लोकतंत्र और अर्थतंत्र को बर्बाद कर रही ‘रेवड़ी संस्कृति’

जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियां अपने सिद्धांत और विचार त्याग कर जीत हासिल करने के लिए सभी प्रकार के जायज़-नाजायज़ हथकंडे अपनाना शुरू कर देती है। रेवड़ी संस्कृति लोकतंत्र और अर्थतंत्र को बर्बाद कर रही है। यह वही संस्कृति है, जिसे मुफ्तखोरी की राजनीति भी कहा जाता है। सच तो यह है रेवड़ी संस्कृति के कारण हमारे देश की अनेक राज्य सरकारें लगभग दीवालिया होने की कगार पर हैं। उनका बजट घाटा बढ़ता जा रहा है, लेकिन वे मुफ्तखोरी की सियासत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि चुनाव जो जीतना है। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश सहित सात राज्यों में विधान सभा के चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनाव आते ही मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियों और घोषणाओं का बिगुल बज जाता है। कहा जाता हैं चुनाव जीतने के लिए सब कुछ जायज़ है। इस कार्य में कोई भी राजनीतिक पार्टी पीछे नहीं रहती। इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश  से शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधान सभा चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की होड़ शुरू हो गई है। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ने ही आधी आबादी यानी महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए चुनावी सौगातों की बौछार कर दी है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव महिलाओं के लिए 40 हज़ार रुपये की आर्थिक मदद का ऐलान कर चुके हैं, जबकि भाजपा की योगी सरकार ने 25 लाख युवाओं को मुफ्त टैबलेट, एक लाख सरकारी नियुक्ति पत्र और 60 महिलाओं को रोडवेज़ बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा का बड़ा ऐलान किया है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में छह करोड़ से अधिक महिला मतदाता हैं। वर्ष 2022 में भाजपा की सरकार बनाए रखने में महिलाओं की भी अहम भूमिका मानी जाती है। ऐसे में तीसरी बार जीत के लिए भाजपा अपने संकल्प में महिलाओं को खाते में सीधा पैसा देने संबंधी योजना का वादा कर सकती है। चुनावों में महिलाओं का एक नया वोट बैंक ज़रूर उभरा है और मुफ्त की योजनाओं का चुनावी असर भी कई राज्यों में देखने को मिला है। मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना समेत कई योजनाओं के ज़रिए राजनीतिक दलों ने महिला मतदाताओं को साधने की कोशिश की है। और ये कोशिश सफल भी हुई है। चुनाव में युवाओं का जिन्हें आजकल जेन-ज़ी कहा जा रहा है, का वोट बैंक सबसे महत्वपूर्ण है। युवा चाहते हैं कि परीक्षाएं समय पर हों, पेपर लीक न हों, नतीजा समय पर आए और स्कूल-कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। छात्राओं को स्कूटी या लैपटॉप देने की घोषणा युवाओं की समस्याओं का पूरा समाधान नहीं है। युवाओं की वास्तविक मांग बेहतर शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और रोज़गार के अवसर  बिना भेदभाव प्रदान करना हैं
अभी तो रेवड़ियों (फ्री बीज) की यह शुरुआत है, पिक्चर अभी बाकी है। चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह के वायदे और प्रतिवायदे करती हैं। सरकार बनने के बाद चुनावी वायदे पूरा करने में पार्टियों के पसीने छुट जाते हैं। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तो चौपट तक हो जाती है जिसके कारण सम्बद्ध सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन आदि चुकाने के लाले पड़ जाते हैं। राजनीतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने का प्रकरण सियासी हलकों में गर्माने लगा है। देश की प्रबुद्ध जमात का मानना है कि इससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रकार की योजनाओं की आलोचना की थी। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान इस तरह के वायदे करने का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिक से अधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वायदे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीज़ें बांटने को लेकर होते हैं। यह देखा गया है कुछ सालों से देश की चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली-पानी, मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद राशि, सस्ते गैस सिलेंडर आदि आदि अनेक तरह की घोषणाओं का चलन बढ़ गया है। विशेषकर चुनाव आते ही मतदाताओं को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुफ्त का मिल जाये तो उसका खूब उपयोग होता है। ये सुविधाएं मुफ्त की नहीं है, अपितु जनता के खून-पसीने की कमाई है, जो राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा दी जा रही है ताकि चुनाव जीतने में आसानी हो सके। 

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