प्राकृतिक झीलों की नगरी है नैनीताल

सुदूर पर्वतांचल देवभूमि उत्तराखंड में समुद्र तल से 1958 मीटर की ऊंचाई पर बसा खूबसूरत पर्यटक स्थल नैनीताल, वर्षों से देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है। इसके अलावा यह स्थल उत्तम शिक्षा का केन्द्र भी समझा जाता है। नैनीताल की खोज 18 नवम्बर 1841 को बैरन नामक अंग्रेज ने की थी जो अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ पर्वतीय भ्रमण पर निकले थे। उस वक्त विदेशी शासन के चलते अंग्रेजों के नैनीताल की जलवायु और चारों ओर से घिरा हुआ प्राकृतिक सौंदर्य इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने इसे तत्कालीन संयुक्त प्रान्त की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया। ग्रीष्मकाल में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल नैनीताल में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए राजभवन में ही रहते है।
नैनीताल में प्रवेश करते ही मनोरम झील आगन्तुकों का स्वागत करती है जो नैनी झील के नाम से प्रसिद्ध है। इस झील की विशेषता यह है कि इसमें वर्ष भर सिर्फ अपने अदृश्य जल स्रोतों का ही पानी भरा रहता है।
नैनी झील के उद्भव को लेकर भी अनेक कथायें प्रचलित हैं। महाभारत युद्ध से लेकर मां दुर्गा द्वारा राक्षसों का वध करने तक अलग-अलग कथाओं से इसके उद्गम को जोड़ा जाता है। एक दंत कथा के अनुसार अत्रि, पुलस्त्य तथा पुलह ऋषियों ने पवित्रा मानसरोवर झील के जल से नैनी झील का निर्माण किया था, इसलिए उसे लघु मानसरोवर भी कहा जाता है। नैनीताल शहर की पेयजल व्यवस्था पूरी तरह से इसी झील पर निर्भर करती है।
नैनीताल के पर्वत, मंदिर तथा आसपास की झीलें अपने आप में अपना इतिहास संजोये हैं। यहां लगभग दर्जन भर से अधिक मंदिर तथा झीलें हैं तथा आधे दर्जन से अधिक चोटियां हैं। सबसे अधिक लगभग सौ से अधिक वर्ष पुराने मंदिर में नयना देवी को पूजा जाता है। यहां के लोगों का मानना है कि नयना देवी उन्हें हर आपदा से बनाए रखती है तथा उनकी मनोकामना पूर्ण करती है। यह मंदिर मल्लीताल क्षेत्र में एक मात्रा खेल के मैदान के बगल में है।
नैनीताल की पहली सबसे ऊंची-चोटी नैना पीक है, (ऊंचाई 2270 मीटर)। यहां से भारत की कई ऊंची तथा प्रसिद्ध चोटियों के साथ-साथ हिमालय को पूरे बर्फ से ढका हुआ देखा जा सकता है। इनके अतिरिक्त टिफिन टाप, किलवरी बारापत्थर, लैन्डस एंड आदि प्रमुख चोटियां हैं। इन चोटियों पर अपनी सुविधानुसार पैदल अथवा घोड़े पर जाया जा सकता है। स्नो व्यू जाने के लिए रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध रहती है। नैनीताल के आस-पास भी अनेक मनोहारी झीलें हैं जिनका संबंध महाभारत काल से माना जाता है। इनमें मुख्य है भीमताल जहां झील के बीचों बीच एक सुन्दर टापू है, नौ कोनों वाला कमल के फूलों से भरा नौकुचियाताल, सात सरोवरों का सुन्दर समूह स्थान सात ताल, नल-दमयंती ताल, खुर्पाताल इत्यादि। इन्हीं सुन्दर तथा मनमोहक झीलों के कारण नैनीताल को झीलों की नगरी तथा सरोवर नगरी के नाम से जाना जाता है। यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक इन झीलों में नौकायन का आनन्द उठाते है। सुंदर पहाड़ तथा मनोहारी प्राकृतिक दृश्य यहां पर्यटकों को तो आकर्षित करते ही हैं, साथ-ही-साथ यहां का शांत वातावरण शिक्षा के लिए भी उत्कृष्ट स्थान माना जाता है। नैनीताल से शिक्षा प्राप्त कर चुके अनेक विद्यार्थी इस वक्त विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे है। इस वक्त भी यहां के दर्जनों स्कूलों में देश के कोने-कोने से आये छात्रा-छात्राओं के साथ-साथ कई विदेशी छात्रा-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अपनी खोज के डेढ़ सौ से अधिक वर्षों के बाद से जहां नैनीताल ने विभिन्न क्षेत्रों में बहुत प्रगति की है, वहीं आज नैनीताल के संरक्षण का जिम्मा उठाये विभागों की अदूरदर्शिता, गलत नीतियों तथा रख रखाव की कमी के कारण झीलों में प्रदूषण दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। बिल्डरों द्वारा बड़े-बड़े निर्माण कार्य करवाए जाने के कारण, अवैध खनन तथा वनों की अंधाधुंध कटाई करवाई जा रही है जिससे यहां की जलवायु पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है तथा नैसर्गिक सुंदरता ध्वस्त हो रही है। नैनीताल अपने डेढ़ सौ वर्ष पूरे कर चुका है। (उर्वशी)

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