ट्रम्प की फिर ‘टैरिफ’ धमकी
पिछले दिनों नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में जहां भारत का रुतबा और बढ़ा है, वहीं रूस तथा चीन के साथ इसके संबंध और भी मज़बूत एवं गहरे हुए हैं। रूस के साथ भारत के हर तरह के संबंध दशकों पुराने हैं। वर्ष 1947 में भारत को आज़ादी मिलने के बाद उस समय की बड़ी शक्ति सोवियत संघ (जिसका रूस एक बड़ा साथी रहा है) ने भारत की प्रत्येक पक्ष से बहुत सहायता की थी, जो सेवियत संघ के टूटने के बाद आज भी रूस द्वारा जारी है। समयानुसार देशों के संबंध बनते-टूटते रहते हैं, परन्तु भारत और रूस के आपसी सहयोग की निरन्तरता हैरान करने वाली है। अब भी दोनों देशों के प्रमुख वर्ष में एक बार मिलते हैं और प्रत्येक पक्ष से विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श करते हैं। लगभग पिछले साढ़े चार वर्ष से रूस यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा आ रहा है। इसकी अर्थ-व्यवस्था पर भी व्यापक स्तर पर प्रभाव पड़ा है, परन्तु दोनों देशों के संबंध बड़ी हद तक सुखद ही बने रहे हैं।
दक्षिण एशिया के युद्ध कारण कच्चे तेल की आपूर्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। भारत अपनी ज़रूरतों के लिए 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति में बड़ी मुश्किलें पैदा होने के कारण भारत ने रूस से और भारी मात्रा में कच्चा तेल मंगवाना शुरू किया है। रूस भी अपनी अर्थ-व्यवस्था को स्थिर रखने के लिए भारत को सस्ते दाम पर तेल बेचने को प्राथमिकता दे रहा है। इस समय इस ऊर्जा पूर्ति में रूस की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। वर्ष 2022-23 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बना रहा था। इस समय देश में प्रतिदिन 16 से 20 लाख बैरल तेल रूस से आ रहा है। इसके साथ ही इराक, सऊदी अरब, कतर और कुवैत से भी भारत तेल खरीद रहा है। इसके कारण अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अपने टैरिफ के हथियार को तेज़ किया है और भारत पर दबाव डालने के लिए उन्होंने अपनी संसद से इस संबंधी एक बिल पर मुहर लगवा ली है। पिछले दिनों अमरीका के निचले सदन ‘हाऊस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव’ तथा उच्च सदन ‘सीनेट’ में यह पारित करवा लिया है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। अमरीकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह बिल कानून बन जाएगा। अब इसके बाद यह देखना होगा कि ट्रम्प भारत के साथ टैरिफ की बाज़ी खेलेंगे या नहीं, परन्तु आसार ऐसे होने के बने नज़र आते हैं। ट्रम्प ने ही दो वर्ष पहले पद सम्भालते हुए दुनिया भर में टैरिफ की अपनी मनमर्जी मुताबिक नीति बनाई थी, जिसको बाद में अमरीका की उच्च अदालत ने रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ खारिज होने के बाद भारतीय वस्तुओं पर अब अमरीका द्वारा औसतन 18 प्रतिशत टैरिफ दर लागू है।
अमरीकी राष्ट्रपति इस मामले पर दोहरी नीति अपना रहे हैं। एक तरफ तो वह भारत सहित अन्य देशों पर रूसी तेल खरीदने पर टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं, परन्तु दूसरी तरफ अमरीका का रूस के साथ अपना व्यापार जारी है। वह रूस से यूरिया और यूरेनियम की लगातार खरीद कर रहा है। आंकड़ों अनुसार वर्ष 2025 में उसने रूस से 3.8 अरब डॉलर के लगभग सामान खरीदा है। विश्व बैंक के अनुसार वर्ष 2025 में अमरीका ने रूस से 78.1 करोड़ डॉलर के मूल्य के 18.85 लाख टन यूरिया का आयात किया है। अमरीकी ऊर्जा विभाग अनुसार वह अपनी यूरेनियम संबंधी ज़रूरतों के लिए रूस पर बड़ी हद तक निर्भर है। ऐसी सूरत में अब भारत ने अपना पक्ष साफ कर दिया है और कहा है कि भारत अपने लोगों की ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अलग-अलग स्रोतों से अपनी ऊर्जा खरीद जारी रखेगा।
हम समझते हैं कि भारत को अपने अपनाए गए इस रूख पर डटकर पहरा देने की ज़रूरत होगी और स्पष्ट रूप में अमरीका को यह भी बताना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में किसी देश के आगे झुकने की बजाए भारत अपनी आज़ाद नीति पर चलता रहेगा। पहले भी वह ऐसी नीति पर ही चलता रहा था, जिस पर अब उसको दृढ़ता के साथ पहरा देने की ज़रूरत होगी
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

