नई शिक्षा नीति-2020 : सम्भावनाएं और चुनौतियां
भारत सरकार ने 29 जुलाई, 2020 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को स्वीकृति देकर लगभग 34 साल बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को सिर्फ परीक्षा पास करके डिग्री प्राप्त करने तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान-आधारित, नवाचार-आधारित, रोज़गारोन्मुख कौशल प्रदान करना है। आज इस नीति के लागू होने के छह साल बाद इसका मूल्यांकन करते समय यह देखना ज़रूरी है कि यह शिक्षा व्यवस्था युवाओं को 21वीं सदी के बदलते रोज़गार बाज़ार के लिए ज़रूरी कौशल विकास में कितना सफल हो रही है? ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डिजिटलाइजेशन और वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में यह सवाल और भी अहम हो जाता है, क्योंकि भारत के युवा वर्ग को जनसंख्यात्मक लाभांश में बदलने के लिए शिक्षा और कौशल विकास के बीच एक मज़बूत तालमेल बहुत ज़रूरी है।
संभावनाएं : नई शिक्षा नीति-2020 की सबसे महत्वपूर्ण पहल स्कूल स्तर पर रोज़गारोन्मुख शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ना है, जिसके लिए छठी कक्षा से ही छात्रों को पारम्परिक शिक्षा के साथ-साथ रोज़गारोन्मुख कौशल जैसे बढ़ई या बिजली का काम, बागवानी, मिट्टी के बर्तन बनाना, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण या कोडिंग आदि के ज़रिये हाथ से काम करके व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यदि छात्र कक्षा में प्राप्त किए ज्ञान को व्यावहारिक प्रयोग, परियोजना, क्षेत्र भ्रमण, केस-स्टडी या टीम वर्क के साथ जोड़ कर समस्याओं का समाधान करेंगे तो उनमें संचार, सहयोग और निर्णय लेने जैसे कौशल विकसित हो सकते हैं। दूसरा, शिक्षा नीति-2020 के तहत बहु-विषयक शिक्षा और नए कौशल को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों का चयन करने और उन्हें आपस में जोड़ कर पढ़ने के अवसर दिए हैं, जैसे कि अर्थशास्त्र के साथ इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ भौतिक विज्ञान, व्यापार प्रबंधन के साथ कृषि या डेटा विश्लेषण के साथ व्णज्य आदि। बहु-योग्यता वाले ग्रेजुएट तैयार करने के लिए बहु-विषयक विश्वविद्यालयों की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, फिनटेक, नवीकरणीय ऊर्जा, ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे उभरते क्षेत्रों में कोर्सों की मांग बढ़ रही है। तीसरा स्वयं, दीक्षा, पीएण ई-विद्या, एनपीटीईएल, वर्चुअल लैब्स और डिजिटल लाइब्रेरियों जैसे प्लेटफार्मों ने विद्यार्थियों के लिए सीखने के नए अवसर दिए हैं। अब विद्यार्थी अपने समय और स्थान पर कोडिंग, डेटा विश्लेषण, भाषाएं, वित्तीय साक्षरता और दूसरे रोज़गारोन्मुख कौशल सीख सकते हैं।
लेकिन ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के कई विद्यार्थियों के लिए इंटरनेट, स्मार्ट फोन, कंप्यूटर और निरन्तर बिजली आपूर्ति आज भी एक समस्या है। चौथा, इस शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा में लचकता बढ़ाने के लिए मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट डिग्री प्रोग्रामों की व्यवस्था की है, जिसके तहत विद्यार्थी एक साल की पढ़ाई के बाद सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और तीन या चार साल पूरे करने के बाद डिग्री प्राप्त कर सकता है और ज़रूरत के अनुसार बाद में दोबारा पढ़ाई भी शुरू कर सकता है। पांचवीं पहल है शिक्षा एवं उद्योगों के बीच अंतर देश में कौशल विकास की बड़ी कमज़ोरियों में से एक होने के कारण इसे कम करने के लिए इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-अकादमिक साझेदारी प्रभावशाली स्रोत बन सकते हैं। इसके अलावा नई शिक्षा नीति युवाओं को सिर्फ नौकरी ढूंढने वाला बनाने की बजाय नौकरी पैदा करने वाला बनाना चाहती है।
प्रमुख चुनौतियां : इस नई शिक्षा नीति-2020 को प्रभावशाली ढंग से लागू करने में कई चुनौतियां दरपेश आ रही हैं। पहली, अलग-अलग राज्यों में इस शिक्षा नीति को लागू करने की गति बहुत धीमी है और पहुंच में भी बहुत अंतर है। शिक्षा संविधान की समकालीन सूची का विषय होने के कारण केन्द्र और राज्यों के बीच प्रभावशाली तालमेल की कमी की वजह से कई राज्यों ने इस नीति को उत्साह से लागू किया है जबकि शेष ने मजबूरी में सिर्फ चुनिंदा प्रबंधों को ही अपनाया है। दूसरी चुनौती है मज़बूत आधारभूत ढांचे की कमी, खासकर सरकारी स्कूलों और ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां प्रयोगशालाएं, वर्कशॉप, कंप्यूटर, तेज़ इंटरनेट कनेक्टिविटी और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी के कारण परम्परागत शिक्षा पर ज़्यादा और व्यवहारिक कौशल-आधारित शिक्षा कम ध्यान दिया जाता है। तीसरी, अभी भी कई परिवार वोकेशनल एजुकेशन के बजाय डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर या दूसरे पारम्परिक व्यवसाय को ज़्यादा अहमियत देते हैं। इसलिए, सफल करियर और ज़्यादा आय से जुड़े कौशल-आधारित व्यवसाय के बारे में जागरुकता बढ़ाने की ज़रूरत है। चौथा, इस नई नीति ने शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को देश के जीडीपी के 6 प्रतिशत तक खर्च करने का लक्ष्य रखा हुआ है, जबकि असल में खर्च सिर्फ चार फीसदी के करीब ही हो रहा है, जिसकी वजह से स्कूलों व कालेजों में लैब, डिजिटल सुविधाएं, कौशल केन्द्र, डिजिटल ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए आवश्यक निवेश के बिना नीतिगत उद्देश्य को पूरा करना असम्भव है। अगर केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर निरन्तर ज़्यादा निवेश करके इस नीति को प्रभावशाली तरीके से लागू करें तो भारत एक प्रमुख ज्ञान अर्थ-व्यवस्था और विश्व स्तरीय मानवीय पूंजी वाला राष्ट्र बन सकता है।
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