कहानी-बूट पॉलिश

हमारे मोहल्ले के अगले हिस्से से लगकर ही फोर-लेन सड़क शुरू होती है। उसी मुख्य चौराहे के बाजू में पार्क साइड बस स्टैंड के किनारे, एक झोपड़ीनुमा छोटी-सी दुकान है, जहां जूते दुरुस्त करने और पॉलिश करने का काम होता है। इस दुकान के प्रोपराइटर हैं-श्री राघव आहिरे।
कद-काठी में लंबे-चौड़े, सांवले रंग के, गठीले बदन वाले राघव जी काफी हंसमुख और मिलनसार हैं। हालांकि इस कॉलोनी के चौराहे पर उन्हें दुकान लगाए हुए अभी मात्र दो वर्ष ही हुए हैं। पहले वे खुले आसमान के नीचे ही अपनी दुकान लगाते थे। काफी अरसे से उनके मन में दुकान को झोपड़ीनुमा शक्ल देने की इच्छा थी लेकिन इसके लिए उन्हें नगर निगम वालों की गतिविधियों पर भी नज़र रखनी पड़ती थी।
सड़क के किनारे अस्थायी रूप से बनी दुकानों पर नगर निगम की गाज समय-कुसमय गिरती रहती थी। कब दुकान उखाड़कर ले जाएं, कोई भरोसा नहीं। लेकिन राघव जी की दुकान के साथ ऐसी नौबत आने की संभावना कम थी। एक तरफ बिजली का पोल था और उससे करीब तीन फीट की दूरी पर समानांतर एक कदंब का पेड़। इन दोनों के सहारे उनकी झोपड़ीनुमा दुकान कुछ हद तक सुरक्षित थी।
मैंने भी अपने स्तर पर थोड़ी जांच-पड़ताल की तो पता चला कि इस तरह की जगहों पर बनी छोटी-मोटी दुकानों को आसानी से नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। बस फिर क्या था! हरी झंडी मिलते ही राघव जी ने पोल और पेड़ का सहारा लेकर दुकान को झोपड़ी का आकार दे दिया। इस छोटे-से प्रयास से वे गर्मी और बारिश से बचने में सफल हो गए।
अक्सर दोपहर का अधिकांश समय मेरा उन्हीं के साथ बीतता था।
हालांकि लेखक होने के नाते मैं समाचार-पत्रों में आलेख लिखता रहता हूं। नौकरी में आने से पहले भी समाचार-पत्रों में लिखा करता था। नौकरी लगने के बाद नियमित लेखन तो नहीं हो पाता था, लेकिन सेवानिवृत्त होते ही फिर नियमित रूप से लेखन कार्य में लग गया।
इसीलिए दोपहर में टहलने के उद्देश्य से जब भी निकलता, तो एक-डेढ़ घंटे के लिए वहीं बैठ जाता। राघव जी से तरह-तरह की बातें और विचार-विमर्श होता रहता। मुझे देखकर दो-चार और लोग भी वहां आ जाते और हमारी छोटी-सी बैठक जम जाती।
हालांकि बीच-बीच में राघव जी को दुकान बंद करके जाना पड़ता था। दरअसल, वे प्लंबिंग का काम भी करते थे। इधर का काम देखते तो उधर की दुकान बंद करनी पड़ती और दुकान संभालते तो प्लंबिंग का काम छूट जाता। इसलिए बीच-बीच में दुकान बंद करना उनकी मजबूरी थी।
जिस मोहल्ले में उनकी दुकान थी, वहां से उनका घर करीब चार किलोमीटर दूर था। अपना मकान नहीं था, किराए के मकान में रहते थे। भरा-पूरा परिवार था। दो बेटे और एक बेटी। बेटी की शादी हो चुकी थी। दोनों बेटे अभी पढ़ रहे थे। छोटा बेटा एक कंपनी में नौकरी करता था, जबकि बड़ा बेटा कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का कोर्स करने के बाद नौकरी पाने के लिए अथक प्रयास कर रहा था।
राघव जी से मेरा नियमित मिलना-जुलना था। इसलिए जब कभी उन्हें लघुशंका लगती या चाय पीने की तलब होती, तो दुकान मेरे भरोसे छोड़कर चले जाते। कभी-कभी मुझसे भी कहते-
‘साहब, आप भी चलिए।’
मैं हंसकर कहता- ‘भाई, मेरा घर तो यहीं बाजू में है। आप पीकर आइए।’
उनके जाते ही मैं उनका ब्रश उठाकर अपने जूतों पर फेरने लगता। जब तक वे वापस आते, तब तक कभी-कभार एक-दो ग्राहक भी आ जाते थे। हालांकि हर बार ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं था।
लेकिन उस दिन तो गजब ही हो गया!
जैसे ही राघव जी चाय पीने के लिए गए, मैं उनका ब्रश लेकर अपने जूतों की धूल साफ कर ही रहा था कि तभी एक ग्राहक ने अपना जूता उतारकर मेरी तरफ बढ़ा दिया।
उसने पूछा- ‘पॉलिश का कितना हुआ, काका?’
हालांकि वह मेरे लिए बिल्कुल अनजान ग्राहक था। शायद पहली बार ही दुकान पर आया था। अगर पहले से दुकान पर आता-जाता होता तो दुकानदार के बारे में पूछता।
मैंने तपाक से कहा- ‘बीस रुपये।’
और पॉलिश करने के लिए जूता अपने हाथ में ले लिया।
अपने जूतों पर पॉलिश करने का अनुभव तो था ही। मैंने पॉलिश की डिब्बी खोली, ब्रश को उसमें डुबोया और शनै:.शनै:जूते पर फेरने लगा। ऐसा करते हुए मुझे तनिक भी महसूस नहीं हुआ कि मैं आखिर कर क्या रहा हूं! (क्रमश:)

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