तेल उत्पादक देशों में कठपुतली सरकार चाहता है अमरीका
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अमरीकी सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिसॉल्व के दौरान गत 3 जनवरी, 2026 को वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास से हिरासत में ले लिया गया था। अमरीकी न्याय विभाग का आरोप है कि मादुरो ने कोलंबिया के विद्रोही समूह एफएआरसी और लैटिन अमरीका के बड़े ड्रग कार्टेल्स के साथ मिलकर पिछले दो दशकों से अमरीका में भारी मात्रा में कोकीन भेजने की साज़िश रची। अमरीकी पक्ष के अनुसार वेनेज़ुएला के शीर्ष अधिकारियों ने पैसों और सत्ता के लालच में ड्रग तस्करों को सुरक्षा प्रदान की। उधर अंतर्राष्ट्रीय खुफिया डेटा और खुद अमरीकी एजेंसियों की कुछ रिपोर्टें दर्शाती हैं कि वेनेज़ुएला दुनिया का मुख्य ड्रग उत्पादक देश नहीं है। इसके अलावा ट्रम्प प्रशासन ने मादुरो को ‘ट्रेन दे एरागुआ’ जैसे आपराधिक गिरोहों से भी जोड़ने की कोशिश की, लेकिन अमरीकी खुफिया एजेंसियों को इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले। दरअसल अमरीका का असली मकसद वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन कर अपनी कठपुतली सरकार बनाकर वहां के दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों पर अमरीकी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करना था। खुद अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मादुरो की गिरफ्तारी के बाद यह बयान भी दिया था कि अमरीका अब वेनेज़ुएला को चलाएगा और तेल संसाधनों पर ध्यान देगा।
इसके बाद इस वर्ष अमरीका ने वेनेज़ुएला के कच्चे तेल के शिपमेंट और वित्तीय संपत्तियों पर सीधे तौर पर नियंत्रण हासिल किया है। जनवरी से अब तक अमरीका ने स्किपर, मैरिनेरा और बर्था जैसे वेनेज़ुएला से जुड़े कई तेल टैंकरों को समुद्र में प्रतिबंधित कर ज़ब्त किया जिनमें से अकेले बर्था टैंकर में 19 लाख बैरल और मैरिनेरा आदि से करीब 20 लाख बैरल तेल ज़ब्त किया गया। एक वित्तीय विश्लेषण के अनुसार अमरीका ने वेनेज़ुएला के तेल निर्यात पर नियंत्रण करके इस साल 13 अरब डॉलर से अधिक की नकद राशि अमरीकी खातों में जमा की है। गोया, अमरीका ने अब तक भौतिक रूप से करोड़ों बैरल निकाला हुआ तेल और 13 अरब डॉलर का कैश राजस्व अपने नियंत्रण में लिया है और कागज़ी व रणनीतिक तौर पर वेनेज़ुएला की ज़मीन के नीचे मौजूद 65 अरब बैरल के विशाल तेल भंडार के संचालन और दोहन का कानूनी अधिकार हासिल कर लिया है।
उल्लेखनीय है कि वेनेज़ुएला के पास लगभग 303 अरब बैरल का दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार है। अमरीका ने इसके लगभग पांचवें हिस्से पर नियंत्रण पा लिया है। यह 65 अरब बैरल का आंकड़ा कितना विशाल है कि इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अमरीका के 46 अरब बैरल के अपने कुल तेल भंडार से भी कहीं अधिक है। और यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो यह भारत के लगभग 40 वर्षों के तेल आयात के बराबर है।
ठीक इसी तज़र् पर अमरीका ईरान में भी तेल पर कब्ज़ा करना चाहता है। ईरान के पास लगभग 208 से 209 अरब बैरल का प्रमाणित तेल भंडार है। इस भंडार के साथ ईरान वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर आता है। इसी तेल भंडार पर कब्ज़ा जमाने के लिये अमरीका कभी ईरान में सत्ता विरोधी विद्रोह का फसाना गढ़ता है तो कभी वर्तमान सत्ता को आतंकवादियों को बढ़ावा देने वाली सत्ता बताता है। जब इन चालों व साज़िशों से भी बात नहीं बनती तो इज़रायल व अमरीका मिलकर ईरान पर अकारण आक्रमण कर देते हैं। सऊदी अरब सहित अन्य कई खाड़ी देशों में उसके इशारों पर चलने वाले शासक सत्तासीन हैं और लगभग वे सभी अमरीका को न केवल उसकी मज़र्ी के अनुसार उसे तेल निर्यात कर रहे हैं।
मध्य पूर्व के खाड़ी देशों में सऊदी अरब पारम्परिक रूप से अमरीका को तेल निर्यात करने वाला सबसे प्रमुख मुस्लिम देश है। अमरीकी रिफाइनरियों के लिए सऊदी अरब भारी कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। इराक अमरीका को कच्चा तेल निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। कुवैत भी अमरीकी रिफाइनरियों को अपनी तेल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगातार कच्चे तेल की आपूर्ति करता है। यूएई भी समय-समय पर अमरीकी बाज़ारों में कच्चा तेल और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद भेजता है। इसके अलावा अफरीकी मुस्लिम बहुल देशों में लीबिया से भी अमरीका हाल के वर्षों में अच्छी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता रहा है। इसी तरह नाइजीरिया का स्वीट क्रूड (कम सल्फर वाला तेल) अमरीकी बाज़ार में निर्यात किया जाता है।
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