आधी रात को मिली आज़ादी की दास्तान

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तीसरी मुलाकात हिमालय जैसे उस अटल आदमी से थी जो कांग्रेस पार्टी का संचालन दृढ़ता और कठोरता से करता था। वल्लभ भाई पटेल की विचारधारा व्यवहारिक, इन्साफ पसंद और दूरदर्शी थी। वह किस हद तक कठोर और काम करने में पक्के आदमी थे, इसका एक सटीक उदाहरण है। उन दिनों वह फौजदारी वकील थे और जज के सामने किसी कत्ल के मामले में बहस कर रहे थे। अचानक उनको पत्र मिला कि उनकी पत्नी की मौत हो गई है। पत्र को उन्होंने उड़ती नज़र से पढ़ा और मरोड़ कर जेब में ऐसे रख लिया जैसे कुछ हुआ ही न हो। जब तक बहस खत्म न हो गई, वह बोलते रहे। इसका यह मतलब नहीं कि वल्लभ भाई को भावनाएं छूती नहीं थीं। अंदर से वह कम भावुक नहीं थे परन्तु भावनाओं के बड़े तूफान को दबाकर रखना भी उनको आता था।  वल्लभ भाई अहमदाबाद की उपज थे, जो एक औद्योगिक नगर है। पुतलीघरों, कारखानों और मशीनों के साथ लदा शहर जबकि जवाहर लाल नेहरू एक ऐसी जगह से आये जहां फलों की खेती होती है और फूल उगाए जाते हैं। पटेल नेहरू की नए समाज की रचना वाली बात को खोखला कहते थे। उनका मानना था कि पूंजीवादी समाज समर्थ और कार्यकुशल होता है। ज़रूरत कुल इतनी है कि पूंजीवादी सिद्धांतों का भारतीयकरण किया जाए।
इसी कड़ी के तहत चौथी और अंतिम मुलाकात। यह मुलाकात माउंटबेटन की अब तक की सभी मुलाकातों से अधिक यादगारी रही। जिन्नाह ने माउंटबेटन को जल्द बताना शुरू कर किया कि वह किन शर्तों को मानेंगे और किन को नहीं। इससे लगभग 25 साल बाद भी इस घटना को याद करते हुए माउंटबेटन के मुंह से अचानक यह शब्द निकले, भारत में मुझे कितना असंभव सा काम सौंपा गया था, इसका सही अनुमान तब तक नहीं था जब तक मोहम्मद अली जिन्नाह के साथ पहली मुलाकात न हुई। ...देश के बटवारे के कारण जिन्नाह इस हद तक तैयार थे कि मेरे कोई शब्द उनके कानों में शायद दाखिल ही नहीं हुए। हालांकि मैंने हर ऐसी चाल चली जो मैं चल सकता था। ऐसी हर अपील मैंने की जो मेरी कल्पना में आ सकती थी। पाकिस्तान को जन्म देने का सपना उनको घुन की तरह लग चुका था। कोई तर्क किसी काम न आया।
यदि गांधी, माउंटबेटन या जवाहर लाल नेहरू में से किसी को भी इस असाधारण रहस्य की जानकारी होती तो भारत के बटवारे को ज़रूर टाला जा सकता था। वह रहस्य एक फिल्म के टुकड़े की भूरी सतह पर अंकित था। फिल्म के उस ‘टुकड़े’ पर मानवीय फेफड़े की अंदरूनी हालत का एक्स-रे अंकित था। उससे साफ-साफ पता चलता था कि फेफड़ों का मालिक बुरी तरह नशाग्रस्त हो चुका है और ज्यादा से ज्यादा अब वह दो या तीन साल जियेगा। पाकिस्तान का पिता कहलाने जा रहे मोहम्मद अली जिन्नाह के दोनों फेफड़ों में पाक का घुण लग चुका था।
इसी मोहम्मद अली जिन्नाह ने पाकिस्तान को एक असंभव सपना कहकर 1933 में रहमत अली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। पाकिस्तान के निर्माण का प्रस्ताव कागज़ पर लिखकर पहली बार पेश करने वाला आदमी रहमत अली था। वह एक डिग्री य़ाफ्ता विद्यार्थी था और लंदन में रहता था। भारत के मुस्लिम राजनीतिज्ञों में जिन्नाह की स्थिति तब तक अच्छी हो चुकी थी। रहमत अली अपने प्रस्ताव की ब़ागडोर जिन्नाह को सौंप देना चाहता था परन्तु उसने साफ मना कर दिया। अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जिन्नाह ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारे लगाते हुए की थी। परन्तु मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने का काम आखिर जिन्नाह के हाथों से ही पूरा हुआ। देश को अखंड बनाए रखने के माउंटबेटन के सभी यत्न जिन्नाह रूपी चट्टान के साथ टकरा कर हमेशा के लिए टूट गए। जिन्नाह को थोड़ा-सा भी प्रभावित नहीं कर सकने का दु:खी अनुभव माउंटबेटन ज़िंदगी भर याद रखने वाले थे। इस संबंधी एटली सरकार के नाम माउंटबेटन ने जो अपनी निजी रिपोर्ट भेजी, उस में लिखा, यदि बटवारे का एक भी विकल्प ढूंढने की स्थिति होती तो दुनिया का कोई आदमी मुझे इस पागलपन को मानने के लिए बहका न सकता। एक दिन ज़रूर ऐसा आएगा जब खुद भारतीय अपने इस फैसले पर बुरी तरह पछताएंगे।
आगे चल कर यह व्याख्यान भी रोचक है कि किस तरह 14-15 अगस्त की आधी रात को भारत जैसे धार्मिक देश के संन्यासी साधुओं ने पीतांबर पहनाकर और माथे पर तिलक लगाकर एक नास्तिक आदमी के हाथों में अपनी बागडोर सौंप दी।
आज़ादी के जश्न के बाद ही भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सामने माउंटबेटन ने डिस्पैच बॉक्स में से निकाल कर रैडक्लिफ द्वारा खींची गई बटवारे की रेखा के नक्शे की तस्वीर रखी तो दोनों के रंग उड़ गए। दोनों नेता जब नक्शे का निरीक्षण करके मुड़े तो उनके चेहरे पर जो गुस्सा था, उसको देखते ही माउंटबेटन को विश्वास हो गया कि सिरल रैडक्लिफ ने अपने कार्य को पूरी निष्पक्षता से पूरा कर दिखाया है।
जो बटवारे की रेखा खींची जा सकी, वह तकनीकी दृष्टि से सही, परन्तु व्यवहारिक दृष्टि से सत्यानाशी थी। रैडक्लिफ उदास थे... बहुत उदास... परन्तु वह स्वयं को दोषी नहीं मान रहे थे। बटवारे की रेखा को यदि उन्होंने कोई और स्थान से खींचा होता तो भी परिणाम वही रहता। वही दंगे और खून खराबा और उन सब की ज़िम्मेदारी उसी प्रकार  रैडक्लिफ के ही कंधों पर आती। आधुनिक युग की सबसे मुश्किल बटवारे की रेखा शीघ्र खींच देने के कार्य का उनका मेहनताना जो 2000 पौंड तय हुआ था, उसको स्वीकार करने से  रैडक्लिफ ने साफ मना कर दिया। और इस प्रकार भारत को अखंड रखने की इन सब किरदारों की इच्छा के विपरीत भारत का बटवारा हो गया।
पश्चिम और पूर्वी पंजाब की धरती के लिए यह आज़ादी अकेले नहीं आई थी, अपने साथ एक विशेष रंग, (लाल रंग), लेकर आई थी। 15 अगस्त की ढलती दोपहर को लाल ईंट से बने हुए अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर चानी सिंह ने लाल झंडी दिखाकर नम्बर दस डाउन एक्सप्रैस का स्वागत किया। जब एक भी यात्री बाहर नहीं आया तो चानी सिंह अंदर जाकर देखता है कि ट्रेन अंदर से लाल सुर्ख होकर आई थी, बहुत-सी मानवीय लाशों के खून से...। अंतत: वह ट्रेन के पिछली तरफ बढ़ा, जहां बड़े-बड़े सफेद शब्दों में संदेश लिखा था, यह ट्रेन हम नेहरू और पटेल के नाम आज़ादी के उपहार के रूप में भेज रहे हैं। ...और अगले कई सप्ताह इस लाल रंग की होली से दोनों पंजाब की धरती लाल हो गई।
दूसरी तरफ माउंटबेटन का निवेदन स्वीकार करते हुए गांधी जी कलकत्ता जाकर शांति का संदेश देने के लिए सहमत हो गए। पंजाब के मैदानों में जहां हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे को जान से मार कर खुश हो रहे थे, वहीं विश्व के सबसे शैतान शहरों में से एक कलकत्ता में हिन्दू-मुसलमानों की वह भीड़ इसलिए खुश थी कि एक-दूसरे का धर्म भूलकर लोग गले मिल रहे थे, मिठाई बांट रहे थे, इत्र छिड़क रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे उस छोटे से आदमी की, जिसकी आध्यात्मिक मौजूदगी ने अचानक उस शहर में मानवता के दिये जला दिए थे। यहां केवल एक अकेले आदमी ने जो चमत्कार कर दिखाया था, उसका 100वां हिस्सा भी उन सैनिकों के लिए पंजाब में संभव नहीं हुआ था जो संख्या में 55,000 थे। जिन घटनाओं को रोकने के लिए ‘पंजाब बाउंडरी फोर्स’ की रचना हुई थी, वह रुकी तो नहीं थीं, बल्कि उन्होंने सेना को भी सुन्न कर दिया था।
गांधी जी एकमात्र राजनीतिक नेता थे जिन्होंने अंत तक देश के बटवारे का विरोध किया। परन्तु दूसरी तरफ नाथूराम गोडसे और उनके साथियों का मानना था कि भारत के बटवारे के कारण लाखों हिन्दुओं पर खतरनाक मुसीबतों का जो पहाड़ टूट पड़ा है, यह सब कांग्रेस के कारण हुआ है और कांग्रेस ने जो किया है, अपने नेता गांधी के इशारे पर किया है। उनके अनुसार गांधी के अहिंसावादी सिद्धांत कायरों के सिद्धांत थे और इनके कारण हिन्दुओं की परम्परागत बहादुरी का नाश होता जा रहा था। हिंसा द्वारा हिन्दुओं के पुनर्जागरण का पक्षपाती होने के बावजूद गोडसे से रक्त नहीं देखा जाता था। एक बार जब वह फोर्ड गाड़ी चला रहा था तो एक भीड़ ने उसको रोका ताकि बुरी तरह से घायल एक नौजवान को अस्पताल पहुंचाया जा सके। गोडसे ने कहा, नौजवान को पिछली सीट पर इस तरह बिठाओ कि मैं उसको देख न सकूं वरना मैं बेहोश हो जाऊंगा।
30 जनवरी, 1948 सायं की प्रार्थना सभा। आभा और मनु के कंधों पर हाथ रखकर गांधी जी अपनी अंतिम पद यात्रा पर चल पड़े, जो बिरला हाउस के उनके कमरे से शुरू होकर बगीचे तक सम्पन्न होने वाली थी। .... नाथूराम के दाएं हाथ में काला बेरेटा पिस्तौल चमक उठा। उसने तीन बार घोड़ा दबाया ....जो मनुष्य उसकी तरफ बढ़ता आ रहा था, उसकी छाती में तीन गोलियां दाखिल हो चुकी थीं। रक्त से लथपथ हुई धोती में गांधी जी की घड़ी उलझी हुई थी, जिस पर 5 बजकर 17 मिनट हुए थे।
15 नवम्बर 1949 को फांसी वाले दिन गोडसे अपनी अंतिम इच्छा में लिखता है कि उसकी राख कहीं भी प्रवाहित करने की बजाय कलश में रख कर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाती रहे और अंतत: उसको उस सिंधू नदी में प्रवाहित किया जा सके जो पूरी की पूरी पवित्र हो और अखंड हिन्दू राष्ट्र भारत में बह रही हो। (समाप्त)
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