घर की पूजा से जन-उत्सव तक गणेशोत्सव

14 सितम्बर गणेश चतुर्थी पर विशेष

‘गणपति बप्पा मोरया।’ गणपति बप्पा का उद्घोष सुनते ही फिज़ा का रंग बदल जाता है। ढोल, ताशों की थाप, फूलों की महक, मोदक की मिठास और सजे हुए पंडालों के बीच जब विघ्नहर्ता गणपति विराजते हैं, तो लगता है कि केवल एक देवता का आगमन नहीं हुआ बल्कि पूरे समाज के भीतर छिपी खुशी, आस्था और सामूहिक ऊर्जा जाग उठी है। गणेशोत्सव भारत के उन अद्भुत पर्वों में से है, जिसने समय के साथ अपना स्वरूप बदला है। कभी यह मुख्यत: घरों और मंदिरों की पूजा था। लेकिन आज यह गलियों, मोहल्लों, शहरों और विशाल जन-समुदायों का उत्सव बन चुका है। गणेशोत्सव की खूबसूरती शायद यही है कि इसमें घर की आत्मीयता और समाज की विशालता एक साथ दिखायी देती है। भगवान गणेश भारतीय जनमानस के सबसे निकट देवताओं में माने जाते हैं। वे बुद्धि के देवता हैं, शुभारंभ के प्रतीक हैं और विघ्नों को दूर करने वाले गणपति हैं। कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, कोई विद्यार्थी परीक्षा देने निकलता है, नया घर बनाता है, नई दुकान खुलती है या किसी शुभ कार्य का आरंभ होता है, तो सबसे पहले स्मरण गणेश जी का ही किया जाता है। यही कारण है कि गणेश केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे भारतीय परिवारों के जीवन का हिस्सा हैं।
जब घर आते हैं बप्पा : गणेश चतुर्थी के अवसर पर घरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा अत्यंत भावपूर्ण है। परिवार के लोग घर की सफाई करते हैं, पूजा का स्थान सजाते हैं और पूरे मनोयोग से बप्पा के स्वागत की तैयारी करते हैं। किसी घर में छोटी-सी मिट्टी की प्रतिमा होती है, तो कहीं सजे हुए मंडप में गणपति विराजते हैं लेकिन आकार चाहे जो हो, भावना एक ही होती है- आज हमारे घर बप्पा आएंगे। यही भाव गणेशोत्सव को दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों से अलग और विशेष बनाता है। यहां भक्त केवल दर्शन करने नहीं जाता बल्कि भगवान को अपने घर का सदस्य मानकर उनका स्वागत करता है। उन्हें भोग लगाया जाता है, उनकी आरती की जाती है, उनकी वंदना में गीत गाये जाते हैं और परिवार के सभी लोग उनके सामने एकत्र होते है। मोदक को गणपति का प्रिय भोग माना जाता है। इसलिए गणेशोत्सव के दौरान रसोई भी श्रद्धा का एक सुंदर संसार बन जाती है। कहीं भाप में पके उकडीचे (मिश्रित सामग्री के) मोदक बनते हैं, तो कहीं गुड़ और नारियल की मिठास घर में घुल जाती है। बच्चों के यह उत्सव रंगों और मिठाईयों का पर्व है। बुजुर्गों के लिए परंपरा की स्मृति और युवाओं के लिए परिवार के साथ जुड़ने का उल्लास है।
जब उत्सव ने समाज को जोड़ा : भले इस पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, लेकिन गणेशोत्सव का यह सार्वजनिक और संगठित स्वरूप सिर्फ लगभग डेढ़ सदी पुराना है। 19वीं सदी के अंतिम दौर में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को एक व्यापक सामाजिक स्वरूप दिया। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और लोगों के संगठित होने पर अनेक प्रकार की पाबंदियां थीं। तिलक ने गणेशोत्सव की सामूहिक शक्ति को पहचाना। इसलिए उन्होंने इसे केवल धार्मिक आयोजन न रहने देकर समाज को जोड़ने का माध्यम बना लिया। सार्वजनिक पंडालों में पूजा के साथ-साथ सभाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक संवाद होने लगे। इन पंडालों में जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति की दीवारों के पार लोग एक साथ आने लगे और सामूहिक उत्सव तथा संवाद का हिस्सा होने लगे। इस प्रकार गणेशोत्सव श्रद्धा के साथ राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक एकता का भी रूप ग्रहण किया। फिर धीरे-धीरे यह उत्सव परंपरा महाराष्ट्र से निकलकर सार्वजनिक गणेशोत्सव के रूप में पूरे देश में लोकप्रिय होती गयी। आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों और गांवों तक गणपति पंडाल सजते हैं और हर पंडाल का अपना स्वरूप, अपनी सजावट और अपनी पहचान होती है। 
पंडालों का संसार : गणेशोत्सव के दौरान पंडाल केवल पूजास्थल भर नहीं रहते। कुछ दिनों के लिए ये समाज की सामूहिक बैठक बन जाते हैं। बच्चे वहां खेलते हैं, युवा आयोजन की जिम्मेदारी संभालते हैं, महिला पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सम्पन्न करने में लगी होती हैं और बुजुर्ग परंपराओं का मार्गदर्शन कर रहे होते हैं। कहीं भजन-कीर्तन हो रहा होता है, कहीं शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति सम्पन्न हो रही होती हैं, कहीं नाटक तो कहीं बच्चों की विभिन्न किस्म की प्रतियोगिताएं चल रही होती है। कई स्थानों पर रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच, पुस्तक वितरण और सामाजिक सेवा के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। यही सार्वजनिक गणेशोत्सव की सबसे बड़ी शक्ति है। यह लोगों को केवल एक जगह इकट्ठाभर नहीं करती बल्कि यह शक्ति इन्हें आपस में जोड़ती है। आज के तेज रफ्तार जीवन में जब लोग पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते, उस दौर में जब पूरे मोहल्ले, सोसायटी के लोग एक जगह मिलते हैं, तो उनमें न चाहते हुए एक आत्मीय परिचय हो ही जाता है। वास्तव में गणेशोत्सव के दौरान पूरा मोहल्ला एक साझा परिवार बन जाता है। 
श्रद्धा और उल्लास साथ-साथ : गणेशोत्सव में गंभीर धार्मिकता और जीवन का उल्लास साथ-साथ चलते हैं। सुबह मंत्रों और आरती की ध्वनि गूंजती हैं, तो शाम को ढोल, ताशों की गूंज होती है। कहीं शांति से गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ होता है, तो कहीं गणपति बप्पा मोरया के उत्साहपूर्ण स्वर पूरे वातावरण में गूंज रहे होते हैं। इस पर्व की यही खासियत है कि यहां आस्था उदास नहीं होती, वह मुस्कुराती है, गाती है, नाचती है और लोगों को साथ लेकर चलती है। विशेष रूप से बच्चों के लिए गणेशोत्सव जीवनभर की याद बन जाता है। प्रतिमा के आगमन से लेकर आरती, प्रसाद और विसर्जन तक हर दिन उनके लिए एक नया अनुभव होता है। शायद इसी तरह त्योहार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। पुस्तकों से नहीं बल्कि अनुभवों और स्मृतियों के सहारे। 
विदाई में भी उम्मीद का संदेश : गणेशोत्सव का सबसे भावुक क्षण वह होता है, जिसे विसर्जन कहते हैं। जिन गणपति को कुछ दिन पहले बड़े प्रेम से घर या पंडाल में स्थापित किया गया होता है, जब उन्हें विदा करने का समय आता है, तो सबकी आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन समूचे वातावरण में उदासी नहीं होती बल्कि एक अनोखे किस्म का उत्साह होता है। क्योंकि इस विदाई में वापसी का संदेश मौजूद होता है। ढोल बजते हैं और हजारों कंठ एक साथ पुकार उठते हैं- ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ!’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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