हिमालय की झीलें दे रहीं प्रलय का संकेत

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़, मलबे के सैलाब और हिमस्खलन की घटना ने यह साबित कर दिया है कि हिमालय का पारिस्थितिक तंत्र कितना संवेदनशील और आपदा-संभावित है। भीषण बाढ़ और हिमस्खलन जैसी हालिया त्रासदियों ने पूरी दुनिया का ध्यान नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालय के भीषण खतरे की ओर खींच लिया है। इस त्रासदी में ग्लेशियर से जुड़े बड़े पैमाने पर हिम-पतन के बाद उमड़े प्रचंड जलप्रवाह ने नेपाल और तिब्बत के कई क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई और सैंकड़ों ज़िंदगियां लील ली। राहत एवं बचाव अभियान जारी रहने के बावजूद अस्थिर हिमनदीय झीलों और पहाड़ी ढलानों से नए खतरे की आशंका बनी हुई है। यह त्रासदी भारत के लिए भी गंभीर चेतावनी है क्योंकि हिमालय राजनीतिक सीमाओं से परे एक साझा पारिस्थितिक तंत्र है। वहां टूटता ग्लेशियर, फटती झील या खिसकता पहाड़ भारत के लिए भी बड़ा खतरा बन सकते है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार बढ़ रहा है। इन झीलों को यदि बर्फ, चट्टान या मलबे का प्राकृतिक बांध रोक रहा हो और वह बांध किसी भूकंपीय हलचल, हिमस्खलन, भारी वर्षा, चट्टान गिरने अथवा स्वयं झील में बढ़ते जल-दबाव के कारण टूट जाए तो अचानक अत्यधिक मात्रा में पानी नीचे की ओर दौड़ सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) कहा जाता है। 
1984 से 2023 तक के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए भारतीय हिमालय नदी बेसिनों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई, जिनमें 676 झीलें 1984 के बाद उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुई। इन 676 में 130 झीलें भारत में (65 सिंधु, 7 गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में) स्थित हैं और सबसे बड़ा खतरा यह है कि 601 झीलों यानी करीब 89 प्रतिशत का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका था। यह आंकड़ा केवल भूगोल में बदलाव की सूचना नहीं है, बल्कि हिमालय के तेज़ी से बदलते जलवायु तंत्र का संकेत है। इन 676 विस्तारित झीलों में 314 झीलें 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर और 296 झीलें 5,000 मीटर से ऊपर स्थित हैं। इनमें सर्वाधिक 307 झीलें हिमानी मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे हैं। ऐसे बांध अपनी प्रकृति से ही संवेदनशील होते हैं।
इसरो के अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाट ग्लेशियर झील इस बदलते खतरे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आती है। 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस झील का क्षेत्रफल 1989 में 36.49 हेक्टेयर था, जो 2022 में बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया अर्थात लगभग 178 प्रतिशत की वृद्धि। एनआरएससी के आकलन के अनुसार इसमें लगभग 35.08 मिलियन घन मीटर पानी हो सकता है। इतनी बड़ी जलराशि यदि प्राकृतिक अवरोध के टूटने से अचानक नीचे की ओर बढ़े तो चिनाब घाटी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि भारत सरकार ने खतरे को समझते हुए कदम भी उठाए हैं। 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने भारतीय हिमालय में लगभग 7,500 ग्लेशियर झीलों में से 189 को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया था, जिनके लिए 150 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय ग्लोफ  जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत तकनीकी आकलन, स्वचालित मौसम एवं जलस्तर निगरानी स्टेशन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली तथा जहां आवश्यक हो, वहां झील का जलस्तर कम करने जैसे उपायों की योजना बनाई गई। हालांकि खतरे का आकलन स्थिर नहीं रह सकता। जुलाई 2026 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार अब भारतीय हिमालयी नदी बेसिनों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,485 ग्लेशियर झीलों की रिमोट सेंसिंग के जरिए निगरानी कर रही है। 2025 में किए गए वैज्ञानिक आकलन में 189 उच्च-जोखिम झीलों में से 56 को ‘वेरी हाई रिस्क’ श्रेणी में रखा गया है।
हिमालय से खतरा केवल ‘ग्लोफ’ तक सीमित नहीं है। इसरो के भूस्खलन मानचित्र में 1998 से 2022 के बीच भारत में करीब 80,000 भूस्खलनों का भू-स्थानिक रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इनमें हिमालय के अनेक संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। भूस्खलन और ग्लेशियर झीलों का खतरा एक-दूसरे से अलग नहीं है। पहाड़ से गिरने वाली विशाल चट्टान या बर्फ झील में गिरकर अचानक लहर पैदा कर सकती है, प्राकृतिक बांध को कमज़ोर कर सकती है और देखते ही देखते झील का पानी विनाशकारी बाढ़ में बदल सकता है। इसलिए हिमालय में ग्लेशियरए झील, भूस्खलन, नदी और बस्तियों को अलग-अलग जोखिमों के रूप में देखना अब वैज्ञानिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। जलवायु परिवर्तन इस पूरे संकट को और जटिल बना रहा है। 2026 में प्रकाशित वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार हिमालय-कराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने और ग्लेशियर झीलों के विस्तार की प्रवृत्ति ग्लोफ के जोखिम को बढ़ा रही है। लद्दाख के लाटो बेसिन पर 2026 के एक अध्ययन में 1980 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र में लगभग 11.5 प्रतिशत कमी और संबंधित झील के क्षेत्रफल में करीब 66 प्रतिशत विस्तार दर्ज किया गया। अध्ययन ने वहां उच्च ग्लोफ  जोखिम की संभावना भी रेखांकित की है। यदि विज्ञानए उपग्रह तकनीकए स्थानीय ज्ञान और प्रशासनिक इच्छाशक्ति को एक साथ जो?ा गया तो हिमालय को आपदा का पर्याय बनने से रोका जा सकता है।      
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