संस्कृति, सभ्यता और आस्था का प्रवाह होती है नदी

सुबह की पहली रोशनी जब नदी के बहते हुए पानी पर पड़ती है, तो वह सिर्फ चमकती हुई जलधारा नहीं लगती। कहीं दूर किनारे पर खड़ा कोई किसान, जब अपने खेती की ओर जाता दिखायी देता है, तो उस मंजिल की सपनीली आस होती है नदी। कहीं जब पौ फटते ही कोई मछुआरा अपनी नाव लेकर निकल पड़ता है, तो उसके और उसके परिवार की भूख का समाधान होती है नदी। कहीं महिलाएं नदी से पानी भरकर घर लाती हैं, कहीं घाट पर सुबह-सुबह पूजा की तैयारी शुरु हो जाती है। लब्बोलुआब यह है कि नदी केवल एक पानी की बहती हुई धारा नहीं है, इंसानी जीवन से इसके अनेक आत्मीय रिश्ते हैं। 
नदियां इंसान के जीवन का आधार हैं। भारत में नदियों ने शहर बसाये, खेती को सहारा दिया और व्यापार के नये-नये रास्ते खोले, लेकिन इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने भारतीय संस्कृति की स्मृतियों को आकार दिया। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसे नाम केवल बहती हुई जलधारा की नहीं है, ये नाम हमारी समूची पहचान, समूची संस्कृति और समूचे वजूद के नाम हैं। इनके साथ लोककथाएं, गीत, तीर्थ, मेले, त्योहार और पीढ़ियों की यादें जुड़ी हुई हैं। 
नदियों का किसानों और मछुआरों से रिश्ता
भारत की कृषि व्यवस्था का नदी से रिश्ता सबसे पुराना और सबसे व्यवहारिक है। नदी का पानी सीधे खेतों तक पहुंचे या उसके कारण भू-जल का स्तर बना रहे, दोनों ही स्थितियों में किसान नदी से जुड़ा रहता है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में जमा होने वाली उपजाऊ मिट्टी ने सदियों से हमारी कृषि व्यवस्था को सहारा दिया है। इसी तरह नदी किनारे रहने वाले मछुआरा समुदायों के लिए नदी किसी पर्यटन स्थल का नाम नहीं बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी है। नाव, जाल, मछली, बाज़ार और परिवार की आय सब कुछ नदी की स्थिति से जुड़ा है। जब नदी में पानी घटता है, प्रदूषण बढ़ता है या मछलियों का प्राकृतिक आवास बदलता है, तो सबसे पहले असर उन समुदायों पर पड़ता है, जिनकी आजीविका सीधे नदी पर निर्भर है। इसलिए नदी का संरक्षण केवल पानी साफ करना नहीं है बल्कि नदी से जुड़े समुदायों की आजीविका और परम्पराओं को बचाना है। ठीक उसी तरह जैसे नदी के सूखने का मतलब किसान की खेती का सूखना है। जब नदी का पानी सीधे खेतों तक पहुंचता है, तो फसलें तो बेहतर होती ही हैं, भू-जल का स्तर भी बेहतर बना रहता है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में जब बहकर आयी मिट्टी जमा हो जाती है, तो वह मिट्टी किसानों के लिए सोने के माफिक होती है, क्योंकि उस मिट्टी से फसलें बेहद उर्वर होती हैं लेकिन किसान हो या मछुआरा नदियों का अब उनसे रिश्ता बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित होती वर्षा, नदियों से अत्यधिक जल दोहन, लगातार बढ़ता प्रदूषण और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से होने वाली छेड़छाड़ न सिर्फ किसानों और मछुआरों के लिए कई तरह की चुनौतियां खड़ी करती हैं बल्कि इन समस्याओं के चलते नदियों की सेहत निरंतर बिगड़ती जा रही है। 
आस्था की धारा : भारतीय संस्कृति में खासतौर पर नदियों का हमारी आस्था से बेहद गहरा रिश्ता है। गंगा स्नान से लेकर नर्मदा परिक्रमा तक नदियां हमारे जीवन का आस्था चक्र निर्धारित करती हैं। नदियों के किनारे लगने वाले मेलों से लेकर घाटों पर होने वाले दैनिक सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा होते हैं। नदी यहां प्रकृति और मनुष्य के बीच भावनात्मक पुल बन जाती है। शायद यही कारण है कि नदी के सूखने या प्रदूषित होने का दुख केवल पर्यावरणीय आंकड़ा नहीं है, यह सांस्कृतिक पीड़ा भी है। इसलिए हमें अपनी आस्था को बरकरार रखने के लिए नदियों को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारियां उठानी चाहिए। नदी को सिर्फ मां कह देने से हमारा भावनात्मक दायित्व पूरा नहीं हो जाता। हमारी नदियों के प्रति संवेदनशीलता तब साबित होगी, जब हम उन्हें कचरे से बचाएं, उनमें प्लास्टिक या अनुपचारित गंदा पानी डालने से बचें, तभी नदियों के साथ हमारे इस भावनात्मक रिश्ते का औचित्य साबित होगा। 
नदी और लोक संस्कृति : नदी केवल किताबों में नहीं बहती और न सिर्फ जमीन में। वह लोकगीतों में भी बहती है, कहावतों में भी मचलती है, चित्रों और कविताओं में सरगम करती है। किसी गांव का गीत, नदी के पार बसे मायके की याद हो सकता है। किसी लोककथा में नदी जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा बन सकती है और किसी कविता में वह समय के बहने का प्रतीक हो जाती है यानी नदी समाज को सिर्फ पानी नहीं देती, भाषा, संवेदना और करुणा के प्रतीक भी देती है। आज जब नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बदल रहा है, तो यह केवल पारिस्थितिकी तंत्र नहीं बदला रहा, उनके साथ जुड़ी अनेक स्थानीय परंपराएं और जीवन पद्धतियां भी धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। 
नदियों को बचाना ही होगा : 28 सितम्बर विश्व नदी दिवस हमें नदी को केवल जल संसाधन मानने की सोच नहीं देता बल्कि हमें यह सोचने और समझने का अवसर देता है कि नदी एक जीवंत तंत्र है। अगर नदियां नहीं बचेगीं, तो इंसान भी नहीं बचेगा। नदियों में केवल पानी, मछलियां, वनस्पतियां, मिट्टी, मछुआरे ही नहीं धड़कते बल्कि अनगिनत पक्षियों, जलचरों की भी नदियां जीवनदाता होती हैं। जब एक नदी सूखती है या प्रदूषित होती है तो केवल उसका पानीभर नहीं मरता, उसके साथ समूचा जैविक तंत्र खत्म हो जाता है। इसलिए नदियों के बचाने का मतलब सिर्फ इनका प्रदूषण कम करना नहीं है, उनके प्राकृतिक प्रवाह को भी समझना होगा। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#संस्कृति
# सभ्यता और आस्था का प्रवाह होती है नदी