विवाद में घिरी विशेष सुधारों की प्रक्रिया
भारत के संविधान अनुसार प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी अलग-अलग पड़ाव की सरकारें चुनने का अधिकार है। संविधान लागू होने के बाद से यह सिलसिला लगातार चलता आ रहा है। इसमें भारतीय चुनाव आयोग अहम भूमिका अदा करता रहा है और इसकी ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बन गया है। चुनाव आयोग द्वारा भी इस पूरे समय में लगातार चुनाव प्रक्रिया में संशोधन किए जाते रहे हैं। इनके संबंध में समय-समय पर विवाद भी उठते रहे हैं, जिन्हें उच्च स्तर पर हल करने का भी यत्न किया जाता रहा है। मत पेटियों से लेकर आज यह प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल बनी दिखाई देती है। मतदाता पहचान पत्रों में जब मतदाता की तस्वीर प्रकाशित किए जाने का फैसला हुआ था तो उस पर भी बड़ा विवाद उठा था।
चाहे इसलिए इलैक्ट्रॉनिक मशीनों का इस्तेमाल विगत लम्बी अवधि से होता आ रहा है परन्तु अभी तक भी इनके संबंध में प्रकट की जाती आशंकाओं के साथ-साथ इनकी आलोचना का सिलसिला भी जारी है। वोट प्रक्रिया को सही बनाने के लिए मतदाताओं की सही पहचान को भी ज़रूरी बनाया जाना चाहिए। इसके लिए समय-समय पर मतदाता सूची के संशोधन का काम ज़रूर होता रहा परन्तु इस प्रक्रिया की निरंतरता नहीं बनाई जा सकी। बड़ी जनसंख्या वाले विशाल देश में लोगों का लगातार अन्य राज्यों में आना-जाना बना रहता है। बड़ी संख्या में लोग विदेशों में भी पलायन करते रहते हैं। इस प्रक्रिया में मरने वालों की संख्या का पूर्ण विवरण भी निश्चित किया जाना ज़रूरी है। आज लाखों की संख्या में पड़ोसी देशों की सीमाओं से ़गैर-कानूनी ढंग से लोग यहां प्रवेश भी करते रहते हैं। असम, बंगाल, बिहार और देश के अन्य उत्तरी-पूर्वी राज्यों से लगातार ऐसी शिकायतें मिलती रहती हैं। इस पूरे घटनाक्रम को अनुशासन में रखने के लिए चुनाव आयोग को अधिक सतर्क होने के साथ-साथ तत्पर रहने की भी ज़रूरत है, परन्तु अब जब चुनाव आयोग ने मतदाताओं के विशेष संशोधन का काम शुरू किया है तो इस संबंध में लगातार विवाद भी बना रहा है।
बंगाल में हुए चुनाव में यह विवाद इसलिए ज्यादा गर्मा गया कि इनमें जहां लाखों ही व्यक्तियों के नाम काट दिए गए, वहीं मतदाता की पहचान प्रक्रिया इस सीमा तक जटिल थी, जिसमें आम व्यक्ति उलझ कर रह गया था। इस कारण अदालतों में इस संबंध में लाखों ही याचिकाएं भी दायर की गईं। यही सिलसिला, यही विवाद बिहार चुनाव के दौरान भी गर्माया रहा। विशेष रूप से विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग को निशाना बनाते हुए यह आशंका भी ज़ाहिर की कि इसमें एक विशेष पार्टी की सहायता की जा रही है, परन्तु चुनाव आयोग द्वारा अलग-अलग चरणों में विशेष संशोधन का यह सिलसिला जारी रखा गया। विगत दिवस दिल्ली में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 33 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस मिले हैं। इस संबंध में विपक्षी पार्टियों द्वारा यह कहा जाता रहा है कि पहचान के आधार स्पष्ट करने की ज़रूरत है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कड़ा संज्ञान लिया है और कहा है कि तर्कपूर्ण त्रुटियों की पहचान करने संबंधी स्पष्टीकरण की ज़रूरत है।
एक जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने के विशेष कारणों का उचित ढंग से खुलासा नहीं कर सके। इस विवाद के दृष्टिगत अब यह समाचार उजागर हुआ है कि चुनाव आयोग के सदस्यों में आपसी तालमेल नहीं है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि 10 माह में 2 चुनाव अधिकारियों ने 14 बार मुख्य चुनाव कमिश्नर के पास लिखित रूप में अपने एतराज़ प्रकट किए हैं। इसने एक बार फिर बड़ा विवाद और चर्चा छेड़ दी है। ऐसी स्थिति में देश के सर्वोच्च न्यायालय के लिए अपना फज़र् निभाना ज़रूरी है, ताकि वह लगातार उठ रही इन आशंकाओं का हल करने में सहायक हो।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

