अभी साफ नहीं है पंजाब में चुनावी मुकाबले की तस्वीर

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों ने राज्य की राजनीति को धीरे-धीरे चुनावी रंग देना शुरू कर दिया है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने अपने करीब साढ़े चार साल के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने धूरी से घर-घर संपर्क अभियान की शुरुआत की है। पार्टी कार्यकर्ताओं के जरिए सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को मतदाताओं तक पहुंचाने तथा जनता से सुझाव लेने की रणनीति अपनाई जा रही है। ‘आप’ के लिए यह चुनाव केवल सत्ता दोहराने का अभियान नहीं, बल्कि अपने शासन के रिकॉर्ड को जनता के सामने रखने की परीक्षा भी है। ‘आप’ सरकार मुफ्त बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार, शिक्षा, महिलाओं से जुड़ी आर्थिक सहायता और नहरी पानी जैसे मुद्दों को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रख रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी मुफ्त बिजली, स्वास्थ्य योजना, रोज़गार और नहरी सिंचाई के विस्तार को सरकार के प्रमुख कामों में गिनाया है। किसानों के बीच नहरी पानी की उपलब्धता और ग्रामीण क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का असर आप के प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाला है। लेकिन सरकार के कामकाज को चुनावी आधार बनाना ‘आप’ के लिए अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा। 5 साल सत्ता में रहने के बाद जनता के सामने उपलब्धियों के साथ वे सवाल भी होंगे जिन पर सरकार से जवाब मांगा जा सकता है। नशे की समस्या, कानून-व्यवस्था, रोज़गार और सरकारी वादों के क्रियान्वयन जैसे मुद्दे विपक्ष लगातार उठाने की तैयारी में है। भाजपा ने नशे के मुद्दे को प्रमुखता देते हुए 18 सितंबर से राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों को जोड़ने वाली नशामुक्त पंजाब यात्रा शुरू की है। इस अभियान से साफ है कि भाजपा चुनावी बहस को केवल मुफ्त सुविधाओं और कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहने देना चाहती।
भाजपा के लिए पंजाब की राजनीति में इस बार एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि पार्टी संगठन को अपने दम पर विस्तार देने पर जोर दे रही है। पार्टी ने सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इससे उसका लक्ष्य केवल कुछ शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहने के बजाय राज्य के अलग-अलग हिस्सों में संगठन और जनाधार बढ़ाने का दिखाई देता है। नशामुक्त पंजाब यात्रा के जरिए भी पार्टी ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है। भाजपा के सामने हालांकि अपनी अलग चुनौतियां भी हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को दो सीटें मिली थीं और उसका मत प्रतिशत करीब 6.6 प्रतिशत रहा था। इसलिए 2027 के चुनाव में सभी सीटों पर उतरने की घोषणा संगठन के विस्तार और व्यापक जनसंपर्क की बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आती है। भाजपा का अभियान कितना व्यापक सामाजिक और क्षेत्रीय समर्थन जुटा पाता है, यह चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण प्रश्न रहेगा।
भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित समझौते की चर्चाएं भी पंजाब की राजनीति में बनी हुई हैं। अगस्त में अकाली दल के कई नेताओं की ओर से गठबंधन की ज़रूरत की बात सामने आई थी, जबकि भाजपा की ओर से स्वतंत्र रूप से सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही गई है। इसलिए गठबंधन को लेकर अभी अलग-अलग राजनीतिक संकेत दिखाई देते हैं। यदि दोनों दलों के बीच कोई समझौता होता है तो सीटों और सामाजिक आधार का तालमेल चुनावी गणित का अलग अध्याय बनेगा, लेकिन फिलहाल भाजपा अपने संगठन के विस्तार पर जोर देती दिखाई दे रही है। ‘आप’ के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह 2022 की तरह फिर बड़ा जनादेश हासिल कर पाएगी। 2022 में आप ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी और उसे करीब 42 प्रतिशत मत मिले थे। इस बार पार्टी के सामने उस प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती है। सत्ता में रहने के कारण उसके पास अपने कामकाज को जनता के सामने रखने का अवसर है लेकिन उसी कारण सरकार के प्रति असंतोष या अधूरे वादों से जुड़े सवाल भी सीधे आप के खाते में जाएंगे।
‘आप’ की वापसी किन परिस्थितियों में हो सकती है, यह उसके कामकाज के प्रति जनता की धारणा, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समर्थन, किसानों और युवाओं के बीच उसके प्रदर्शन तथा विपक्ष के बीच वोटों के बंटवारे जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा। इसके उलट यदि सरकार के खिलाफ असंतोष मजबूत होता है और विपक्ष किसी प्रभावी वैकल्पिक राजनीतिक संदेश के साथ मतदाताओं को जोड़ पाता है तो ‘आप’ के लिए 2022 जैसा प्रदर्शन दोहराना कठिन हो सकता है। अभी इन दोनों संभावनाओं में से किसी एक को चुनाव परिणाम मान लेना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस के लिए भी पंजाब में वापसी का रास्ता संगठनात्मक एकजुटता से होकर जाता है। 2022 में कांग्रेस केवल 18 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद लगातार चर्चा में रहे हैं। सितंबर में कांग्रेस ने भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया। पायलट के सामने पार्टी के अलग-अलग गुटों को साथ लाने और संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी है। कांग्रेस ने फिलहाल मुख्यमंत्री चेहरे की घोषणा नहीं करने की रणनीति अपनाई है। सचिन पायलट के अनुसार पार्टी सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ेगी और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के बारे में निर्णय किया जाएगा। यह व्यवस्था नेतृत्व को लेकर अंदरूनी टकराव को सीमित करने की कोशिश के रूप में सामने आई है। हालांकि कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि संगठनात्मक एकता को केवल मंच तक सीमित न रखकर बूथ स्तर तक मजबूत किया जाए। इस चुनाव में बसपा भी अलग राह पर है और दलित मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रही है। इसके अलावा अकाली दल, भाजपा और अन्य राजनीतिक ताकतें भी अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे में पंजाब का चुनाव बहुकोणीय मुकाबले का रूप ले सकता है और छोटे-छोटे मत प्रतिशत में बदलाव भी कई विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।
कुल मिलाकर पंजाब की 2027 की चुनावी राजनीति में इस समय तीन बड़े प्रश्न दिखाई दे रहे हैं। ‘आप’ अपने शासन के कामकाज और जनकल्याणकारी योजनाओं के आधार पर सत्ता में वापसी का संदेश दे रही है। भाजपा संगठन के विस्तार, नशे और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के सहारे अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस अपने पुराने गुटीय मतभेदों से बाहर निकलकर नए संगठनात्मक ढांचे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। चुनाव में जनता किस मुद्दे को प्राथमिकता देती है और किस दल के स्थानीय संगठन तथा उम्मीदवार मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचते हैं, यही आगे की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व होंगे।

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