बासमती ही ला सकती है कृषि में विभिन्नता 

फसली विभिन्नता में बासमती का दर्जा आज शीर्ष पर है। फसली विभिन्नता के लिए कपास-नरमा, मक्का, गन्ना मुख्य फसलें मानी जाती थीं। सभी को मिला कर अब इनकी काश्त का रकबा लगभग 3-4 लाख हेक्टेयर है जबकि अकेली बासमती की काश्त 6.76 लाख हेक्टेयर (16.5 लाख एकड़) रकबे पर की गई है। बासमती के उत्पादन में पंजाब देश के कुल उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देता है, जिसकी कीमत 50 हज़ार करोड़ रुपये तक है। बासमती की काश्त के अधीन देश के कुल रकबे का 20 प्रतिशत हिस्सा पंजाब में है। गत वर्ष बासमती की काश्त 6.26 लाख हेक्टेयर रकबे पर की गई थी। इस वर्ष लगभग 50 हज़ार हेक्टेयर रकबा बढ़ा है।
 कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अनुमान के मुताबिक इस वर्ष बासमती का उत्पादन 30 लाख टन होने की सम्भावना है, जो गत वर्ष के मुकाबले डेढ़ गुना है। कम समय में पकने वाली बासमती की किस्म पूसा बासमती-1509 मंडियों में बिकने हेतु आ भी रही है। इसका एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से आ रहा है। वहां पंजाब की तरह ‘15 जून से पहले धान की काश्त शुरू नहीं की जा सकती’ जैसी कोई पाबंदी नहीं। उत्तर प्रदेश के किसान पूसा बासमती-1509 किस्म की फसल लाकर हरियाणा की मंडियों में बेच रहे हैं। चाहे पंजाब की बहुत कम फसल मंडियों में आकर बिक रही है। 
गत वर्ष बाढ़ और खराब मौसम के कारण बासमती की फसल प्रभावित हो गई थी। इस वर्ष किसानों को दाम अच्छा मिल रहा है। बासमती निर्यातकों का कहना है कि बासमती का निर्यात खाड़ी, सऊदी अरब और यूरोप देशों में बना रहेगा, इसका भविष्य उज्ज्वल है। इस कारण आगामी वर्षों में रकबा और बढ़ने की सम्भावना भी है। विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब में 9 लाख हेक्टेयर रकबा बासमती की काश्त में आसानी से आ सकता है। हालांकि बासमती के लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) नहीं है, लेकिन विदेशों में बासमती की मांग मज़बूत होने और घरेलू खपत बढ़ने से किसान अच्छे दाम की उम्मीद में रकबा और बढ़ाएंगे। एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डिवेल्पमेंट अथॉरिटी (अपीडा) ने भी इस वर्ष बासमती की भरपूर फसल होने का अनुमान लगाया है। अपीडा द्वारा 22 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन होने का अनुमान है। चाहे पंजाब के बलबीर सिंह जड़िया और राजमोहन सिंह कालेका जैसे प्रगतिशील किसान 24 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ की उम्मीद कर रहे हैं। चाहे दूसरे राज्यों में भी बासमती की काश्त का रकबा बढ़ रहा है, परन्तु पंजाब के जी.आई. क्षेत्र में होने के कारण इसकी बासमती बढ़िया मानी जाती है और दूसरे देशों में पसंद की जा रही है। यहां पूसा बासमती-1121 किस्म जिसका चावल अन्य सभी किस्मों से लम्बा होता है और इसका रसोई में इस्तेमाल अधिक होता है, का भी उत्पादन बढ़ रहा है। बासमती की यह किस्म जारी करवाने में पूसा के साथ पंजाब के पंजाब यंग फार्मर्स एसोसिएशन का बड़ा योगदान रहा है।
पंजाब में इस वर्ष 32.76 लाख हेक्टेयर रकबे पर धान की काश्त हुई है। यह रकबा विगत सभी वर्षों के मुकाबले ज़्यादा है। फसली विभिन्नता लाने के सभी प्रयास विफल हो गए हैं। पंजाब में गिर रहा भू-जल स्तर चिन्ता का विषय है। चावल के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध मुख्य वैज्ञानिक और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट, लॉस बैनोज़ (फिलीपींस) के ब्रीडर डॉ. गुरदेव सिंह खुश और डॉ. सरदारा सिंह जौहल ने सलाह दी है कि पंजाब में धान की काश्त का रकबा कम किया जाए, परन्तु इसमें कोई सफलता नहीं मिल रही है। हर साल रकबा बढ़ता जा रहा है। 2023-24 में यह रकबा 31.79 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में 32.43 लाख हेक्टेयर हो गया और अब 32.76 लाख हेक्टेयर है। इसमें बासमती का 6.76 लाख हेक्टेयर रकबा शामिल है। मक्का और कपास-नरमा की काश्त का रकबा तेज़ी से कम हुआ है। गन्ने की काश्त का रकबा एक लाख हेक्टेयर के आस-पास ही है, जो इस वर्ष बढ़ कर 1.16 लाख हेक्टेयर हो गया है। कपास-नरमा पैदा करने वाले क्षेत्र में सफेद सोना कहे जाने वाले नरमा के रकबे में भारी कमी आई है। नरमा पैदा करने वाले क्षेत्र के लोग बहुत अमीर माने जाते थे। वे अब इसकी काश्त छोड़कर या रकबा कम करके धान की काश्त में ला रहे हैं। फसली विभिन्नता लाने में मक्का, कपास-नरमा और गन्ने की काश्त का रकबा बढ़ने की कोई सम्भावना नहीं। मक्का और कपास-नरमा के उत्पादक निराश हैं। धान की फसल उन्हें ज़्यादा मुनाफा दे रही है।
 सिंचाई के स्रोत भी बढ़ रहे हैं। हर खेत तक नहर का पानी पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इसके बाद धान की काश्त का रकबा और बढ़ने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। पंजाब सरकार की मूंगफली की काश्त बढ़ाने की जो योजना है, वह किसानों को 500 एकड़ के बीज देकर शुरू की जा रही है। इसके अधीन रकबा ज़्यादा बढ़ने की उम्मीद नहीं है। बांस की जो काश्त शुरू की गई है, उससे भी कोई व्यापक स्तर पर धान का रकबा कम नहीं होगा। इससे फसली विभिन्नता का आना तब तक सम्भव नहीं, जब तक पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ऐसी फसलें किसानों को नहीं देता जो धान जितना मुनाफा दें। बासमती ही एक उम्मीद की किरण के रूप में नज़र आती है जिसके अधीन रकबा बढ़ाया जा सकता है, यदि केन्द्र सरकार इस पर एमएसपी घोषित कर दे और मंडीकरण की सुविधाएं किसान पक्षीय बना दे तो किसान धान की बजाये बासमती का रकबा बढ़ा सकते हैं।

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