क्षतिग्रस्त होता धरती का प्राकृतिक कवच
आज विश्व ओजोन दिवस पर विशेष
पृथ्वी के ऊपर फैली ओजोन परत दिखाई नहीं देती लेकिन जीवन की सुरक्षा में उसकी भूमिका किसी विशाल प्राकृतिक कवच से कम नहीं। सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों का बड़ा हिस्सा अवशोषित करके यह परत मनुष्य, वनस्पतियों, कृषि, समुद्री पारिस्थितिकी और असंख्य जीव-जंतुओं को गंभीर जैविक क्षति से बचाती है। यही कारण है कि हर वर्ष 16 सितंबर को ‘विश्व ओजोन दिवस’ केवल एक पर्यावरणीय दिवस नहीं बल्कि विज्ञान, वैश्विक सहयोग और सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति की सफलता को याद करने का अवसर बनता है। विश्व ओजोन दिवस 2026 का विषय ‘एक ठंडे ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई’ है। यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष 2016 में स्वीकृत किगाली संशोधन के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के विरुद्ध दुनिया को एकजुट किया जबकि किगाली संशोधन ने उसी सहयोग की दिशा को जलवायु संरक्षण और टिकाऊ शीतलन तक विस्तारित किया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, किगाली संशोधन का उद्देश्य शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) के उत्पादन और उपयोग में चरणबद्ध कमी लाना व अधिक ऊर्जा-कुशल और टिकाऊ शीतलन व्यवस्था को बढ़ावा देना है।
यहां एक वैज्ञानिक अंतर समझना ज़रूरी है। ओजोन परत के ऐतिहासिक क्षरण के लिए मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी), हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड और अन्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थ जिम्मेदार रहे हैं। एचएफसी को मूलत: सीएफसी के विकल्प के रूप में अपनाया गया क्योंकि वे ओजोन परत को नष्ट नहीं करते लेकिन उनमें से अनेक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें उपजती हैं। इसलिए ओजोन परत को सुरक्षित रखना और ऐसी शीतलन तकनीक विकसित करना, जो जलवायु को गर्म भी न करे, आज की चुनौती दोहरी है। समतापमंडल में लगभग 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच वायुमंडलीय ओजोन का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है। सूर्य की पराबैंगनी ऊर्जा ऑक्सीजन अणुओं को तोड़ती है और उनसे बने ऑक्सीजन परमाणु अन्य ऑक्सीजन अणुओं से मिलकर ओजोन बनाते हैं। यह प्राकृतिक रासायनिक चक्र सामान्य परिस्थितियों में संतुलित रहता है लेकिन मानव निर्मित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ओडीएस) से मुक्त होने वाला क्लोरीन और ब्रोमीन इस संतुलन को बिगाड़ देता है। समतापमंडल में पहुंचने के बाद सूर्य का पराबैंगनी विकिरण इन यौगिकों को तोड़ता है और सक्रिय क्लोरीन-ब्रोमीन परमाणु मुक्त होते हैं, जो उत्प्रेरक रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए बड़ी संख्या में ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकते हैं।
1980 के दशक में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में असाधारण कमी की खोज ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। उसके बाद वैज्ञानिक प्रमाणों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग ने अभूतपूर्व राजनीतिक कार्रवाई को जन्म दिया। 1985 की वियना कन्वेंशन और 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल इस बात के ऐतिहासिक उदाहरण बने कि वैज्ञानिक चेतावनी को यदि सरकारें समय रहते स्वीकार करें तो वैश्विक पर्यावरणीय संकट का समाधान संभव है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत नियंत्रित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और खपत में 99 प्रतिशत से अधिक की चरणबद्ध कमी की जा चुकी है। इस प्रयास का परिणाम अब वैज्ञानिक आंकड़ों में दिखाई देने लगा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन व संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के आकलन के अनुसार वर्तमान नीतियां और अनुपालन जारी रहे तो वैश्विक औसत ओजोन 1980 के स्तर पर लगभग 2040 तक, आर्कटिक क्षेत्र में 2045 तक और अंटार्कटिका में लगभग 2066 तक लौट सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि संकट समाप्त हो गया है बल्कि यह कि मानवता ने विनाश की दिशा को पलटने में वास्तविक सफलता हासिल की है।
2025 के डब्ल्यूएमओ ओजोन एवं यूवी बुलेटिन ने भी इस सकारात्मक प्रवृत्ति को मजबूत किया। 2024 का अंटार्कटिक ओजोन छिद्र हाल के कई वर्षों की तुलना में छोटा रहा और 2025 में ओजोन छिद्र अपेक्षाकृत छोटा तथा अल्पकालिक रहा। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष-दर-वर्ष आकार में परिवर्तन केवल मानव उत्सर्जन से नहीं बल्कि समतापमंडलीय तापमान, हवाओं और अन्य प्राकृतिक वायुमंडलीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होते हैं। इसलिए किसी एक वर्ष के छोटे ओजोन छिद्र को समस्या के पूर्ण समाधान का प्रमाण मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। महत्वपूर्ण बात दीर्घकालिक प्रवृत्ति है और वह सुधार की ओर संकेत कर रही है। ओजोन संरक्षण की यह सफलता जलवायु संकट के लिए भी महत्वपूर्ण सबक रखती है। डब्ल्यूएमओ के वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन-क्षयकारी पदार्थों में कमी ने 2050 के आसपास उस स्थिति की तुलना में लगभग 0.5 से 1 डिग्री सेल्सियस अतिरिक्त वैश्विक तापमान वृद्धि को टालने में मदद की है, जिसमें इन पदार्थों का उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहता। किगाली संशोधन के पूर्ण अनुपालन से 2100 तक लगभग 0.3 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक वार्मिंग को टालने की क्षमता का अनुमान है।



