9/11 पर अमरीका का यू-टर्न कूटनीतिक मजबूरी या सिद्धांतविहीन समझौता ?
11 सितम्बर, 2001 के बर्बर आतंकवादी हमलों की 25वीं बरसी के पहले ही अमरीका का एक चौंकाने वाला और गंभीर विवाद खड़ा करने वाला फैसला सामने आया। वाशिंगटन ने अल-कायदा और उसकी सीरियाई शाखा से संबंध रखने वाले कई प्रमुख आतंकियों, कमांडरों, फाइनेंसरों और विचारकों के नाम अपनी प्रतिबंधित सूची से हटा दिए हैं। इस सूची में सऊदी धर्मगुरु अब्दुल्ला मुहयसिनी, अबू सुलेमान अल-मुहाजिर, शफी, सुल्तान मोहम्मद अल-अजमी और अब्दुल समरेज जशारी जैसे नाम शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यह निर्णय सीरिया के नए सत्ताधीश अहमद अल-शरा (पूर्व में अबू मोहम्मद अल-जुलानी) के अनुरोध पर लिया गया है जो खुद अल-कायदा की पूर्व शाखा ‘अल-नुसरा फ्रंट’ का सरगना रहा है और जिसने बाद में अपने संगठन का नाम बदलकर ‘हयात तहरीर अल-शाम’ (एचटीएस) कर लिया था। यह फैसला अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सिद्धांतों के हृस और अमरीका की अवसरवादी विदेश नीति का एक ज्वलंत और चिंताजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अमरीकी प्रशासन के इस कदम का पहला और प्राथमिक उद्देश्य सीरिया में नए प्रशासनिक और राजनीतिक यथार्थ को औपचारिक मान्यता देना है। बशर अल-असद के अधिनायकवादी शासन के पतन के बाद अमरीका यह दर्शाना चाहता है कि यदि कोई कट्टरपंथी या उग्रवादी संगठन अतीत में वैश्विक आतंकवाद से जुड़ा रहा हो लेकिन समय के साथ वह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को ढाल लेता है, क्षेत्रीय स्थिरता का वादा करता है और अल-कायदा जैसे नेटवर्क से दूरी बना लेता है, तो वाशिंगटन उसके प्रति व्यावहारिक और लोचदार दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है। अमरीका दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह सीरिया में आर्थिक पुनर्निर्माण, संस्थागत स्थिरता और मानवीय सहायता के प्रवाह को बाधित नहीं करना चाहता जो बिना प्रतिबंधों में ढील दिए संभव नहीं था।
इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्व के व्यापक भू-राजनीतिक मानचित्र पर इस निर्णय के गहरे निहितार्थ हैं। सीरिया में सुन्नी बहुसंख्यक प्रशासन को आर्थिक और कूटनीतिक राहत देकर अमरीका वास्तव में इस क्षेत्र में ईरान के प्रभाव वाले ‘प्रतिरोध के अक्ष’ को हमेशा के लिए ध्वस्त करना चाहता है। असद शासन के पतन के बाद ईरान और रूस के प्रभाव क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुआ है, वाशिंगटन उस जगह को अपने अनुकूल शक्तियों से भरना चाहता है। वाशिंगटन का मानना है कि यदि अहमद अल-शरा के नेतृत्व वाले नए सीरियाई प्रशासन को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों और मुख्यधारा से अलग-थलग रखा गया तो वह पुन: उग्रवाद का केंद्र बन सकता है या फिर अन्य विरोधी ताकतों के पाले में जा सकता है। विश्व राजनीति में जब आतंकवाद की परिभाषा राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक सहूलियतों के आधार पर तय होने लगती है तो वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था का नैतिक और कानूनी आधार ही चरमरा जाता है। वाशिंगटन भले ही इसे सीरिया में शांति, स्थिरता और पुनर्निर्माण की दिशा में उठाया गया व्यावहारिक कदम करार दे, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, सुरक्षा विशेषज्ञों और आतंकवाद-विरोधी विश्लेषकों के बीच इसका बेहद नकारात्मक और आत्मघाती संदेश जा रहा है। स्पष्ट संदेश यह है कि आतंकवाद के खिलाफ अमरीका की प्रतिबद्धता सैद्धांतिक न होकर विशुद्ध रूप से अवसरवादी है। दुनिया यह देख रही है कि जिन चेहरों को अमरीका ने दो दशकों तक दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादियों की सूची में रखा, जिनके सिर पर लाखों डॉलर का इनाम घोषित किया और जिनके सफाए के लिए पूरी दुनिया में सैन्य अभियान चलाए, उन्हें सिर्फ इसलिए माफा कर दिया गया क्योंकि वे आज अमरीका के तात्कालिक राजनीतिक और रणनीतिक हितों के अनुकूल बैठते हैं।
यह फैसला उन हज़ारों निर्दोष लोगों और उनके परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है जिनके परिजनों ने अमरीकी सरजमीं पर हुए सबसे भयानक आतंकी हमले में अपनी जान गंवाई थी। आतंकवाद के खिलाफ ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का दम भरने वाले देश का यह यू-टर्न यह साबित करता है कि वाशिंगटन के लिए ‘आतंकवाद की परिभाषा’ स्थिर नहीं है, जो कल तक दुश्मन था, वह आज केवल राजनीतिक गठबंधन बदलने से मित्र या साझेदार बन सकता है। यह रुख वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई की नैतिक साख को गहरा आघात पहुंचाता है। अमरीका दुनिया को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि वह मध्य पूर्व में एक नए, शांतिपूर्ण और असद-मुक्त युग का निर्माण कर रहा है, लेकिन वास्तव में इस कदम से दुनिया में अमरीका की छवि एक ऐसी महाशक्ति की बन रही है जो अपने क्षणिक हितों के लिए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंड और नैतिक मूल्यों का सौदा कर सकती है। (अदिति)

