जीवन के लिए बड़ी चुनौती बनेगा भू-जल का गिरता स्तर 

भारत में भविष्य में गंभीर जल संकट होने की बहुत अधिक आशंका है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक यदि जल प्रबंधन में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थिति अत्यधिक चिंताजनक हो जाएगी। नीति आयोग और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारत में जल संकट की स्थिति यह है कि मांग और आपूर्ति में भारी अंतर आ रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी। भू-जल में भारी गिरावट आई है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भू-जल उपभोक्ता है। उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत विशेषकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में भू-जल का स्तर लगातार गिर रहा है क्योंकि रिचार्ज की तुलना में पानी का दोहन बहुत तेजी से हो रहा है।
जल जीवन का आधार है लेकिन जिस रफ्तार से हम धरती के नीचे जमा पानी को निकाल रहे हैं, वह आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी है। भारत में विशेषकर उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में भू-जल स्तर में गिरावट कोई नई बात नहीं है लेकिन विश्व मौसम विज्ञान संगठन की नवीनतम रिपोर्ट यह बताती है कि समस्या अब किसी एक वर्ष के कम वर्षा वाले मौसम तक सीमित नहीं रही। कई क्षेत्रों में लगातार कई वर्षों से भू-जल सामान्य स्तर से नीचे बना हुआ है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि हम जमीन से जितना पानी निकाल रहे हैं, प्रकृति उतना वापस जमा नहीं कर पा रही है। ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज 2025’ रिपोर्ट के अनुसार 2022 से 2025 के बीच अमरीका, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में लगातार भू-जल की कमी दर्ज की गई। अनेक क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन को इसका महत्वपूर्ण कारण माना गया है। 2025 में जिन भू-जल निगरानी केंद्रों के आंकड़े उपलब्ध थे, उनमें लगभग 34 प्रतिशत पर भू-जल स्तर सामान्य से कम या काफी कम पाया गया। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत था यानी केवल एक वर्ष में सामान्य से कम भू-जल वाले निगरानी केंद्रों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े उन्हीं क्षेत्रों पर आधारित हैं, जहां नियमित निगरानी उपलब्ध है। फिर भी लंबे समय से जारी गिरावट का रुझान चिंता पैदा करता है। भारत के लिए यह चेतावनी और गंभीर है। देश की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और तेजी से फैलते शहरों की जलापूर्ति बड़े पैमाने पर भू-जल पर निर्भर है। उत्तरी भारत में 2025 के दौरान स्थलीय जल भंडारण सामान्य से कम दर्ज किया गया। यदि भू-जल निकालने और उसके पुनर्भरण के बीच अंतर लगातार बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में पेयजल, सिंचाई और उद्योग तीनों पर दबाव बढ़ सकता है। भू-जल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह दिखाई नहीं देता। नदी सूखती है तो हमें संकट दिखाई देता है, तालाब खाली होता है तो चिंता होती है, लेकिन जमीन के सैकड़ों फुट नीचे गिरते जलस्तर का एहसास तब होता है जब हैंडपंप, कुएं और बोरवेल जवाब देने लगते हैं। स्थिति यह है कि दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े महानगरों में बोरवेल सूख रहे हैं या उनका पानी दूषित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार, 2050 तक देश के 50 प्रतिशत ज़िलों में गंभीर जल संकट हो सकता है। शहरों में बढ़ता कंक्रीटीकरण इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। ऊंची-ऊंची इमारतें बन रही हैं, खाली जमीन लगातार घट रही है और मिट्टी की जगह सीमेंट कंक्त्रीट ले रहा है। 
सड़कें, पार्किंग स्थल, आवासीय परिसर और व्यावसायिक भवन शहरों के बड़े हिस्से को ऐसी पक्की सतह में बदल रहे हैं, जहां बारिश का पानी जमीन के भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाता। बारिश होती है, पानी आता भी है, लेकिन वह नालियों और जलनिकासी व्यवस्था के रास्ते तेजी से शहर से बाहर निकल जाता है। जिस पानी को जमीन के भीतर जाकर भू-जल भंडार भरना चाहिए था, वह कुछ घंटों में बह जाता है। विडंबना यह है कि एक ओर शहरों में बारिश के समय जलजमाव होता है, वहीं दूसरी ओर गर्मियों में भू-जल की कमी की शिकायत सामने आती है। पेड़ केवल हवा को स्वच्छ करने या तापमान कम करने के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। वे स्थानीय जलचक्र का भी अहम हिस्सा हैं। मिट्टी, वनस्पति व खुले भू-भाग बारिश के पानी को रोकने और धीरे-धीरे जमीन के भीतर पहुंचाने में मदद करते हैं लेकिन शहरों के विस्तार के नाम पर पेड़ों की कटाई और खुले क्षेत्रों का लगातार कम होना मिट्टी व पानी के इस प्राकृतिक संबंध को कमजोर कर रहा है। इसलिए शहरी विकास की योजना बनाते समय हरित क्षेत्र, तालाब, जलाशय, खुले मैदान और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों को बचाना आवश्यक है। संकट केवल भू-जल तक सीमित नहीं है। 
इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया है और जल जीवन मिशन तथा अटल भूजल योजना जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं। भविष्य में इस संकट से बचने के लिए वर्षाजल संचयन, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण  और सूक्ष्म सिंचाई (जैसे ड्रिप इरिगेशन) को बड़े पैमाने पर अपनाना ज़रूरी है। हर नागरिक को जल का महत्व समझते हुए जल की बर्बादी को रोकने के लिए जागरूक होना होगा।

#जीवन के लिए बड़ी चुनौती बनेगा भू-जल का गिरता स्तर