अधूरे वायदों और टूटी उम्मीदों पर जीते लोग

हमारा विचार है कि अगर आपकी ज़िंदगी में आपके साथ किया गया हर वायदा पूरा होने लगे, या बंधाई गई हर उम्मीद पूरी होने लगे तो इस ज़िंदगी में जीने के लिए भला शेष क्या रह जाएगा?
साफ बात कहें तो वायदा जब टूटता है, या बरसों से किसी से बंधी हुई उम्मीद जब टूटती है, तभी त्रासदियां घटती हैं, या करुणा रस का सृजन होता है। अगर त्रासदियां घटने का कोई समाचार न हो, या किसी बेवफाई पर बैठ कर आप धारासार आंसू न टपकाएं, तो भला बताइये, कविताएं किस विषय पर लिखी जाएंगी? ये दर्द भरे गीत कैसे रचे जाएंगे, और ये नौजवान बाल बिखेर कर सड़कों पर भटकते हुए क्यों नज़र आएंगे?
इसलिए बन्धु रहस्य रोमांच से लेकर दिलचस्प रोमांटिक कहानियां तक रचते रहो। इसके लिए ज़रूरी है कि वफा की जगह बेवफाई, साथ निभाने की जगह बेदर्द धोखा देकर गच्चा दे जाने की घटनाएं घटती रहें।
यह बात एक व्यक्ति के लिए ही नहीं, पूरे देशों के अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में आपातकाल से युद्ध तक पैदा करने के लिए ज़रूरी है। ऐसी बात आज कदम-कदम पर आपको नज़र आती है, इसलिए लगता है बेवफाई सदा ही एक अकाट्य सत्य रही, और वफादारी की दोहराई एक मंचीय अथवा किताबी उद्बोधन। आप ही बताइए ‘मुंह में राम-राम और बगल में छुरी’ की निंदा आज कोई करता है क्या? समाज में सर्व स्वीकार्य और भद्रपुरुष कहलाने के लिए मुंह से राम-राम जपिये। इतना ही क्यों हम तो कहते हैं कि आदर्श और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली पुस्तिका  कण्ठस्थ कर लीजिये। और जब यह दिखावे का रूप स्वीकार हो जाए, तो अपना असल रूप दिखाइए। बगल में छिपी छुरी निकाल कर वार कीजिये, और रास्ते में उग आये हर कांटे का सफाया कर दीजिये। जी नहीं इसे रूप बदलने वाला गिरमिटिया रूप नहीं, ज़माना साज़ी कहते हैं। लोगों ने तो इसकी वकालत के लिए तर्क भी जुटा लिये हैं। कुछ भी गलत करो और उससे प्राप्त उपलब्धि पर अघाते हुए कह दो, ‘रोम में वही करो जो रोमन करते हैं।’
इस घोर कलियुग में जो सतयुग के आदर्शों के पालन की बात करेगा, उसके जैसा समय से पिछड़ा हुआ कोई और नहीं हो सकता। देखते नहीं हो कभी राजनीति में अपने दल का वफादार न रहने वाले, और पासा पलट जाने वालों को नेता ‘आया राम गया राम’ कहते थे। आज जो आया राम गया राम न बने, उसे राजनीति में रहने का कोई अधिकार नहीं। हमने तो एक दिन में तीन-तीन दल बदलने वाले नेता देखे हैं, साहिब! कुर्सी पर वही बैठा जिसने बेदर्दी से अपनी आधार भूमि को ठुकराया और रंग बदल कर सत्ता के शीर्ष को गले लगाया।
गुणों की तालिका बदल गई है। जो पहले गलत था वह सही लगता है। जो सही है वह फिसड्डी। हमें फिल्म अनाड़ी की याद आ रही है जब राज कपूर मोती लाल का गिरा हुआ पर्स उठा कर उसके पास लौटाने के लिए जाता है, तो मोती लाल कहते हैं, बरखुरदार कामयाब वही लोग हैं, जिन्हें सड़कों पर ऐसे पर्स मिले, और उन्होंने लौटाया नहीं।
 लेकिन ज़माना तो अब उससे बहुत आगे निकल गया साहब! मिले पर्स को आज कौन लौटाता है, यहां तो आपके हाथ में पकड़े पर्स को छीन कर भाग जाते हैं। अब तो ज़माना उससे भी आगे निकल गया। आज का युग तो आपके हाथ में पकड़े पर्स को छीनने का नहीं, उसे अपना साबित करने का है।
बस कह दीजिए, ‘अबे, तुम तो हमारा पर्स उठाने वाले चोबदार हो। तुम्हारी क्या मज़ाल इस पर्स को अपना कह सको। इधर लाओ तुम्हारे तो बाप-दादा भी हमारे दादा जान का पर्स उठा कर चलते रहे हैं। इधर लाओ हमारा पर्स ही नहीं, जो कुछ भी तुम्हारे पास है। बस इसके बाद अपने पूर्व परिचित काम पर लगो, यानी हमारी ओर से मिलने वाली अनुकम्पा की रेवड़ियों के बंटने का इंतज़ार। और गज़ब खुदा का, कोई और चारा न देख कर इंतजार करने के अपने जाने-पहचाने काम में लोग लग भी जाते हैं। जी हां, वही वायदों के व़फा होने का इंतज़ार, उम्मीदों के पूरा होना का इंतज़ार।
यह इंतज़ार कभी पूरा नहीं होता, तो भी इसकी बेसब्री का प्याला भरता नहीं। बहुत सब्र है इस देश की भाग्य रेखाओं में। भाग्यवाद समझ करोड़ों लोग अपनी हथेलियों पर इन सौभाग्य रेखाओं के उभरने का इंतज़ार करते रहते हैं, और युग पुरुष अपनी हथेलियों पर सरसों जमा कर चलते बनते हैं।
पीछे इंतज़ार करते लोगों को दे जाते हैं, उनके पूर्व जन्म के पापों के फल के रूप में विश्वास का मंत्र! या यह अभिमंत्र कि यहां पर राजा का बेटा हमेशा राजा ही बनता है, और गरीब का बेटा तरक्की करता है तो फटीचर हो जाता है। फटीचर लोगों की बारात देश की आर्थिक विकास दर के दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो जाने का उत्सव मनाती है। दुनिया के देशों में अपनी आर्थिक शक्ति के श्रेष्ठतर हो जाने का एहसास पाती है, और अपनी खाली जेब का दीवाला मनाती है।

#अधूरे वायदों और टूटी उम्मीदों पर जीते लोग