संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति भारत की ऐतिहासिक सफलता 

नई दिल्ली में 12-13 सितम्बर 2026 को सम्पन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या नई दिल्ली में जुटने वाले नेता किसी साझा घोषणापत्र पर सहमत हो पाएंगे? यह आशंका निराधार नहीं थी। इसी साल मई में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बिना संयुक्त घोषणापत्र के समाप्त हुई थी। पश्चिम एशिया के संकट, विशेषकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तीखे मतभेदों ने यह संकेत दे दिया था कि विस्तारित ब्रिक्स में सहमति-निर्माण पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो चुकी है। उस बैठक में भारत को चेयर का वक्तव्य और आउटकम डॉक्यूमेंट जारी कर संतोष करना पड़ा था। ऐसे वातावरण में 12 सितम्बर को नई दिल्ली में न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन पर सर्वसम्मति बन जाना महज एक औपचारिक उपलब्धि नहीं बल्कि भारत की मेजबानी और उसकी सक्रिय, संतुलित एवं व्यावहारिक कूटनीति की महत्वपूर्ण सफलता है। यह घोषणापत्र इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले इस नई दिल्ली घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले जिसमें 26 लोगों की आतंकियों ने धर्म पूछकर हत्या की थी, के साथ साथ टेरर फंड,फलस्तीन,गाज़ा, टैरिफ व लेबनान का ज़िक्र किया गया है। साथ ही मध्य-पूर्व के तनावपूर्ण हालात के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है।
पूरे परिदृश्य में दिलचस्प ये था कि अमरीका के साथ युद्ध में एक-दूसरे के विपरीत दो छोर पर खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात भी मध्य-पूर्व के हालात शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की अपील करने वाले देशों में शामिल थे। ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और अमरीकी टैरिफ का नाम तो नहीं लिया गया है, लेकिन यह साफ तौर पर कहा गया है कि कई देशों को ‘अन्यायपूर्ण और एकतरफा संरक्षणवादी कदमों’ से नुकसान हो रहा है। जाहिर है ये इशारा डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों पर लगाए गए टैरिफ की ओर ही था। घोषणापत्र संबंधी इस सफलता को मई की बैठक और सितम्बर के शिखर सम्मेलन के बीच के अंतर को समझे बिना भारत की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन संभव नहीं। दरअसल विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया के सवाल पर सदस्य देशों की भिन्न रणनीतिक प्राथमिकताएं खुलकर सामने आ गई थीं। एक ओर ईरान था, दूसरी ओर यूएई जैसे देश थे और इनके बीच अमरीका की भूमिका तथा क्षेत्रीय सुरक्षा की जटिलताएं थीं जबकि शिखर सम्मलेन का परिदृश्य भिन्न था। इसके अतिरिक्त ब्रिक्स अब पहले वाला छोटा समूह नहीं है। इसका विस्तार हुआ है और इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, सुरक्षा चिंताओं, आर्थिक हितों और विदेश नीति के दृष्टिकोण वाले देश शामिल हैं। इसलिए सर्वसम्मति अब केवल शब्दों पर सहमति नहीं बल्कि परस्पर विरोधी राष्ट्रीय हितों के बीच न्यूनतम साझा जमीन तलाशने की कला है। वास्तव में यही वह कसौटी थी, जिस पर भारत की अध्यक्षता को परखा जाना था व नई दिल्ली ने इस कसौटी को पार किया।
इस संदर्भ में हमें यह बात भी याद रखनी होगी कि अकेले घोषणापत्र जारी कर देना अपने आप में असाधारण उपलब्धि नहीं होती। यह असाधारण तब बनती है, जब ऐसा दस्तावेज ऐसे समूह में तैयार हो, जिसके सदस्य एक-दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हों। भारत ने इस चुनौती को रणनीतिक स्वायत्तता, मुद्दा आधारित सहमति और आम सहमति आधारित कूटनीति के माध्यम से संभाला। नई दिल्ली ने किसी एक शक्ति-धुरी के पक्ष में ब्रिक्स को खड़ा करने के बजाये उसे संवाद, सहयोग और बहुपक्षवाद के मंच के रूप में प्रस्तुत किया। यह दृष्टिकोण भारतीय विदेश नीति की उस परम्परा से मेल खाता है जिसमें भारत एक साथ अनेक शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखता है। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में चीन, रूस, ईरान, यूएई और अन्य देशों की उपस्थिति के बीच संवाद का वातावरण बनना इसी का प्रमाण है। इस घोषणापत्र का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वह सर्वसम्मति से स्वीकार हुआ। महत्वपूर्ण यह भी है कि इसमें भारत की अध्यक्षता की प्राथमिकताओं की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
दस्तावेज में वैश्विक शासन-व्यवस्था में सुधार, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व, बहुपक्षवाद, विकासशील देशों की आवाज, आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख, आर्थिक सहयोग, तकनीकी सहयोग, जलवायु और सतत विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। विशेष रूप से ग्लोबल साउथ की भूमिका को लेकर भारत की दृष्टि उल्लेखनीय रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकासशील देशों को केवल वैश्विक व्यवस्था के ‘नियम मानने वाले’ नहीं बल्कि ‘नियम बनाने वाले’ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। यह महज भाषण का राजनीतिक मुहावरा नहीं है; यह वैश्विक शासन में प्रतिनिधित्व के मौजूदा असंतुलन को चुनौती देने वाली कूटनीतिक अवधारणा है। 
अंतत: घोषणापत्र में हिंसा पर चिंता, अधिकतम संयम और संवाद तथा कूटनीति के माध्यम से विवादों के समाधान पर जोर दिया गया। यह भाषा रचनात्मक अस्पष्टता का उदाहरण है- एक ऐसी कूटनीतिक भाषा जिसमें सभी पक्ष अपनी न्यूनतम स्वीकार्य स्थिति देख सकें, लेकिन कोई पक्ष स्वयं को पराजित महसूस न करे। कूटनीति में कभी-कभी यही सफलता होती है- सभी पक्षों को पूरी तरह संतुष्ट करना नहीं, बल्कि उन्हें एक साझा दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने लायक संतुष्टि प्रदान करना। नई दिल्ली घोषणा ने ब्रिक्स की आर्थिक भूमिका को भी अधिक व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश की है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश, सीमापार भुगतान व्यवस्था, न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और प्रस्तावित निवेश मंच जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं। हालांकि साझा ब्रिक्स मुद्रा का कोई तात्कालिक निर्णय नहीं हुआ, लेकिन स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन और भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना अधिक व्यावहारिक कदम है। यही भारत की अध्यक्षता की एक खासियत रही— बड़े भू-राजनीतिक नारों के साथ-साथ अंतिम नतीजे और संस्थागत तंत्र  पर जोर लेकिन इस सफलता को आत्ममुग्धता में बदलना उचित नहीं होगा। घोषणापत्र कोई अंतिम उपलब्धि नहीं बल्कि आगे की कूटनीतिक प्रक्रिया का रोडमैप है। ब्रिक्स में चीन और भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिम के बीच गहरी खाई है। ईरान और उसके विरोधी देशों के अपने क्षेत्रीय समीकरण हैं। आर्थिक हित भी हमेशा समान नहीं हैं। इसलिए सर्वसम्मति बनाए रखना भविष्य में और कठिन होगा। इसके अलावा घोषणापत्र में प्रयुक्त कई भाषा-खंड व्यापक और सावधानीपूर्वक संतुलित हैं। इसलिए एक दस्तावेज पर सहमत हो जाना यह प्रमाणित नहीं करता कि सभी सदस्य देशों की रणनीतिक सोच एक हो गई है। इसलिए अब भारत की अगली चुनौती होगी कि नई दिल्ली की सहमति को व्यवहारिक बहुपक्षवाद में बदला जाए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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