैं।
शायद यही वजह है कि नेपाल सरकार ने अपना फोकस बचाव (रेस्क्यू) से हटाकर अब राहत व पुनर्वास की ओर कर दिया है। लेकिन खोजी टीमें हाइड्रोपॉवर टनलों में खुदाई जारी रखे हुए हैं, इस उम्मीद में कि शायद श्रमिक चैम्बरों या एयर पॉकेट्स में अभी भी ज़िंदा हों। इस भारी नुकसान के लिए नेपाल, अमरीका, चीन व भारत से क्लाइमेट मुआवज़े की मांग कर रहा है, क्योंकि उसके अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जक यही देश हैं, जिसकी वजह से तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर फट रहे हैं। नेपाल की इस मांग का क्या होगा, यह तो मालूम नहीं, लेकिन नेपाल की बाढ़ की वजह से अनेक भारतीय परिवारों में अनिश्चितता पसरी हुई है। नई दिल्ली ने जो अंतिम बार अपनी सूची अपडेट की थी, उसमें बताया गया था कि 275 भारतीय नागरिक व 128 भारतीय मूल के लोग (पीआईओ) नेपाल की बाढ़ में लापता हैं या उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है।
जब दक्षिण थाईलैंड में 5,400 व्यक्तियों की मौत हुई थी, जिनमें से लगभग 1000 की पहचान करना कठिन था, क्योंकि उनका शव सड़-गल गए थे। इसके बावजूद डीएनए प्रोफाइलिंग से 900 की पहचान कर ली गई थी। यह 90 प्रतिशत सफलता इस वजह से मिल सकी, क्योंकि मृतकों, जिनमें अधिकांश विदेशी नागरिक थे, के हेल्थ रिकॉर्ड उनके डीएनए प्रोफाइल के साथ उपलब्ध थे। नेपाल व भारत बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं, जिनमें मौतें भी होती हैं और मृतकों की पहचान करना विभिन्न कारणों से अक्सर कठिन हो जाता है। भविष्य में नेपाल जैसी स्थिति से बचने का कोई तो उपाय कम से कम भारत में किया जाना चाहिए ताकि प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की पहचान करने में कोई दिक्कत न हो। भारत में फिलहाल अपराधियों का डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड तो रखा जाता है, लेकिन सभी नागरिकों के डीएनए प्रोफाइल रिकॉर्ड रखने का विरोध है, निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन, आशंकित दुरुपयोग आदि को लेकर। यह चिंताएं उचित हैं, लेकिन कोई तो रास्ता हो जिससे पीड़ितों का परिवार अनिश्चितता की स्थिति में न रहे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



