कांग्रेसियों की एकजुटता
पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी सचिन पायलट ने आते ही जिस तरह गांव तूर बणजारा (संगरूर) के मज़दूर गुलज़ार सिंह की आत्महत्या के मामले को लेकर वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के विरुद्ध चंडीगढ़ में प्रभावशाली रोष प्रदर्शन किया, उसकी जहां खूब चर्चा हो रही है, वहीं इसे पंजाब कांग्रेस द्वारा स्वयं को एकजुट करके आगामी चुनाव के लिए एक और प्रयास करने वाली कवायद भी कहा जा रहा है। लगभग पिछले तीन महीने से जिस तरह का प्रदेश पार्टी के नेताओं ने रवैया धारण किया हुआ था, वह पार्टी कतारों में निराशा पैदा करने वाला था। पार्टी के अलग-अलग गुटों द्वारा किसी न किसी रूप में अलापे जाते रहे अलग-अलग स्वरों को एक तरह से राजनीतिक गलियारों द्वारा चीख-पुकार ही माना जाता रहा था।
उस समय प्रदेश पार्टी प्रभारी भूपेश बघेल द्वारा अलग-अलग रास्ते पर चलते नेताओं को एक स्थान पर लाने के यत्न जहां बुरी तरह विफल हुए थे, वहीं आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के संदर्भ में कांग्रेसी नेताओं का एकजुट हो पाना भी आशंकित बन गया था। इसी विवाद के चलते राजस्थान के युवा नेता सचिन पायलट को प्रदेश की कमान सौंपी गई थी और साथ ही यह कड़ा संदेश भी दिया गया था कि यदि पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अभी भी न संभले, तो उन्हें पार्टी के हो रहे बड़े नुकसान का दोषी समझा जाएगा। प्रदेश में कांग्रेस को एक बड़ी पार्टी माना जाता रहा है। आगामी चुनाव में उसका मुकाबला आम आदमी पार्टी से ही माना जाता था, परन्तु कांग्रेसियों द्वारा स्वयं ही खेल बिगाड़ने से बड़ा बिखराव देखने को मिल रहा था। कई मामले पार्टी के सामने थे, इनमें एक यह था कि प्रदेश अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए एक गुट द्वारा लगातार लामबंदी की जा रही थी। इसी गुट द्वारा चुनाव के समय मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किए जाने की भी हाईकमान से मांग की जा रही थी, परन्तु हाईकमान इसके लिए तैयार नहीं था। पंजाब कांग्रेस का हाईकमान द्वारा नया प्रभारी लगाने पर मौजूदा समय में कुछ सीमा तक एकता का प्रभाव ज़रूर बन रहा है परन्तु अभी भी टिकटों की बांट को लेकर खींचतान होने की संभावना बनी हुई है। इससे निपटने के लिए पार्टी को कड़ी ज़ोर आजमायश करनी पड़ सकती है। वैसे भी अभी तक सिर्फ प्रभारी ही बदला गया है। पार्टी के भीतर उठते रहे मामलों संबंधी कोई कदम नहीं उठाया गया। ऊपर से यह संदेश भी दिया गया है कि आगामी चुनाव के लिए किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित किया जाएगा। राहुल गांधी के नाम पर ही चुनाव लड़े जाएंगे।
गत दिवस चंडीगढ़ में हुई प्रभावशाली रैली से यह प्रभाव देने का यत्न ज़रूर किया गया कि अब पार्टी और सभी नेता एकजुट हो गए हैं। इसमें सम्बोधित करते हुए भी सभी नेताओं ने पार्टी के भीतर एकता होने का प्रभाव दिया है। चुनाव में कुछ माह का समय शेष रह जाने के कारण दिखाई गई एकजुटता की इस भावना को आगामी समय में कितना स्थायी बना कर रखा जाएगा, यह देखने वाली बात होगी। चुनाव तैयारियों में पिछड़ गई इस पार्टी को चुनाव के लिए नीतिगत योजनाबंदी करने के लिए भी बड़ी कवायद करने की ज़रूरत होगी। ऐसी भावना से ही यह अन्य विपक्षी पार्टियों का चुनाव मैदान में मुकाबला करने में समर्थ हो सकेगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

