डेरा प्रमुख की फरलो
डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को विगत दिवस एक बार फिर से मिली फरलो की व्यापक स्तर पर चर्चा हुई है। इसे अलग-अलग ढंग-तरीकों से समझा जा रहा है। चर्चा के साथ-साथ इसकी कई पक्षों से कड़ी आलोचना भी हुई है। डेरा प्रमुख को दो साध्वियों के साथ दुष्कर्म करने के मामले में 28 अगस्त, 2017 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा 20 वर्ष की सज़ा सुनाई गई थी। इसके साथ-साथ डेरा प्रमुख को दो और गम्भीर अपराधों के तहत दोनों मामलों में उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी। एक मामले में वर्ष 2019 को सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में और दूसरी 2021 को सिरसा डेरे के ही मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी।
चाहे अब उसे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा उक्त दोनों मामलों में बरी कर दिया गया है परन्तु छत्रपति की हत्या के मामले में उसके बेटे अंशुल छत्रपति ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की हुई है। डेरा प्रमुख के संबंध में विगत लम्बी अवधि से चल रही ऐसी प्रक्रियाओं संबंधी पहला सवाल कानून और न्याय के संबंध में यह उठता है कि क्या एक बड़े आपराधिक मामले में सज़ा काट रहे व्यक्ति को बार-बार पैरोल और फरलो पर रिहा करना भारतीय न्यायिक प्रणाली से संबंधित सरकार द्वारा किया जा रहा एक भद्दा मज़ाक नहीं है? या सरकार ने बार-बार ऐसा करके कानून के शासन को मज़ाक बनाकर तो नहीं रख दिया? उदाहरण के तौर पर डेरा प्रमुख को वर्ष 2017 में दुष्कर्म संबंधी 20 वर्ष कैद की सज़ा सुनाई गई थी, परन्तु अब तक उसे 17 बार जेल से पैरोल या फरलो दी गई है। हालात यह है कि डेरा प्रमुख महीने-डेढ़ महीने की फरलो के बाद जब जेल में जाता है तो तभी उसे पुन: पैरोल देने की तैयारी शुरू कर दी जाती है। नि:संदेह आज पंजाब और हरियाणा में ही नहीं, अपितु देश भर में डेरावाद का बोलबाला है। छोटे-बड़े हज़ारों ही डेरे अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। इनमें हज़ारों और लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन उपस्थित होते हैं। बड़े डेरों में तो लाखों की संख्या करोड़ों में बदल जाती है। नि:संदेह बने ऐसे दृश्य में पारम्परिक धर्मों की चमक भी मद्धम पड़ती दिखाई दे रही है। इन डेरों के बड़े प्रभाव के कारण ही प्रत्येक तरह के राजनीतिज्ञ इनका दम भरते दिखाई देते हैं। यदि सिर्फ पंजाब की ही बात करें तो हम दावे के साथ कह सकते हैं कि यहां की सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रत्येक स्तर के नेता लगातार इन डेरों के बाबाओं की हाज़िरी भरते दिखाई देते हैं।
हम इस बात से इन्कार नहीं करते कि राजनीतिक नेताओं की इन डेरों के प्रति अपनी आस्था भी हो सकती है, परन्तु प्रत्येक तरह के चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता इन स्थानों के अधिक चक्कर लगाते दिखाई देते हैं। सितमज़रीफी यह है कि किसी बाबा पर गम्भीर आरोप लगने के बावजूद अंध-विश्वास में घिरे श्रद्धालुओं की आस्था फिर भी उनके प्रति बनी रहती है। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख का प्रभाव आज भी लाखों ही श्रद्धालुओं में देखा जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां और सरकारें इस तथ्य से अनजान नहीं हैं। वे कुर्सी की प्राप्ति के लिए इनसे प्रत्येक तरह का लाभ प्राप्त करती रही हैं। आज भी इस संबंधित डेरे के बड़े प्रभाव को दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता। इसी कारण ही डेरा प्रमुख को न्यायिक नैतिक-मूल्यों को अनदेखा करके संबंधित सरकार की ओर से बार-बार पैरोल और फरलो दी जाती रही है। डेरा प्रमुख को दी जाती बार-बार पैरोल और फरलो के इस घटनाक्रम से सरकार की नज़र-ए-इनायत की बात स्पष्ट हो जाती है। पहली फरलो उसे 24 अक्तूबर, 2020 को बीमार मां को देखने के लिए एक दिन की दी गई थी। दूसरी, 21 मई, 2021 को भी मां को मिलने के लिए एक दिन की पैरोल दी गई थी। तीसरी बार डेरा प्रमुख को 7 फरवरी, 2022 को 21 दिन के लिए रिहा किया गया था। तब पंजाब विधानसभा चुनाव होने जा रहे थे। डेरा प्रमुख रोहतक (हरियाणा) की सोनारिया जेल में बंद है। चौथी 30 दिन की छुट्टी उसे 17 जून, 2022 को दी गई थी। उस समय हरियाणा में स्थानीय नगर परिषद् और नगरपालिका के चुनाव थे। उस समय 40 दिन की छुट्टी उसे 14 अक्तूबर को दी गई थी। जब आदमपुर (हरियाणा) में उप-चुनाव हो रहे थे। उसे 21 दिन की छुट्टी 20 नवम्बर, 2023 में उस समय दी गई थी जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। फिर 50 दिन की छुट्टी 19 जनवरी, 2024 को लोकसभा चुनाव के समय दी गई थी। इसी तरह 2 अक्तूबर, 2024 को 20 दिन की छुट्टी तब दी गई जब हरियाणा के विधानसभा चुनाव हो रहे थे।
अब 17वीं बार 21 दिन की दी गई छुट्टी को पंजाब में कुछ माह बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम संबंधी पंजाब में इसलिए भी कड़ी प्रतिक्रिया हुई है, क्योंकि गत लम्बी अवधि से जेल में बंद बंदी सिंहों की रिहाई का मामला पूरी तरह गर्माया हुआ है। यह इसलिए भी है कि ज्यादातर बंदी सिंह अपनी सज़ाएं पूरी कर चुके हैं, परन्तु इसके बावजूद वे पिछले 30-35 वर्ष से जेलों में बंद हैं। यहां तक कि दशकों से जेल में बंद भाई जगतार सिंह हवारा को अपनी बीमार माता से मिलने के लिए पैरोल देने से भी अब तक आनाकानी की जा रही है। सरकारों का यह रवैया जहां उनकी ओर से की किया जा रहा बड़ा अन्याय कहा जा सकता है, वहीं इससे बड़ी प्रतिक्रिया पैदा होना भी स्वाभाविक है, जिसे न्याय-संगत ही कहा जा सकता है। सज़ा काट रहे डेरा प्रमुख इस बार फिर जब तक जेल से बाहर रहेगा, तब तक उसके प्रति ऐसा बड़ा विवाद बना दिखाई देता रहेगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

