किसान मेलों का कृषि विकास में अहम योगदान

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) और यंग फार्मर्स एसोसिएशन (वाईएफए) रखड़ा द्वारा प्रत्येक वर्ष सितम्बर और मार्च में रबी-खरीफ की फसलों संबंधी किसानों को ज्ञान-विज्ञान और बीज देने हेतु किसान मेले लगाए जाते हैं। इन किसान मेलों ने उत्पादन बढ़ाने और गांवों में कृषि प्रसार सेवा पहुंचाने में प्रभावशाली योगदान दिया है। इस वर्ष रबी की फसलों संबंधी बीज और ज्ञान-विज्ञान देने के लिए 23 सितम्बर को यंग फार्मर्स एसोसिएशन द्वारा आईसीएआर-इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट के सहयोग से रखड़ा में मिन्नी किसान मेला लगाया जाएगा, जिसमें आईसीएआर-आईएआरआई और आईसीएआर की संस्था आईआईडब्ल्यूबीआर द्वारा पंजाब की विकसित मुख्य फसल गेहूं के संशोधित और फाउंडेशन बीज किसानों को दिए जाएंगे। 
किसान पिछले वर्षों में सफल सिद्ध हुईं डीबीडब्ल्यू-327, डीबीडब्ल्यू-371 और 372 तथा एचडी-3386 किस्मों के बीज मेले में ले सकेंगे। पीएयू द्वारा आयोजित किसान मेलों में सिर्फ  पीएयू द्वारा विकसित किस्मों के बीज ही किसानों को दिए गए हैं। 
रखड़ा मेले में किसान धान, बासमती की सफल पूसा बासमती-1509 जैसी किस्में जो किसानों को एक लाख रुपये प्रति एकड़ का उत्पादन दे रही हैं, के खेत देखकर विचार-विमर्श करेंगे और आगामी वर्ष के लिए धान, बासमती की किस्मों का चयन करने का मन बनाएंगे। बासमती की पूसा बासमती-1509 किस्म (जो पकने में कम समय लेती है और इस साल एक लाख रुपये तक के मुनाफे का उत्पादन दे रही है), इस मेले के ज़रिए ही पंजाब के किसानों तक पहुंची और इसका प्रसार हुआ। धान की पूसा-44 किस्म जो दो दशकों से ज़्यादा समय तक पंजाब के खेतों की रानी बनी रही और आज भी लगभग 15 प्रतिशत रकबे पर इसकी काश्त होती है, इस मेले के ज़रिए किसानों ने अपनाई और भारी लाभ उठाया। इस किस्म का उत्पादन धान की अन्य सभी किस्मों से अधिक रहा। पूसा बासमती-1121 किस्म जिसका चावल सभी किस्मों से लम्बा है और रसोई की बरकत में अव्वल नम्बर पर है, का भी इस मेले के माध्यम से प्रसार हुआ। इस मौसम के शेष किसान मेले पीएयू द्वारा 25 सितम्बर और 29 सितम्बर को बठिंडा और गुरदासपुर में लगाए जाएंगे। 
पंजाब की धान, बासमती और गेहूं की अधिक उत्पादन देने वाली मुख्य फसलों के संशोधित बीज किसानों तक पहुंचाने में इन इन मेलों का बहुत योगदान है। गत वर्ष तक इन मेलों में दिए जा रहे बीज किसानों के लिए आकर्षण का केन्द्र बने रहे हैं। धान की पूसा-44 और गेहूं की वी.एस. माथुर की एचडी-2329 समेत कई किस्मों के बीज लेने के लिए लम्बी कतारें लगती रहीं, लेकिन अब इनके बीज लेने का रुझान कम हो गया प्रतीत होता है। इस वर्ष रौणी (पटियाला) और अन्य स्थानों पर लगाए गए किसान मेलों में पीएयू द्वारा विकसित गेहूं (जिसकी काश्त 35 लाख हेक्टेयर पर होती है) की नई पीबीडबल्यू-887 किस्म के बीज लेने के लिए भी खरीदार नहीं थे। रौणी में इनके बीज की खुली खरीद भी गई (अर्थात जो किसान जितना चाहे बीज खरीद ले), लेकिन फिर भी यह बड़ी मात्रा में बिना बिके ही रह गया। इसका कारण यह है कि अनुसंधान संस्थान किसानों को एक के बाद दूसरी गेहूं और धान की किस्म दे रहे हैं और निजी क्षेत्र के बिक्रेता और कुछ किसान कथित तौर पर अपना बीज बांट रहे हैं। इस कारण किसान असमंजस में हैं कि वे कौन-सी किस्म चुनें। 
इसलिए बीजों के वितरण और विकास में सुधार लाने की ज़रूरत है। जो किस्में अखिल भारतीय फसलों की किस्मों और गुणवत्ता को प्रमाणिकता देने वाली समिति द्वारा भी जारी नहीं की गईं, वे अधिक उत्पादन तथा अन्य विशेषताएं (जो वास्तव में नहीं होतीं) बता कर बेची जाती हैं।
ऐसा होने से नई विकास-अधीन किस्में जारी होने के बाद विक्रेताओं द्वारा बेचे जा रहे बीजों में मिलावट होने से असली किस्म की गुणवत्ता भी चली जाती है, जिस कारण असली किस्मों से भी किसान मुंह मोड़ लेते हैं। नए बन रहे बीज कानून में ऐसी खामियों को दूर करने की ज़रूरत है। क्या इस साल किसान अपना बीज ही इस्तेमाल करेंगे? क्या बीज विकल्प दर प्रभावित होगी? जो पंजाब में पहले से ही कम है। यह वैज्ञानिकों और उत्पादकों के लिए विचार-विमर्श का विषय बन गया है।
इन किसान मेलों की एक बड़ी भूमिका यह भी है कि किसानों ने मेलों के प्रबंधकों और किसान संगठनों से मांग करके उन्हें मजबूर किया है कि ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों जिन पर किसानों का विश्वास है और उनके द्वारा दिए गए योगदान से उनका समाज में दर्जा ऊंचा हुआ है, को भी सम्मानित किया जाए। ऐसी कुछ विशेष शख्सियतों को यंग फार्मर्स एसोसिएशन (वाईएफए) द्वारा ‘डॉ. अमरीक सिंह चीमा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। डॉ. बरजिन्दर सिंह हमदर्द को (1988-89) यह पुरस्कार और सम्मान दिया गया, जिन्होंने कृषि संबंधी अपने लेखों के ज़रिये किसानों को बहुत लाभ पहुंचाया था। डॉ. गुरदेव सिंह खुश को 2004-05 के लिए यह पुरस्कार दिया गया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चावल की सफल किस्मों और तकनीकी ज्ञान किसानों तक पहुंचा कर उनकी आय बढ़ाई। ‘पद्म भूषण’ राजू श्रॉफ जिन्होंने एग्रो-केमिकल्स इंडस्ट्री को किसान पक्षीय बनाया, को 2006-07 के लिए ‘डॉ. अमरीक सिंह चीमा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

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