ब्रिक्स अब एक संगठन नहीं, नई विश्व व्यवस्था का ‘ट्रायल’ है

नई दिल्ली में जुटे ब्रिक्स के नेता सिर्फ  एक संगठन की बैठक नहीं कर रहे, अपितु वे उस दुनिया का एक वैकल्पिक खाका खींचने की कोशिश कर रहे हैं, जो अब एक ध्रुवीय नहीं रही। सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स अमरीका को चुनौती देगा या नहीं, असली सवाल यह है कि क्या चीन, भारत, रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और संगठन के दूसरे साझेदार अपने अलग-अलग हितों के बावजूद ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था बना पाएंगे, जिसमें सत्ता, व्यापार, पैसा और निर्णय लेने की ताकत पश्चिमी संस्थाओं के हाथ से निकलकर वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के हाथों में आ जाए।,
जिस तरह 18वें बिक्स सम्मेलन की शुरुआत के पहले ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने ब्रिक्स की ताकत को गिनाया है, उससे भले कोई तात्कालिक नतीजे न निकलें, लेकिन उसके संकेत तो साफ  हैं। ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत के एक दिन पहले 11 सितम्बर, 2026 को व्लादिमिर पुतिन ने ब्रिक्स के बिजनेस फोरम में वैश्विक व्यापार की बात करते हुए कहा, ‘पश्चिम अब कमज़ोर हो रहा है, फिर भी पता नहीं ये देश खुद को जी-7 क्यों कहते हैं? दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा जीडीपी ब्रिक्स देशों से आती है, जबकि जी-7 देशों की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी सिर्फ  29 फीसदी है।’ इसी तरह जब प्रधानमंत्री मोदी ने इस फोरम को संबोधित किया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि आज 11 सदस्य देशों वाले ब्रिक्स में दुनिया की आधी आबादी रहती है। साथ ही अगर अर्थव्यवस्था की बात करें तो ब्रिक्स देशों के पास वैश्विक अर्थव्यवस्था की अकेले 39 फीसदी क्रय शक्ति है, जो कि अमरीकी अर्थव्यवस्था के मुकाबले 3 गुना से भी ज्यादा है। इस तरह देखें तो चाहे रूसी राष्ट्रपति पुतिन हों या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों के ही संबोधन में कहीं न कहीं नई विश्व व्यवस्था की झलक दिख रही थी। यही वजह है कि मौजूदा ब्रिक्स सम्मेलन महज कूटनीतिक कैलेंडर की एक बैठक भर नहीं है, सही मायनों में यह बदलती विश्व व्यवस्था की महत्वपूर्ण परीक्षा है।
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन के साथ हुई थी और फिर इसमें दक्षिण अफ्रीका भी आ जुटा, जिसके बाद यह ब्रिक से ‘ब्रिक्स’ बना। इसके बाद हुए विस्तार ने इसे 11 सदस्यीय समूह में बदल दिया। आज इस वैश्विक संगठन में एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण अमरीका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इसका सबसे बड़ा अर्थ यह है कि ब्रिक्स अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक संवाद मंच भर नहीं रहा। इसकी महत्वाकांक्षा वैश्विक शासन की संरचना पर असर डालने की है और ऐसा हो भी क्यों न, विश्व बैंक, आईएमएफ और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा जैसी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से वैश्विक दक्षिण की शिकायत है कि यह व्यवस्था मौजूदा समय की नहीं बल्कि 20वीं सदी की संरचना को प्रतिबिंबित करती है। वास्तव में ब्रिक्स इसी असंतुलन को चुनौती देने का सबसे बड़ा सामूहिक मंच बनने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स की चर्चा में आमतौर पर सबसे ज्यादा ध्यान डॉलर पर केंद्रित होता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, सीमा पार भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भरता कम करने की कोशिश में इस दिशा के संकेत हैं। 
लेकिन यहां सावधानी ज़रूरी है, क्योंकि ब्रिक्स की अपनी साझा मुद्रा बन जाना और डॉलर का तत्काल विकल्प तैयार हो जाना, फिलहाल दो अलग-अलग बातें हैं। डॉलर की ताकत केवल अमरीकी मुद्रा होने से नहीं है बल्कि अमरीकी वित्तीय बाज़ारों की गहराई, वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में उसकी केंद्रीय स्थिति से आती है। इसलिए ब्रिक्स की वास्तविक उपलब्धि शायद डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि दुनिया को भुगतान और वित्त के अधिक विकल्प देना होगी। यही बदलाव धीरे-धीरे वैश्विक, आर्थिक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमज़ोरी एक ही जगह दिखायी देती है और यह है चीन और भारत के रिश्ते। दरअसल चीन और भारत साझेदार भी हैं और प्रतिस्पर्धी भी। दोनों ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाआें में शामिल हैं और दोनों ही वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनने का दावा करते हैं। साथ ही दोनों ब्रिक्स को मजबूत भी करना चाहते हैं, लेकिन दोनों के रणनीतिक हित हमेशा एक जैसे नहीं रह पाते। अगर भारत और चीन के बीच रिश्ताें को लेकर विश्वसनीयता आ जाए तो ब्रिक्स देखते ही देखते हर मायने में जी-7 पर भारी पड़े। 
यदि भारत और चीन अपने मतभेदों के बावजूद कुछ साझा वैश्विक मुद्दों पर निरंतर सहयोग कर सकते हैं, जिसकी स्थितियां बन रही हैं, तो ब्रिक्स की विश्वसनीयता बढ़ेगी। इसलिए नई दिल्ली में मोदी-जिनपिंग संवाद का महत्व सिर्फ भारत और चीन के आपसी रिश्तों तक सीमित नहीं है। इसका असर ब्रिक्स की भविष्य की दिशा पर भी पड़ता है। ब्रिक्स के महत्वपूर्ण स्तंभ रूस पर लगातार पश्चिम की छाया बनी हुई है। दरअसल रूस के कारण ही यूरोप और अमरीका ब्रिक्स को अपना प्रतिस्पर्धी संगठन मानते हैं और यह बात भी है कि ब्रिक्स में रूस की मौजूदगी के कारण इसकी ताकत भी पश्चिम पर भारी पड़ती है, क्योंकि अर्थव्यवस्था के मामले में रूस भले चीन और भारत के सामने कम हो, लेकिन सैन्य शक्ति और दुनिया पर अपने प्रभाव के मामले में रूस आज भी बड़ी ताकत है और कहीं न कहीं अमरीका और यूरोप उससे टकराने से झिझकते हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद हालांकि रूस कमज़ोर हुआ है, लेकिन यह उसकी सैन्य शक्ति ही है कि यूरोप सीधे रूस से टकराने की हिम्मत नहीं कर पाता और यही हाल अमरीका का भी है। इसलिए ब्रिक्स में रूस की मौजूदगी जहां उसे ताकतवर बनाती है, वहीं रूस के कारण यूरोप और अमरीका इसे अपना प्रतिस्पर्धी ही नहीं बल्कि विरोधी संगठन मानते हैं। जबकि हम जानते हैं कि भारत के अमरीका और यूरोप दोनों के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं। साथ ही ब्राज़ील की भी अपनी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन कहना, उसकी वास्तविकता का सरलीकरण कर देना होगा। ब्रिक्स की असली कहानी पश्चिम को हटाने से ज्यादा पश्चिम के एकाधिकार को सीमित करने की कोशिश है। आज ब्रिक्स देशों की वास्तव में सबसे बड़ी ताकत न्यूनतम एजेंडे पर साझी सहमति ही हो सकती है। आतंकवाद, विकास, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जलवायु वित्त और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के साथ-साथ विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधनों जैसे मुद्दों पर अगर ये देश एक साथ हैं, तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि भारत और चीन के आपसी रिश्तों में कुछ मतभेद हैं। भारत के लिए ब्रिक्स की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा यही है कि वह इस मंच को चीन या रूस की रणनीतिक प्राथमिकताओं का विस्तार बनने से रोकते हुए इसे अपने व्यापक राष्ट्रीय हितों के साथ जोड़े, क्याेंकि भारत एक ऐसा देश है, जो एक साथ दुनिया के कई मंचों पर सक्रिय है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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