सिख सैनिकों के शौर्य की अमर गाथा सारागढ़ी की जंग

आज सारागढ़ी दिवस पर विशेष

कभी-कभी इतिहास में ऐसी लड़ाइयां होती हैं, जिनका महत्व इस बात से तय नहीं होता कि उनमें कौन जीता, कौन हारा। यह महत्व इस बात से तय होता है कि विपरीत परिस्थितियों में इंसान अपने कर्त्तव्य के लिए कितनी दूर तक खड़ा रह सकता है। सारागढ़ी की लड़ाई ऐसी ही एक घटना है, जहां 21 सैनिकों का प्रतिरोध सैन्य इतिहास की घटना से बढ़कर शौर्य, अनुशासन और कर्त्तव्य-निष्ठा का प्रतीक बन गयी। 12 सितम्बर 1897 को तत्कालीन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में सारागढ़ी की एक छोटी-सी संचार चौकी पर हज़ारों अफरीदी और ओरकजई कबायली लड़ाकों ने हमला कर दिया। इस चौकी की रक्षा ब्रिटिश भारत की सेना की 36वीं सिख रेजिमेंट के 21 सैनिक कर रहे थे। संख्या का यह अंतर इतना बड़ा था कि बिना कुछ सोचे, समझे भी इस लड़ाई का नतीजा तय था। फिर भी इन सैनिकों ने चौकी छोड़कर भागने की बजाय मोर्चा संभाला और अंत तक लड़ते रहे। 
सारागढ़ी कोई बड़ा किला नहीं था, यह दो महत्वपूर्ण ब्रिटिश सैन्य ठिकानों फोर्ट लॉकहार्ट तथा फोर्ट गुलिस्तान के बीच संदेशों के आदान-प्रदान के लिए एक संचार चौकी थी। वहां तैनात सैनिकों का काम केवल हथियार उठाना भर नहीं था बल्कि निगरानी और संदेश पहुंचाना भी था। हमले के दौरान सारागढ़ी के संकेत देने वाले सिपाही गुरुमुख सिंह ने लगातार अपने वरिष्ठ अधिकारियों को स्थिति की जानकारी दी। हमलावरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। चौकी को चारों ओर से घेर लिया गया। तब सैनिकों के सामने आत्म-समर्पण या पीछे हटने का विकल्प भी था। लेकिन उन्होंने इसे चुनने की बजाय प्रतिरोध जारी रखा। हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में 21 सैनिकों ने आखिरी सांस तक मोर्चा संभाले रखा। अंतत: ये सभी मारे गये और सारागढ़ी चौकी पर हमलावरों का कब्ज़ा हो गया, लेकिन उन्होंने अपने अदम्य साहस से जो लड़ाई लड़ी, वह इतिहास में अमर हो गई। बाद में ब्रिटिश भारतीय सेना ने इन सभी रक्षकों को मरणोपरांत ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ मैरिट’ से सम्मानित किया, जो उस समय भारतीय सैनिकों के लिए सर्वोच्च वीरता सम्मान था। 
हम अकसर वीरता को विजय के साथ जोड़कर देखते हैं। विजेता को वीर और पराजित को कमज़ोर मान लेते हैं। लेकिन सारागढ़ी की जंग इस धारणा के विपरीत है। यहां सैन्य परिणाम भले चौकी रक्षकों के पक्ष में नहीं गया, परन्तु उनकी वीरता पर सवाल उनके दुश्मन भी कभी नहीं उठा सके, क्याेंकि शौर्य का मूल्यांकन हमेशा परिणाम को देखकर नहीं, संकल्प के जज़्बे से होता है। इस चौकी का हर सैनिक जानता था कि युद्ध में उसकी मृत्यु तय है, लेकिन प्रशिक्षण ने उसे यह भी सिखाया था कि भय के बावजूद कर्त्तव्य को नहीं छोड़ना। सारागढ़ी में यही सैन्य संस्कार अंतिम रूप में दिखायी देता है। वीरगति को प्राप्त हुए सभी 21 सैनिक पहले से जानते थे कि दुश्मन संख्या में इतना ज्यादा है कि किसी भी सहायता के पहुंचने के पहले उनकी मौत तय है। फिर भी उन्होंने अपनी कोशिश, अपना अदम्य कर्त्तव्य एक पल के लिए नहीं छोड़ा। इसलिए सारागढ़ी की यह लड़ाई, हार-जीत के परिणाम से ऊपर उठकर शौर्य की संस्कृति बन गई।
सारागढ़ी के 21 सैनिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली पक्षों में से एक को सामने रखते हैं कि मनुष्य परिस्थितियों से बड़ा हो सकता है। संख्या कम हो सकती है, संसाधन सीमित हो सकते हैं, परिणाम प्रतिकूल हो सकता है, लेकिन कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा और आत्म-सम्मान का निर्णय मनुष्य के अपने हाथ में रहता है। इसलिए सारागढ़ी की लड़ाई हार की कहानी नहीं, शौर्य की अमर कहानी बन गई। यह कहानी बताती है कि कुछ लड़ाइयां शरीर जीतता है या हारता है, लेकिन चरित्र उन्हें हमेशा के लिए जीत लेता है। सारागढ़ी की यही सबसे बड़ी विरासत है—जीत से बड़ी डटे रहने की प्रतिज्ञा और वीरता से आगे बढ़कर शौर्य की संस्कृति।
सारागढ़ी में शौर्य दिखाने वाले 21 जवान थ—हवलदार ईशर सिंह, नायक लाल सिंह, नायक चंदा सिंह, सिपाही सुंदर सिंह, राम सिंह, उत्तम सिंह, साहिब सिंह, हीरा सिंह, जीवन सिंह, भगवान सिंह, भगवाना सिंह, गुरुमुख सिंह, गुरुबख्श सिंह, राम सिंह, दया सिंह, नारायण सिंह, जीवन सिंह, भोला सिंह, गुरुदयाल सिंह, गुरुमुख सिंह और साहिब सिंह। संकेत देने वाले सिपाही गुरुमुख सिंह ने हमले के दौरान लगातार संदेश भेजकर फोर्ट लॉकहार्ट को स्थिति की जानकारी दी। जब चौकी का अंतिम प्रतिरोध भी टूट गया, तब तक सभी रक्षक समाप्त हो चुके थे, क्योंकि सभी 21 सैनिक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। (एजेंसी)

#सिख सैनिकों के शौर्य की अमर गाथा सारागढ़ी की जंग