जेन जी की मुश्किलें

नीति आयोग की हाल ही में आई एक रिपोर्ट चिंताजनक है। इस रिपोर्ट को ‘री-इमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत’ नाम दिया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 15-29 वर्ग के 8.7 करोड़ जेन जी न तो कोई शिक्षा या ट्रेनिंग ले रहे हैं, न ही किसी रोज़गार में हैं। देश में कुल 40 करोड़ जेन जी हैं, जिनमें से 8.7 करोड़ युवाओं को ‘कुछ न करने वालों’ की श्रेणी में माना जाना चाहिए। सरकार का तर्क यह है कि ये घर के कामकाज या व्यवसाय में हाथ बंटाते हैं। लगता है कि अवसर की कमी एक मुख्य कारण हो सकता है। अगर इन्हें आसानी से अवसर मिल पाते तो इनमें से अधिकांश अपनी पीछे छूट गई पढ़ाई, रोज़गार देने वाली कोई ट्रेनिंग या कोई अन्य काम पकड़ लेते। नीति आयोग ने सरकार से अनुरोध किया है कि इन्हें किफायती या फ्री-वोकेशनल ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। ऐसे युवा वर्ग को सरकार नीट (नॉट इन एजुकेशन, एंप्लॉयमेंट ट्रेनिंग) वर्ग में रखती है, जिसके लिए अनुरोध है कि देश को युवा शक्ति का पूरा फायदा मिलना चाहिए। भारत बड़ी संख्या का महादेश है। इस देश में ‘नीट’ वर्ग में जितने युवा बताए गए हैं, उतनी तो जर्मनी, फ्रांस की जनसंख्या भी नहीं है। आज अगर उन्हें शिक्षा और मुनासिब ट्रेनिंग के बाद बेहतर जीवन का अवसर उपलब्ध होता तो शायद ही किशोर वर्ग के लड़के-लड़कियां परिवार वालों के काम में हाथ बंटाते, दुकान पर बैठते या फिर खेत में फसलों को पानी लगा रहे होते। शिक्षा और ट्रेनिंग आजीविका से जोड़ना ही बेहतर परिणाम है परन्तु क्या हम व्यवहारिक स्तर पर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
2002 में 86वें संविधान संशोधन के जरिए-21-ए जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया और परिणामस्वरूप 1 अप्रैल, 2010 में कानून लागू हुआ। इसके साथ सार्वजनिक शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने की ज़रूर पर ज़ोर बढ़ा और एनरोलमेंट की दर 98 प्रतिशत हो गई। इससे लाखों बच्चे शिक्षा के दायरे में आ गये, लेकिन ‘लर्निंग डेफिसिट’ यानी सीखने की कमी बनी रही। अब हुआ यह कि इसी व्यवस्था की कमियां ढूंढ कर व्यवस्था को ताकत देने की जगह निजी स्कूलों में बढ़ते दाखिलों की तरफ चले गये। लिहाज़ा शिक्षा को महंगा होने से कोई नहीं बचा सकता था। जेन जी की मुश्किलों में इज़ाफा होता गया। सभी राजनीतिक पार्टियां इस समय जेन जी को प्रभाव क्षेत्र में लाने के लिए प्रयत्नशील हैं, लेकिन व्यवहार के स्तर पर वे जेन जी के मर्म को कितना छू सके हैं यह तो समय ही बताएगा। चुनौती यह है कि आने वाले दशक के लिए भारत के पास मौजूदा वर्कफोर्स की क्षमता किफायती और बेहतरीन शिक्षा हासिल करने के अवसरों में गिरावट के कारण धीरे-धीरे सुस्त रफ्तार हो रही है। गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों के लिए बेहतर जीवन-स्तर का ऊंचा उठने का सपना शिक्षा और उपयुक्त कौशल हासिल करने से जुड़ा है। साइन बोर्ड और पोस्टर बनाने वाला पेंटर अब कम्प्यूटर डिजाइनिंग की तरफ चला गया है और फ्लेक्स बना रहा है। परिवर्तन का दौर है। हमें लगातार परिवर्तन करते हुए शारीरिक श्रम से अधिक ऑटोमेटड-मैन्युफैक्चरिंग की तरफ जाना है। जबकि मिसिंग स्टूडैंट की संख्या में इज़ाफा हो रहा है। सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2024-25 में 10.13 लाख रह गई है। यह गिरावट परेशान करने वाली है। जेन जी अब चुप रहने वाले नहीं हैं। वे डंके की चोट पर खुलकर बात करते हैं। झूठे दिलासे, प्रपंच, आकर्षक नारे उनकी मदद नहीं कर सकते तो वे इस सब से बाहर क्यों आए। शिक्षा संबंधी मुख्य प्रश्नों पर ध्यान देना ज़रूरी है। शिक्षा और उससे मिलने वाला रोज़गार उनका संकट बन रहा है।

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