बाबा शेख फरीद की दरवेस आत्मा

बाबा शेख फरीद सूफी पैगंबर, एक दरवेश आत्मा, चिश्ती सिलसिले की रूह-ए-रवां और पंजाबी के आदि कवि थे। बाबा फरीद और अन्य सूफियों के बारे में सबसे प्रमाणित मानी जाती पुस्तक ‘सिअर-उल-औलिया’ के लेखक मुहम्मद मुबारक अलअल्वी किरमानी (अमीर खुर्द) ने उन्हें ‘पीरों का पीर’ कहा है। शांत स्वभाव वाले, मृदु-भाषी और धैर्य रखने वाली इस दिव्य आत्मा को जनमानस झुक कर सिजदा करता है। विनम्रता और सादगी के इस मुजस्समे का आगमन 1173 ई. को मुल्तान से दस किलोमीटर दूर कोठेवाल गांव में हुआ, जिसे अब चावली मसाइखां के नाम से जाना जाता है। उस समय यह सिंध प्रांत का हिस्सा था। 
शेख फरीद के पूर्वज इस्लाम के दूसरे खलीफा हज़रत उमर के खानदान से थे। उनकी पृष्ठभूमि काबुल के बादशाह फारूक शाह आदल से जुड़ी है। दादा शेख सुअैब, गज़नी के राजा के भाई थे। जब चंगेज़ खान ने काबुल को तबाह कर दिया, तो काज़ी सुअैब लाहौर होते हुए कसूर तथा अंत में कोठेवाल जा ठहरे। उन्हें वहां का काज़ी बनाया गया। यहीं पर पिता जमाल-उद-दीन और बीबी मरियम (करसूम बीबी) के घर तीन बेटे और एक बेटी ने जन्म लिया। बीच वाले बेटे का नाम फरीद-उद-दीन मसउद रखा गया। बाबा फरीद की माता बीबी मरियम हज़रत अली के खानदान से संबंधित सैयद मुहम्मद अब्दुल्ला शाह की बेटी थीं। हज़रत मुहम्मद के चाचा हज़रत अब्बास के खानदान से शेख वजीहुद्दीन ने मरियम को गोद लिया था। हिन्दुस्तान आते समय वह मरियम को साथ लाए और उनका निकाह जमाल-उद-दीन से कर दिया, जिसके बाद शेख फरीद का जन्म हुआ। श्री गुरु अर्जन देव जी फरमाते हैं :
फरीदा खलक खलक महि खलक वसै रब्ब माहि।।
मंदा किस नो आखीअै जा तिसु बिनु कोइ नाहि।। 
(स्लोक, शेख फरीद जी, अंग : 1381)
यह स्लोक साफ कर देते हैं कि बाब फरीद जी और नानक जी मानते हैं कि परमात्मा मानवता में बसता है। उसका निवास मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में नहीं है। मानवता को प्यार करने वाला ही परमात्मा को प्यार करता है। बाब फरीद जी के श्लोगक आदि ग्रंथ में संकलित किए हैं, जिनमें से चुनिंदा श्लोकों का वर्णन किया जा रहा है। आदि ग्रंथ में संकलित बाणी का वर्गीकरण : 
सच्चे कौन हैं?
दिलहु मुहबति जिंन सेई सचिया।।
जिन मनि होरु मुखि होरु सि कांढे कचिआ।। 
(अंग :488)
रब्ब का स्वरूप क्या है :
फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ माखिओ माझा दुधु।।
सभै वस्तु मिठीयां रब्ब ना पुजनि तुधु।। 
(अंग : 1378)
सब्र की परिभाषा :
रुखी सुखी खाए कै ठंडा पानी पीओ।।
फरीदा देखि पराई चोपड़ी ना तरसाए जीओ।। 
(अंग : 1379)
बिरहा : 
बिरहा-बिरहा आखीअै बिरहा तू सुल्तानु।।
फरीदा जितु तनि बिरहु न उपजै सो तनु जाणु मसानु।। 
(अंग : 1378)
रब्ब की रज़ा :
फरीदा दुखु सुखु एकु करि दिल ते लाहि विकारु।।
जे तऊ पिरीया दी सिक हिआऊ न ठाहे कही दा।।
अमीर श्रेणी संबंधी : 
फरीदा रोटी मेरी काठ की लावण मेरी भुख।।
जिना खाधी चोपड़ी घणे सहिणगे दुख।।
फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु।।
अगै गए सिंझापसनि चोटां खासी कऊण।।
फरीदा कोठे मंडप माड़ीया उसारेदे भी गए।।
कूड़ा सउदा करि गए गोरी आए पये।।
अमीरी एवं बेनिआज़ी : 
फरीदा कोठे मंडप माड़ीया एतु ना लाए चितु।।
मिटी पई अतोलवी कोइ न होसी मितु।।
फरीदा मंडप मालु न लाइि मरग सताणी चिति धरि।।
साई जाइि समालि, जिथै ही तऊ वंझणा।।
बुरे दा भला कर : 
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हंडाइि।।
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइि।।
फिक्का ना बोल : 
इकु फिका न गालाइि मैं सचा धणी।।
हिआऊ न कैही ठाहि माणक सभ अमोलवे।।
बाहरी भेख का खंडन : 
फरीदा कंनि मुसला सूफु गलि दिलि काती गुड़ु वाति।।
बाहरि दिसै चानणा दिलि अंधिआरी राति।।
आपा पड़चोल : 
फरीदा जे तू अकलि लतीफु है काले लिखु न लेखु।।
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नीवां कर देखु।।
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु।।
गुनही भरिया मैं फिरा लोकु कहै दरवेसु।।
अहिंसा : 
फरीदा जो तै मारनि मुकीयां तिना न मारे घुंमि।।
आपनड़ै घरि जाइअै पैर तिना न चुंमि।।
सूफी मत मुताबक परमात्मा कहां बसता है?
फरीदा जंगलु जंगलु किआ भवहि वणि कंडा मोड़ेहि।।
वसी रबु हिआलीअै जंगलु किया ढूढेहि।।
बाबा फरीद जी के नाम के साथ ‘गोदड़ी’ की दंतकथा प्रसिद्ध है। जब वह मोकलहर (फरीदकोट) पहुंचे तो उन्होंने अपनी गोदड़ी उतार कर एक पेड़ पर लटका दी। पशु चराने वाले कुछ लड़कों ने इस गोदड़ी की खिद्दो बना कर खेलना शुरू कर दिया। जब बाबा फरीद जी वापस वहां लौटे तो गोदड़ी गायब थी। इसी याद में अब गुरुद्वारा गोदड़ी साहिब बना हुआ है। यहां प्रत्येक वर्ष 19 से 23 सितम्बर तक बाबा फरीद का आगमन पर्व व्यापक स्तर पर मनाया जाता है।

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