इस बार अधिक नियोजित रहा किसान मोर्चा
जीत हमारी होगी आ़िखर,
लेकिन मिल कर लड़ना होगा।
संयुक्त किसान मोर्चा के 7 दिवसीय चंडीगढ़ मोर्चे की उपलब्धि के रूप में पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के हस्ताक्षरों वाले पत्र की कापी मेरे सामने पड़ी है जिसमें दर्ज वायदों में सबसे प्रमुख पहले तीन वायदे पंजाब के पानी के हक की लड़ाई से संबंधित हैं। पहला, 25 वर्ष पुराने पानी के समझौते (विधानसभा में) रद्द करके (केन्द्र सरकार को) पुनर्विचार के लिए लिखना। दूसरा, पंजाब पुनर्गठन एक्ट की धाराओं 78, 79 तथा 80 को रद्द करके केन्द्र से रिपेरियन सिद्धांत के अनुसार पानी के विवाद को हल करना तथा तीसरा, डैम सेफ्टी एक्ट को भी विधानसभा में रद्द करना आदि। इसके अतिरिक्त विधानसभा में ही बीज बिल-2025 को वापस लेने हेतु प्रस्ताव पारित करना तथा पंजाब के सहकारी संस्थानों के कज़र् की ‘वन टाइम सैटलमैंट’ करने के बारे में नीति बनाने संबंधी समिति बना कर रिपोर्ट तथा कर्रवाई करने के अलावा पंजाब में गन्ने का दाम देश में सबसे अधिक देने का आश्वासन भी दिया गया है जबकि शेष मांगों के लिए एक समिति बनाए जाना शामिल है।
हालांकि हम नहीं समझते कि संयुक्त किसान मोर्चा की यह जीत पंजाब के पानी के मामले को हल कर देगी, परन्तु यह अवश्य है कि यह जीत मामले के समाधान की ओर एक सार्थक कदम है, क्योंकि यदि पंजाब सरकार पंजाब के पानी से संबंधित ये तीनों मांगें पूरी करके केन्द्र को भेज देती है तो पंजाब की लड़ाई सीधी केन्द्र के साथ हो जाएगी, तथा गेंद केन्द्र के पाले में चली जाएगी। उल्लेखनीय है कि संविधान की स्टेट सूची में दर्ज 17 धारा यह कहती है कि पानी विशुद्ध रूप में स्टेटों (राज्यों) का मामला है। फिर सबको पता है कि केन्द्र सरकार सिर्फ रिपेरियन राज्यों के पानी के विवाद के फैसलों के लिए ही ट्रिब्यूनल बना सकती है, कोई फैसला थोप नहीं सकती, परन्तु पंजाब पुनर्गठन एक्ट की धाराएं 78, 79 तथा 80 उसे पंजाब के पानी के मामले में गैर-कानूनी अधिकार देती हैं। ़खैर, जो मांगें पंजाब सरकार ने मान ली हैं, उनके मुताबिक यदि सरकार वे प्रस्ताव विधानसभा में पारित करके केन्द्र को भेज देती है तो पंजाब का केस मज़बूत होगा। परन्तु केन्द्र को मनाने के लिए पंजाब को एक लम्बी लड़ाई तो लड़नी ही पड़ेगी, पर लड़ाई जीतने के लिए अकेले किसान संगठन ही नहीं, पंजाब की राजनीतिक पार्टियों को भी एकजुट होकर स्टैंड लेना पड़ेगा। परन्तु अफसोस की बात तो यह है कि चाहे संयुक्त किसान मोर्चा ने यह शुरुआती मोर्चा सूझ-बूझपूर्ण राणनीति से जीत लिया है, परन्तु जिस प्रकार किसान संगठन गुटों में बंटे हुए हैं, उसे देखते हुए यह लड़ाई केन्द्र से जीतना कठिन ही प्रतीत होता है, क्योंकि इसके लिए ज़रूरी है कि पंजाब के सभी किसान संगठन तथा यहां तक कि राजनीतिक दल भी एकजुट हों। इस समय एक अनुमान के अनुसार पंजाब में लगभग 70-80 किसान संगठन हैं और 4 प्रमुख गुट हैं, जिनके नेताओं का अपना अहंकार बहुत बड़ा है। अपने निजी लाभ की बात तो अलग है। वैसे जहां किसानों ने पानी के मामले को ज़ोरदार ढंग से उठाया है, अच्छा होता कि यदि वे पंजाब विधानसभा में वाघा और हुसैनीवाला सीमा के माध्यम से व्यापार शुरू करने की मांग का भी प्रस्ताव पारित करवाने को प्राथमिकता देते, क्योंकि यह पंजाब की खुशहाली की असली कुंजी है। ़खैर, एकता ज़रूरी है।
आओ मिल कर एकता की मशअलें रौशन करें,
दो ही दिन में ऩफरतों का ़खात्मा हो जाएगा।
—आलम निज़ामी
पर्दे के पीछे की कहानी
नि:संदेह पंजाब सरकार को पानी संबंधी तथा अन्य मांगों के बारे में विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने के लिए मनाने में संयुक्त किसान मोर्चा की उचित रणनीति तथा चुनावों के बिल्कुल निकट समय के चयन का बड़ा हाथ है, परन्तु फिर भी प्रत्येक मोर्चे की सफलता अथवा असफलता के पीछे पर्दे के पीछे की एक कहानी होती है। हमारी जानकारी के अनुसार पहले तो पंजाब सरकार इस मोर्चे को दृष्टिविगत ही करती प्रतीत हो रही थी, परन्तु जब संयुक्त किसान मोर्चे ने शांतिमय रहते हुए मोर्चा 7 दिन के बाद भी जारी रखने और चंडीगढ़ के सभी मार्ग घेरने के संकेत दिए तो एक ओर चंडीगढ़ प्रशासन का दबाव बढ़ा होगा तथा दूसरी ओर मोर्चा लम्बा होने की आशंका के दृष्टिगत पंजाब सरकार को चुनाव निकट होने के कारण राजनीतिक नुकसान का डर भी होगा, क्योंकि पंजाब सरकार यह आरोप तो अपने पर नहीं ले सकती थी कि वह पंजाब की मांगों की विरोधी है।
विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान शायद कुछ निजी कारणों से किसान नेताओं से बातचीत में स्वयं शामिल नहीं होना चाहते थे, परन्तु यह सच्चाई है कि उनकी मज़र्ी के बिना विधानसभा में पानी संबंधी समझौते रद्द करने तथा अन्य प्रस्ताव उनके सहयोग के बिना पास नहीं हो सकते। हमारी जानकारी के अनुसार बातचीत शुरू होने से पहले पर्दे के पीछे की गतिविधियां काफी तेज़ हो गई थीं। यह ट्रैक-2 की बातचीत प्रत्येक मोर्चे, प्रत्येक लड़ाई में ही चलती है। इसके बगैर किसी समझौते पर पहुंचना असम्भव सा ही होता है। हमें पता चला है कि इस उद्देश्य के लिए अंत में मुख्यमंत्री के करीबी राजबीर सिंह घुम्मण तथा एक मंत्री संयुक्त किसान मोर्चा के कुछ वरिष्ठ नेताओं से मिले और लगभग अढ़ाई घंटे लम्बी बातचीत में प्रत्येक मांग पर विचार-विमर्श किया गया, जिसकी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को दी गई, जिसके बाद कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां तथा स्वास्थ्य मंत्री डा. बलबीर सिंह ने संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं बलबीर सिंह राजेवाल, हरिन्दर सिंह लक्खोवाल, बूटा सिंह बुर्जगिल, रामिन्दर सिंह पटियाल तथा हरमीत सिंह कादीयां से औपचारिक बातचीत की। किसान नेता इस बात पर अडिग हो गए थे कि जो माना गया है, वह लिखित रूप में दिया जाए। उल्लेखनीय है कि पानी के मामले का नेतृत्व बलबीर सिंह राजेवाल के ज़िम्मे था और अन्य मामले अलग-अलग नेताओं ने पेश किए थे। आश्चर्यजनक बात यह रही कि इस बार यह भी देखा गया कि कौन-सी किसान यूनियन कितनी ट्रालियां और कितने लोग लेकर संघर्ष में शामिल हुई है।
ज़माने भर से तआलुक की पर्दा-दारी है,
किसे बताएं कि अब तू हमारे साथ नहीं।
—इब्राहीम अली जीशान
कांग्रेस 2027 तथा 2029 की तैयारी की ओर
कांगे्रस 2027 के विधानसभा चुनावों तथा 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए नये प्रयोग कर रही है। पंजाब कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव राहुल गांधी के नाम पर ही लड़े जाएंगे और मुख्यमंत्री के नाम का फैसला चुनाव जीतने के बाद ही होगा। पंजाब कांग्रेस का एकजुट चेहरा दिखाने की कवायद कितनी सफल होती है, यह तो समय ही बताएगा, परन्तु एक बात स्पष्ट है कि राहुल गांधी अब जैन-ज़ी को बहुत महत्व देने लगे हैं। राहुल ने युवाओं के आगे लाने के लिए ऐसे युवाओं की टीम तैयार करनी शुरू कर दी है, जिन्हें ईडी तथा सीबीआई का भय न हो। उन पर पहले के कार्यों का कोई बोझ न हो और वे धरातल पर कांग्रेस के लिए काम कर चुके हों। हमारी जानकारी के अनुसार पार्र्टी के लगभग 200 ऐसे युवाओं की सूची तैयार की है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी तथा के.सी. वेणुगोपाल इन युवाओं की 10 जनपथ में 10-10 ग्रुपों में इंटरव्यू लेकर परख कर रहे हैं, कि उन्हें स्थानीय, दूसरे राज्यों, राष्ट्रीय मामलों तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की कितनी समझ है? उल्लेखनीय है कि इन युवाओं में से ऐसे युवा चुने जाएंगे जो सीधे राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव बनाए जाएंगे और उनको दूसरे राज्यों में धरातल पर कांग्रेस का संगठन बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाएगी। उनकी ओर से पहले किए गए कार्यों की फाइलें राहुल गांधी की टेबल पर हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि जो युवा किसी बड़े कांग्रेस नेता का सिफारिशी पत्र लेकर पहुंचे थे, उनको तुरंत दौड़ से बाहर निकाल दिया गया है।
वास्तव में राहुल गांधी ऐसे लोगों की टीम बनाना चाहते हैं, जो उनके विज़न (दृष्टिकोण) पर चल सकें। सचिन पायलट को पंजाब तथा रणदीप सुरजेवाला को गुजरात की बागडोर सौंपना भी तुलनात्मक रूप से युवाओं को आगे लाने की ही नीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब देखना होगा कि नये युवाओं को कमांड सौंपने का पुराना नेतृत्व विरोध करता है या नहीं। दूसरा, ये युवा अधिकतर किसी बड़े नेता के बेटे आदि नहीं होंगे और बताया गया है कि राहुल गांधी 60 प्रतिशत राष्ट्रीय सचिवों के रूप में नये नियुक्त करके नई कांग्रेस बनाना चाहते हैं। यह प्रयोग कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा।
अब ज़रा सा फासला रख कर जलाता हूं चराग,
तजुर्बा ये हाथ आया हाथ जल जाने के बाद।
(आलम खुर्शीद)
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