सहकारी सुधारों के लिए नई पहल की ज़रूरत
पंजाब में सहकारिता की कहानी हरित क्रांति से भी पुरानी है— उस दौर से पहले की, जब हरित क्रांति ने पंजाब को देश का अन्न भंडार बनाया। राज्य उससे पहले ही ग्रामीण सहकारी समितियों का एक असाधारण रूप से सघन नेटवर्क खड़ा कर चुका था, जिसने ऋण, बीज और खाद को हर किसान की आसान पहुंच में ला दिया था। जब हमारे पिता और यहां तक कि दादा गेहूं बोने निकलते थे तो वे आर्थिक सहायता के लिए बैंक का दरवाज़ा नहीं खटखटाते थे। वे गांव की समिति तक पैदल जाते थे, जहां सचिव उनका नाम जानता था, उनकी ज़मीन जानता था, उनकी ज़बान और उनका अतीत जानता था। दोनों पक्ष यह समझते थे कि भरोसा ही असली पूंजी है। आज भी यह नेटवर्क खड़ा है लेकिन समय की मार से चरमरा रहा है। पंजाब में लगभग 3500 प्राथमिक कृषि साख समितियां (पी.ए.सी.एस.) हैं जो 12000 से अधिक गांवों के समूहों में फैली हुई हैं और लाखों किसान जिनके सदस्य हैं।
पंजाब राज्य सहकारी बैंक और ज़िला स्तर के सहकारी बैंकों के माध्यम से हर सीज़न से पहले हज़ारों करोड़ रुपये का अल्पकालिक फसली ऋण रियायती दरों पर किसानों तक पहुंचता है। फिर भी बुआई के बाद भुगतान में होने वाली देरी कई बार किसान को साहूकार के ब्याज के जाल में फंसा देती है।
एशिया की सबसे प्रमुख विपणन सहकारी संस्थाओं में से एक ‘पंजाब मार्कफेड’ इस बात का उदाहरण है कि किस तरह राज्य ने सहकारिता का एक बेहतरीन मॉडल खड़ा किया। यह अनाज की खरीद करता है, उत्पाद बनाता और उनका विपणन करता है तथा किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए एक संस्थागत माध्यम देता है। मिल्कफेड का वेरका ग्रामीण परिवारों से रोज़ लाखों लीटर दूध एकत्र करता है। इनमें बड़ी संख्या छोटे और सीमांत किसानों की है और एक बड़ा हिस्सा महिलाओं का है और रोज़ के इस अतिरिक्त दूध को एक नियमित आमदनी में बदल देता है, जिससे बच्चों की स्कूल फीस और बिजली के बिल चुकते हैं। सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलें दोआबा और माझा की गन्ना पट्टी को सहारा देती हैं।
सहकारी क्षेत्र की संस्थाएं केवल ग्रामीण कल्याण की संस्थाएं नहीं हैं। वे पंजाब के सबसे व्यापक रूप से फैले सार्वजनिक उद्यमों में से हैं, जिनके मालिक स्वयं लोग हैं। ये कृषि और ग्रामीण रोज़गार को सहारा देती हैं, घरेलू आय को स्थिरता देती हैं और शहरी उपभोक्ताओं को किफायती वस्तुएं, आवास और सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। पिछले तीन दशकों में राज्य के सहकारी ढांचे में ऐसी कमज़ोरियां जमा हो गई हैं जिन्हें अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह ध्यान में रखना होगा कि किसी प्रिय संस्था के बारे में ईमानदार होना उसके प्रति बेवफाई नहीं है। जब संस्थागत ऋणदाता अनिश्चित हो जाता है तो किसान फिर आढ़तियों की व्यवस्था की ओर लौटता है, जिससे कज़र् का चक्र बनता है और यह पंजाब की कई सामाजिक समस्याओं की जड़ बनता है। इसलिए मज़बूत सहकारी साख व्यवस्था केवल एक बैंकिंग सुधार नहीं है। यह सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव का एक ज़रूरी औज़ार है।
इसके बाद आती है प्रबंधन और शासन की कमज़ोरी। प्रबंध समितियों के चुनाव कई बार टलते रहते हैं और सहकारी समितियां लंबे समय तक प्रशासकों के अधीन चलती रहती हैं। बोर्ड सदस्यों के प्रति जवाबदेह होने के बजाय राजनीतिक निष्ठावानों के ठिकाने बन जाते हैं। ऑडिट अधूरे रह जाते हैं और निष्क्रिय समितियां बिना कोई सेवा दिए सरकारी रिकॉर्ड में बनी रहती हैं।
गिरावट का एक और बड़ा कारण समय से आगे सोचने में विफलता है। कई पी.ए.सी.एस. आज भी बस एक ही काम कर रही हैं। गेहूँ और धान के लिए फसली ऋण बांटना और उसकी वसूली करना। खरीद केंद्र, भंडारण, संचालन, कस्टम हायरिंग केंद्र, खुदरा दुकानें या विविध सेवाएं विकसित करने के प्रयास नहीं दिखते। नतीजतन पी.ए.सी.एस. का आय आधार सीमित रह गया है, उनका मानव संसाधन कम उपयोग में है और युवा किसानों के लिए उनकी प्रासंगिकता घटी है।
सहकारी चीनी मिलों को आधुनिकीकरण और पेराई क्षमता में बड़े सुधार की ज़रूरत है। निजी डेयरियों से मुकाबले के लिए मिल्कफेड को दूध संग्रह, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और कोल्ड-चेन ढांचे को मज़बूत करना होगा। पंजाब को गांव स्तर पर विकेंद्रीकृत भंडारण की भी ज़रूरत है ताकि किसान न तो मजबूरी में सस्ते दाम पर बेचें और न ही उपज को लंबी दूरी तक ढोने को विवश हों।
अच्छी बात यह है कि पंजाब को समाधान नए सिरे से गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। 2021 में कृषि मंत्रालय से अलग कर सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद और मंत्रालय की कमान संभाल रहे देश के ऊर्जावान नेता अमित शाह के नेतृत्व में, सहकारी क्षेत्र के पुनरुद्धार के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार हुआ है। अब पंजाब का काम है कि वह इसे तेज़ी और गंभीरता के साथ अपनाए।
सबसे पहली प्राथमिकता केंद्र द्वारा समर्थित राष्ट्रीय परियोजना के तहत पी.ए.सी.एस. का कम्प्यूटरीकरण है। गांव की समितियों को एक साझा एंटरप्राइज़ रिसोर्स प्लानिंग (ई.आर.पी.) प्लेटफॉर्म पर लाना, जो ज़िला सहकारी बैंकों और नाबार्ड से जुड़ा हो, खातों को अधिक पारदर्शी बना सकता है, रिकॉर्ड-कीपिंग सुधार सकता है और समय पर ऑडिट में मदद करेगा। राज्य के सहकारी तंत्र को राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) तथा नई बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियों, डेयरी सहकारी समितियों और मत्स्य सहकारी समितियों के गठन से जुड़ी पहलों का भी पूरा लाभ उठाना चाहिए।
दूसरी श्वेत क्रांति के राष्ट्रीय अभियान के तहत डेयरी सहकारी संस्थाओं को मज़बूत करने से मिल्कफेड दूध संग्रह बढ़ा सकता है, गुणवत्ता जांच सुधार सकता है, महिलाओं की भागीदारी मज़बूत कर सकता है, पनीर दही और पैकेज्ड प्रोटीन उत्पादों जैसे अधिक मूल्य वाले उत्पाद विकसित कर सकता है और अधिक राजस्व कमा सकता है। सहकारी संस्थाओं को किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), ई-नाम, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यात बाज़ारों से भी प्रभावी ढंग से जोड़ा जाना चाहिए। किसान की सहकारी संस्था को केवल गेहूँ या धान उगाने में मदद नहीं करनी चाहिए। उसे प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और अधिक मूल्य पर उत्पाद बेचने में भी मदद करनी चाहिए। पंजाब के सहायक कृषि क्षेत्र- बागवानी, डेयरी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण-विशाल संभावनाएं रखते हैं।
केंद्रीय मंत्रालय के सक्रिय हस्तक्षेप के साथ-साथ शहरी उपभोक्ताओं को भी लाभ मिलेगा। एक मज़बूत सहकारी तंत्र किफायती दवाएं, भरोसेमंद खाद्य उत्पाद, वाजिब कीमत पर आवास, कचरा प्रबंधन सेवाओं और छोटे उद्यमों के लिए ऋण उपलब्ध करा सकता है। पेशेवर ढंग से चलाए जाने पर सहकारी संस्थाएं सार्वजनिक उद्देश्य और आर्थिक दक्षता— दोनों को एक साथ ला सकती हैं। हालांकि सुधार का अर्थ सरकारी नियंत्रण का हद से ज्यादा बढ़ जाना नहीं होना चाहिए, क्योंकि सहकारी संस्थाएं लोगों की, यानी अपने सदस्यों की हैं। सरकार को आर्थिक सहयोग, नियामक ढांचा और तकनीक आधारित प्रशिक्षण देना चाहिए। रोज़मर्रा के कामकाज की ज़िम्मेदारी निर्वाचित सदस्यों और पेशेवर प्रबंधकों पर ही रहनी चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप की जगह प्रदर्शन आधारित जवाबदेही को लेनी चाहिए। पंजाब का सहकारिता आंदोलन इस सिद्धांत से जन्मा था कि अकेले खड़े रहने के बजाय मिलकर काम करने से किसान अधिक हासिल कर सकते हैं। यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हरित क्रांति से पहले था। सबक यह नहीं है कि सहकारिता को छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि उसके नवीनीकरण के लिए काम किया जाए।
सांसद (राज्यसभा)



