क्या भाजपा की नीतियां राहुल गांधी के पक्ष में जा रही हैं ?
ऐसे लगता है कि भाजपा और उसकी सरकारों ने तय कर लिया है कि राहुल गांधी के हर कार्यक्रम का विरोध करना है। भले ही उस विरोध से राहुल को ही फायदा हो रहा हो। कांग्रेस के लिए यह संतोष की बात है कि राहुल गांधी पिछले करीब एक महीने से लगातार रैलियां, सभाएं और अन्य राजनीतिक कार्यक्रमों भाग ले रहे हैं। उनका ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजन किया जा रहा है और भाजपा के नकारात्मक रवैये से इसमें बहुत कामयाबी भी मिल रही है। असल में भाजपा शासित सभी राज्यों में राहुल की सभाओं का विरोध होता है और उसका उन्हें फायदा होता है। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश के इंदौर का है, जहां राहुल ने अगले हफ्ते ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम करना था। इसके लिए कांग्रेस ने नेहरू स्टेडियम की इजाज़त मांगी थी, लेकिन ज़िला प्रशासन ने इंकार कर दिया। गौरतलब है कि ऐसे ही राहुल गांधी को देहरादून, प्रयागराज और पुणे में भी परेशानी का सामना करना पड़ा था। प्रत्येक राज्य में राहुल के कार्यक्रमों को स्वीकृति नहीं दी जा रही है, जिस कारण कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के विरोध करने पर मीडिया एवं सोशल मीडिया में समाचार बनने के बाद राहुल को कार्यक्रम करने की अनुमति मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हर राज्य में अधिकारियों को लग रहा है कि अगर उन्होंने पहली बार में ही राहुल के कार्यक्रम की इजाज़त दे दी तो शायद ‘ऊपर के लोग’ उनसे नाराज़ हो जाएंगे।
खड़गे के मामले में भाजपा की चिंता
मल्लिकार्जुन खड़गे के मामले को लेकर भाजपा में चिंता है। चाहे पार्टी के नेता सार्वजनिक तौर पर जो मज़र्ी कहें, लेकिन जानकार सूत्रों के मुताबिक पार्टी को भय है कि चुनाव से ठीक पहले यह मुद्दा उत्तराखंड में नुकसान पहुंचा सकता है। इसीलिए पार्टी के संगठन महासचिव बी.एल. संतोष को ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए स्वयं आगे आना पड़ा। उनसे पहले मामले को स्थानीय नेताओं ने सांप्रदायिक रंग देते हुए दावा किया था कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में रैली के दौरान ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगे, इसलिए शुद्धिकरण समारोह किया गया था। बी.एल. संतोष का कहना है कि शुद्धिकरण समारोह में कई दलित भी शामिल थे, इसलिए यह दलित अपमान का मामला नहीं बनता जबकि शुद्धिकरण में शामिल दलितों ने एक वीडियो में कहा है कि उनको पता नहीं था कि वहां क्या होने वाला है। उनसे कहा गया था कि वहां प्रसाद बंटने वाला है। इस दौरान राहुल गांधी ने और अन्य लोगों ने भी सोशल मीडिया पर खड़गे के कार्यक्रम का पूरा वीडियो साझा किया है, जिसमें कोई धार्मिक नारे नहीं लगाए गए। लगता है भाजपा इसे मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देकर ब्राह्मणों और ठाकुरों को खुश करने का यत्न कर रही है, क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में इन दोनों जातियों का बोलबाला है। राज्य में दलित आबादी 19 फीसदी और मुस्लिम आबादी 14 फीसदी है। अगर ये वोट एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में चले जाते हैं तो बड़ा उल्टफेट हो सकता है। खड़गे घटना का उत्तराखंड के बाहर अन्य राज्यों में भी प्रभाव पड़ेगा।
कांग्रेस के सहयोगी खामोश क्यों?
यह हैरान करने वाली बात है कि चाहे आरक्षण पर चल रही बहस हो या जाति जनगणना को लेकर उठाए जा रहे सवाल हों, कांग्रेस के सहयोगी दल इन पर पूरी तरह से खामोश हैं। मंडल राजनीति से उभरी समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय जनता दल भी चुप हैं। इन दोनों पर कांग्रेस अकेले लड़ रही है। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि दलित उत्पीड़न का मुद्दा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष से जुड़ा हुआ है, इसलिए दूसरी पार्टियां इसमें दखल नहीं दे रही हैं। माना यह मुद्दा कांग्रेस अध्यक्ष से जुड़ा है तो जाति जनगणना का मुद्दा तो मंडलवादी पार्टियों का ही है, उस पर सब खामोश क्यों हैं? प्रतीत होता है कि अखिलेश यादव इसलिए सावधानी से कदम उठा रहे हैं क्योंकि छह महीने बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं। इसीलिए जाति जनगणना से लेकर परिसीमन और खड़गे के मुद्दों तक हर बात पर सपा बहुत सावधानी बरत रही है। शायद तेजस्वी यादव को लगता है कि अभी कौन-सा चुनाव है, जो इन मुद्दों को उठाया जाए और राजनीति की जाए। अरविंद केजरीवाल भी पंजाब चुनाव के दृष्टिगत सावधानी से प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
किसे मिलेगा सरदार पटेल पुरस्कार
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में गृह मंत्रालय ने 2019 में ‘सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’ की शुरुआत की थी, लेकिन विडम्बना देखिए कि भारत जैसे विशाल 145 करोड़ लोगों की आबादी वाले देश में विगत 7 साल से किसी भी व्यक्ति को इस पुरस्कार के योग्य नहीं पाया गया। पहले साल 2019 में 100 लोगों को पुरस्कार के लिए नामज़द किया गया, लेकिन किसी को योग्य नहीं माना गया। इस वर्ष सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार के लिए 150 नाम आने की खबर है और 31 अक्तूबर को सरदार पटेल की जयंती पर नाम की घोषणा होगी। उल्लेखनीय है कि सरकार हर साल कई लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण सम्मान देती है। भारत रत्न भी अनेक लोगों को दिया गया है। लेकिन इस अवधि में सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार के योग्य कोई नहीं मिला! स्पष्ट है कि इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाला अपने क्षेत्र में भारत रत्न एवं पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वालों से कहीं अधिक उत्तम ही होगा।
बिहार में कोई फेल नहीं होगा
बिहार सरकार ने एक नई पहल की है जिसके तहत अब 10वीं और 12वीं कक्षा में फेल होने वाले छात्रों को फेल नहीं लिखा जाएगा और ‘फेल’ की जगह पर ‘कौशल के लिए पात्र’ लिखा जाएगा। अब सवाल है कि क्या इसके बाद उनको किसी कौशल में प्रशिक्षण दिया जाएगा? अगर कौशल विकास का काम सरकार व्यापक स्तर पर नहीं करेगी तो इस पहल का कोई लाभ नहीं होगा। यह बदलाव सिर्फ बिहार शिक्षा बोर्ड के छात्रों पर लागू होगा जबकि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं और 12वीं की परीक्षा में फेल होने वालों की अंक सूची में फेल ही लिखा जाएगा। हालांकि कौशल विकास की योजना यदि शुरू हुई तो दोनों बोर्डों के छात्रों को प्रशिक्षण दिया जाएगा, परन्तु बिहार सरकार की यह पहल देश में हाल ही में लागू ‘नो फेल पॉलिसी’ की तरह नहीं है, जिसके तहत छात्रों को 10वीं कक्षा तक फेल नहीं किया जाता और अगली कक्षा में तरक्की दे दी जाती है। असल में पिछले कुछ समय से भाजपा की सरकारें इस तरह के बदलाव करके एक अच्छा माहौल बना रही हैं।





