विदेश नीति में पुन: संतुलन ला रहा है भारत

ब्रिक्स सम्मेलन से एक बात तो साफ हो गई कि पप्पी झप्पी से विदेश नीति नहीं चलती और न ही देश का मान बढ़ता है। देश की विदेश नीति चलती है दूरदृष्टि, सही योजना और बौद्धिक इनपुट से। देश को किस दिशा में ले जाने से, देश हित सधता है या बढ़ता है, यही सोच और रणनीति सबसे अहम होती है। विदेश नीति में कोई किसी का दोस्त नही होता और न कोई किसी का स्थायी दुश्मन। सबसे अहम होता है देश हित और जिस भी देश के साथ उसमें वृद्धि होती है, वही दोस्त होता है। वैसे राजनय में कोशिश यही होनी चाहिये कि किसी से भी दुश्मनी न हो। ब्रिक्स सम्मेलन से भारत को क्या लाभ हुआ है, ये बहस बेमानी है। महत्वपूर्ण ये है कि भारत की विदेश नीति डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू के काले साये से बाहर निकलती हुयी दिखायी पड़ रही है। 
ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद अंतर्राष्ट्रीय राजनय में जो विप्लव आया, उसकी वजह से पूरी दुनिया में कोहराम मचा, भारत भी उससे अछूता नहीं रहा। इस वजह से विदेश नीति में भारत समेत हर देश कन्फ्यूजन का शिकार हुआ। ट्रम्प जो कर रहे थे वो अप्रत्याशित था, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। लिहाजा बदली परिस्थितियों में विदेश नीति को किस रास्ते पर लेकर जाना है, ये सवाल टेढ़ा हो गया। सारे देश अपने-अपने स्तर पर जोड़ घटाव करने लगे। चीन और कनाडा, ट्रम्प की धमकियों के सामने झुकने को तैयार नहीं थे तो रूस और ईरान ने भी अपनी कमर सीधी रखी। यूरोप के कई देशों ने ट्रम्प से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन बाद में समझ में आ गया कि ट्रम्प से पार पाना आसान नहीं है और जो नुकसान वो कर रहे हैं, उस संदर्भ में अमरीका से अलग रास्ता बनाना ही उचित होगा। भारत के साथ दिक्कत यह थी कि वो ट्रम्प के आभामंडल से निकल नहीं पाया। प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीका जाकर ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार का नारा’ लगवाया था। इज़राइल संघ परिवार की बड़ी कमजोरी रहा है। इज़राइल जिस तरह से मुस्लिम देशों से निपटता है या आतंकवाद को जवाब देता है, वो संघ परिवार को आकर्षित करता है। मोदी ने ट्रम्प और नेतन्याहू दोनों से अपनी नज़दीकी इतनी कर ली कि पूरी दुनिया को लगा कि भारत अमरीका की गोद में बैठ गया है।  
हकीकत यह है कि ट्रम्प और नेतन्याहू किसी के सगे नहीं हैं। ट्रम्प बार-बार मोदी को अपना दोस्त बताते रहे और भारत को अपमानित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा। भारत पर ब्राज़ील के साथ सबसे ज्यादा टैरिफ लगाया। अमरीकी सरकार ने अप्रवासी भारतीयों को हथकड़ी बेड़ी लगा कर भारत भेजा। बार-बार दावा करते रहे कि आपरेशन सिंदूर के बाद सीजफायर उन्होंने कराया। भारत को टैरिफ किंग कहा। और ‘मोदी का कैरियर खत्म कर सकता हूँ’ ऐसा बयान दिया। ये भारत जैसी पुरानी सभ्यता को अपमानित करने का प्रयास था। मोदी सरकार को जो माकूल जवाब देना था वो नहीं दिया। ये मोदी सरकार की कमजोरी थी। ईरान युद्ध शुरू होने के दो दिन पहले प्रधानमंत्री का इज़रायल जाना और नेतन्याहू के गले लगना, ईरान के सुप्रीम लीडर के कत्ल के बाद चुप रहना, ईरान पर अमरीका और इज़रायल के इकतरफा युद्ध करने की आलोचना नहीं करना जबकि पाकिस्तान ने की, तो इससे भारत पूरी दुनिया में अलग थलग पड़ गया। गाज़ा में हमास को कुचलने के नाम पर जो नरसंहार इज़रायल ने किया, उस पर मोदी सरकार का चुप्पी साधना दुनिया को अखरा। दुनिया हैरान थी, क्योंकि भारत की छवि एक नैतिकतावादी देश की थी, जो हर उस कदम का विरोध करता था, जो गलत था, या जो सार्वभौम अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों के खिलाफ था। इससे भारत की नैतिक लीडरशिप की इमेज को धक्का लगा। 
मैं न अमरीका से और न इज़रायल से दोस्ती के खिलाफ हूँ। बस इतनी सी गुज़ारिश है कि मोदी सरकार को ये अंदाजा होना चाहिये कि वो एक महान सभ्यता और संस्कृति के वाहक हैं जिस नाते उसकी कुछ ज़िम्मेदारियां हैं और दुनिया ये देख कर हैरान थी कि भारत कैसे एक जेनोसाइडल स्टेट (नरसंहार करने वाले देश) के साथ खड़ा है। इस संदर्भ में ब्रिक्स सम्मेलन के दिल्ली घोषणापत्र में गाज़ा में हुये नरसंहार की निंदा प्रस्ताव और फिलिस्तीन मामले को सुलझाने की ‘टू स्टेट’ फार्मूले पर, हस्ताक्षर करना एक सही कदम है। कह सकते हैं कि भारत ने अपनी एक बड़ी गलती को सुधारने के लिये बड़ा कदम उठाया है। इज़रायल को पता होना चाहिये कि भारत का समर्थन अगर पाना है तो उसे भारत की महान विरासत के योग्य बनना पड़ेगा। ब्रिक्स घोषणापत्र में बिना नाम लिये इकतरफा टैरिफ की भी तीखी आलोचना की गई है। इसके पहले एस.सी.ओ. की बैठक में प्रस्ताव पारित कर के ईरान पर अमरीका और इज़रायल के इकतरफा युद्ध करने की निंदा की गई थी। भारत ने उस प्रस्ताव पर भी दस्तखत किये थे। ये अमरीका को साफ संदेश है। 
दुनिया को पता है कि भारत और चीन में एक युद्ध हो चुका है। उसके बाद सीमा पर दोनों देशों के बीच कई झड़पें भी हुई हैं। ताज़ा घटना 2020 में गलवान की है जब हमारे बीस जवान शहीद हुये थे। व्यापार के स्तर पर भी चीन भारत को कमज़ोर करने का कोई मौका नहीं छोड़ता। उसने रेयर अर्थ मेटल, केमिकल फर्टिलाइजर के भारत को निर्यात करने के रास्ते में अड़ंगे लगाये जिससे भारत को काफी तकलीफ हुई। फाक्सकान से उसने अपने तीन सौ इंजीनियर्स को वापस बुलाया। ये हरकतें एक मित्र देश की नहीं थी। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली घोषणापत्र के बाद अपने भाषण में रेयर अर्थ मेटल और तकनीकी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की आलोचना की। ये चीन के राष्ट्रपति शी जीनपिंग को संदेश है यानि मोदी सरकार ने अमरीका और चीन दोनों को ये संदेश दिया है कि वो सब के साथ रहना चाहता है लेकिन अपनी शर्तों पर और कोई भारत को कमजोर समझ कर दबाने या ब्लैकमेल करने का प्रयास न करे। 
ब्रिक्स घोषणापत्र में मोदी सरकार ने जो तेवर दिखाया है, और सबको साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम करते दिखी है। वो आगे भी इस पर चलने को कृतसंकल्प रही तो ये भारतीय विदेश नीति में जो विचलन आया था, उसके दूर होने का संकेत होगा। भारत एक बार फिर से भारत बरसों पुराने नेहरूवादी विजन को अपनाता दिखेगा। भारत की हमेशा से ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’ वाली नीति रही है। वो शीत युद्ध के समय भी महाशक्तियों के बीच तीसरी धारा का समर्थक रहा है। उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी ताकतों के चंगुल से आज़ाद देशों के गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया। ये बात अमरीका को सालती रही। हमारी दोस्ती सोवियत संघ से थी लेकिन वो बराबरी की थी, पूर्वी यूरोप के देशों की तरह भारत मास्को का बगलबच्चा नहीं बन गया था। यही सही नीति है। ब्रिक्स का संदेश साफ है। ट्रम्प की विप्लवकारी नीतियों से उपजे विक्षोभ के कारण मोदी सरकार की विदेश नीति में जो बदलाव आया था, अब सरकार उससे वो दूर होती दिख रही है और ठोस संतुलन की ओर बढ़ रही है। देर आये, दुरुस्त आये। 

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