चुनाव आयोग की पारदर्शिता
एक बार फिर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के मामले में चुनाव आयोग जनता के कटघरे में खड़ा है। गत वर्ष जब से मतदाताओं का विशेष गहन पुनरीक्षण का यह कार्य शुरू हुआ है, उस समय से ही इसे लेकर बड़े विवाद चले आ रहे हैं। चाहे इस बार यह संशोधन कई वर्ष पिछड़ कर हुआ है, परन्तु इससे पहले इस संबंधी बड़े विवाद सामने नहीं आए थे। इस विशेष गहन पुनरीक्षण का अर्थ मृतक मतदाताओं के नाम हटाना, विभिन्न स्थानों पर दोहरे इंदराजों की पहचान करना तथा दाखिल हुए फज़र्ी नामों को हटाना शामिल है, परन्तु इस बार आयोग द्वारा यह प्रक्रिया इस प्रकार जटिल बना दी गई है, जिससे लोग हैरान-परेशान हो रहे हैं। यहां तक कि जो लोग पिछली लम्बी अवधि से प्रत्येक तरह के चुनाव में मतदान करते आ रहे थे, उनके नाम भी काटे गए या उनके नाम तार्किक विसंगतियों या संदिग्ध मतदाताओं वाली सूची में डाल कर उन्हें नोटिस जारी कर दिए गए। ऐसी हज़ारों नहीं, लाखों खामियां सामने आईं, जिनसे यह प्रभाव पक्का हो गया कि आयोग द्वारा अपनाई गई यह प्रक्रिया जटिल होने के साथ-साथ त्रुटियों से भरपूर भी है।
उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में हुए चुनावों से पहले लाखों नाम मतदाता सूची में से इसलिए काट दिए गए थे कि उनके नामों का वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मेल नहीं हो सका। पश्चिम बंगाल में लाखों ही मतदाता इसलिए अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके, क्योंकि उनका नाम ‘संदिग्ध श्रेणी’ में डाला गया था। इस संबंध में बड़ी आपत्तियां उठने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें सुनने के लिए ट्रिब्यूनल बनाए थे। जितने भी संदिग्ध मतदाताओं का निपटारा इन ट्रिब्यूनलों ने किया है, उनमें लगभग 10 में से 9 लोगों के नाम वापस मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं, परन्तु संदिग्ध मतदाताओं की संख्या इतनी बड़ी है और ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया ऐसी है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि अपील आधीन मामलों को निपटाने के लिए 12 वर्ष तक लग सकते हैं। बिहार में हुए चुनाव में भी यही घटनाक्रम देखा गया। इसलिए बड़ी संख्या में मतदाता अदालतों और ट्रिब्यूनलों के चक्कर में घिरे दिखाई देते रहे हैं। संदिग्ध मतदाता नोटिसों और कटौतियों में फंस कर बुरी तरह उलझ कर रह गया है। इसीलिए ही विपक्षी पार्टियों और अन्य संगठनों द्वारा इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब तक तमिलनाडू, गुजरात, उत्तर प्रदेश सहित 12 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की सूचियों में करोड़ों नाम काटे गए हैं। एक अनुमान अनुसार पूरे देश में से इस प्रक्रिया दौरान 13 करोड़ से भी अधिक नाम काटे गए हैं, जिस कारण बुरी तरह असमंजस वाली स्थिति पैदा हो गई है। भारतीय चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, परन्तु जिस प्रकार यह काम कर रही है उससे यह ज़रूर लगता है कि इसकी कोई जवाबदेही नहीं है। इसलिए इस आज़ाद संस्था में पैदा हुई तानाशाही रुचियों की बड़े स्तर पर आलोचना होनी शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संबंधी यह कहा है कि आयोग के काम में पारदर्शिता के साथ-साथ इसकी प्रक्रिया में लोगों की विश्वसनीयता होना भी बहुत ज़रूरी है। इस संबंधी एक समाचार पत्र की रिपोर्ट अनुसार पिछले 10 माह में 2 चुनाव आयुक्तों ने अक्तूबर, 2025 से अगस्त, 2026 तक 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनियंत्रित कार्यों पर आपत्ति जताई है। इस खबर से पहले ही बना यह विवाद और भी बढ़ गया है। इससे कांग्रेस सहित बहुत सी विपक्षी पार्टियों को मुख्य चुनाव आयोग की कार्रवाई संबंधी सख्त आलोचनात्मक रुख अपनाने का मौका मिल गया है। चाहे सीधे तौर पर न सही परन्तु इस विवाद ने केन्द्र सरकार के लिए नमोशी वाली स्थिति ज़रूर पैदा कर दी है, क्योंकि इस पूरे क्रम दौरान विरोध की उंगलियां सरकार की ओर ही उठ रही हैं। नि:संदेह इस समूचे विवरण का निपटारा पारदर्शी ढंग के साथ होना ज़रूरी है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त एक बार फिर लोगों के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

