लोकतंत्र के हित में नहीं चुनाव आयोग के भीतर असहमति 

लोकतंत्र में सरकारों से असहमति असामान्य बात नहीं है। विपक्ष से टकराव भी नया नहीं है और न ही संसद में तीखी बहस। सच तो यह है कि बहस लोकतंत्र की आत्मा होती है। लेकिन जब देश में निष्पक्ष चुनाव करने वाली सर्वोच्च संवैधानिक संस्था के भीतर से ही उसके कामकाज और निर्णयों पर गंभीर असहमतियों का विस्फोट हो, तो इसे सामान्य मतभेद कहकर नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होता। 
चुनाव आयोग के दो आयुक्तों द्वारा अलग-अलग मौकों पर दर्ज की गई 14 असहमतियों और आपत्तियों का खुलासा होना, इसलिए महज आयोग के भीतर का प्रशासनिक मसला नहीं है, क्योंकि यह उस विश्वास से जुड़ा प्रश्न है, जिस पर न केवल भारत की समूची चुनाव व्यवस्था बल्कि लोकतंत्र का भविष्य टिका है। इस खुलासे से चिंता केवल इस बात की नहीं है कि दो सह-चुनाव आयुक्तों कि राय की मुख्य चुनाव आयुक्त ने अनदेखी की। लोकतंत्र में कभी-कभी असहमति भी उसका उर्वर पक्ष होता है। लेकिन असहमति चिंता तब बन जाती है, जब पता चलता है कि इन असहमतियों का स्वरूप क्या था, निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी सामूहिक और पारदर्शी थी तथा उन आपत्तियों का अंतिम रूप से निस्तारण किस तरह हुआ? चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रियाभर नहीं है, यह जनता के विश्वास की भी सबसे बड़ी परीक्षा है। इसलिए जब चुनाव कराने वाली संस्था के भीतर से ही सवालों का तूफान सुनायी पड़े तो लोकतंत्र को चुप नहीं, ज्यादा पारदर्शी होना चाहिए। 
दरअसल भारतीय निर्वाचन आयोग से जुड़ा ताजा विवाद इसीलिए असाधारण महत्व रखता है। एक समाचरार पत्र पड़ताल के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के निर्णयों और आदेशों को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की बात कही है। इनमें कुछ आपत्तियां सीधे इस बात से संबंधित थीं कि निर्णय या आदेश उनकी जानकारी अथवा स्वीकृति के बिना जारी किये गये। यही नहीं एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज होने की बात भी सामने आयी है। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, सुझाव, असहमति और आंतरिक जांच सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार पिछले एक वर्ष में लिये गये सभी निर्णय, जिनमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनर्निरीक्षण भी शामिल है, पूर्ण आयोग के सर्वसम्मति निर्णय थे। लेकिन यहीं से असली सवाल शुरु होता है। यदि सब कुछ सामान्य था तो दो चुनाव आयुक्तों को बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि ये आपत्तियां केवल प्रारूप तैयार करने के दौरान दिये गये सामान्य सुझाव थे, तो उनकी विषयवस्तु क्या थी और अंतिम निर्णय में उनका क्या निस्तारण हुआ? अगर ये आपत्तियां महत्वपूर्ण थीं, तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि उन आपत्तियों पर अंतत: क्या विचार किया गया?
इस समूचे मामले में उपलब्ध विवरण वास्तव में इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं। 28 अक्तूबर 2025 को  संधू ने आयोग की मंजूरी के बिना उसके नाम से पत्र और आदेश जारी किये जाने पर सवाल उठाया। अप्रैल 2026 में नई सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र और पोर्टल के बारे में उन्हें माध्यमों से जानकारी मिलने पर आपत्ति दर्ज हुई तथा उसी महीने विवेक जोशी ने आयोग की बैठकों की कार्यवाई और आगामी बैठकों के विषयों को लेकर सवाल उठाये। यही नहीं अधिकारियों की विदेश यात्राओं पर भी आयोग की मंजूरी का प्रश्न उठाया। जबकि मई 2026 में विवाद सीधे मतदाता सूची तक पहुंच गया। नये मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रपत्र-6 बदलाव पर जोशी ने आपत्ति जतायी। उनका तर्क था कि यह वैधानिक प्रपत्र है, इसलिए उसमें बदलाव निर्धारित नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जाना चाहिए। संधू ने भी आपत्ति का समर्थन किया और बाद में उन्होंने (संधू ने) इस बदलाव को कथित रूप से अनधिकृत और गैर-कानूनी माना। यह कोई मामूली प्रशासनिक प्रश्न नहीं है। चुनाव आयोग के संदर्भ में प्रपत्र-6 वह रास्ता है, जिसमें कोई नया मतदाता, मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरु करता है। ऐसे प्रपत्र में किसी भी बदलाव का सीधा संबंध नागरिक के मताधिकार से है। इसलिए यहां सवाल केवल यह नहीं है कि बदलाव सही था या गलत, सवाल यह है कि क्या वैधानिक प्रक्त्रिया का पूरा पालन हुआ? यदि हुआ तो उसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक होना चाहिए और नहीं हुआ, तो यह जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि क्यों नहीं हुआ? एक और गंभीर आपत्ति मतदाता सूची के आंकड़ों के बढ़ते केंद्रीयकरण को लेकर भी सामने आयी है। सह-चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में मतदाता सूची के आंकड़ों के केंद्रीयकरण पर चिंता जताते हुए इस संबंध में लेखा परीक्षण की आवश्यकता बतायी थी। जुलाई में दोनों चुनाव आयुक्तों ने काम में बदलाव को लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे, बाद में दोनों ने संबंधित आदेश को रद्द किया।         -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#लोकतंत्र के हित में नहीं चुनाव आयोग के भीतर असहमति