श्रम और कौशल विहीन शिक्षा पद्धति
शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोचने, करने और समाज के लिए उपयोगी बनने की क्षमता पैदा करना है। महात्मा गांधी की नई तालीम का मूल विचार इसी दिशा में था कि शिक्षा जीवन और श्रम से जुड़ी हो। आज जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है, तब यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारी शिक्षा युवाओं को केवल डिग्री दे रही है या उनके हाथों में ऐसा कौशल भी दे रही है जिससे वे सम्मानजनक रोज़गार प्राप्त कर सकें और स्वयं रोज़गार पैदा कर सकें। भारत में शिक्षा का विस्तार नि:संदेह हुआ है। गांव-गांव विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय पहुंचे हैं। उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है—डिग्री और रोज़गार के बीच बढ़ती दूरी। बड़ी संख्या में युवा स्नातक और स्नातकोत्तर होने के बाद भी रोज़गार के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी कतार में खड़े दिखाई देते हैं। शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश स्वयं एक पूर्णकालिक काम बन जाती है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था केवल बेरोज़गार पैदा करती है, क्योंकि शिक्षा ने देश को वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता, शिक्षक, प्रशासक, उद्यमी और असंख्य विशेषज्ञ भी दिए हैं। समस्या अधिक गहरी है। शिक्षा का बड़ा हिस्सा अभी भी ज्ञान, परीक्षा और प्रमाणपत्र के इर्द-गिर्द घूमता है जबकि आधुनिक अर्थव्यवस्था को ज्ञान के साथ कौशल, तकनीक, अनुभव और समस्या समाधान की क्षमता चाहिए।
आज किसी युवक के पास बीए, बीकॉम, बीएससी या एमए की डिग्री हो सकती है, लेकिन यदि उसके पास कंप्यूटर, डिजिटल तकनीक, मशीन संचालन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि-तकनीक, लेखांकन, डिजाइन, डेटा विश्लेषण, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण, मरम्मत, संचार अथवा किसी अन्य रोज़गारपरक क्षेत्र की व्यावहारिक दक्षता नहीं है तो उसकी डिग्री रोज़गार की गारंटी नहीं देती।
यही वह बिंदु है जहां शिक्षा व्यवस्था को अपने पुराने ढांचे पर पुनर्विचार करना होगा। डिग्री शिक्षा का अंत नहीं, रोज़गार और जीवन की क्षमता का आरंभ होनी चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने इसी समस्या को पहचानते हुए व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में लाने, विद्यालय स्तर से कौशल शिक्षा देने और उद्योग के साथ शिक्षा संस्थानों के संबंध मज़बूत करने की दिशा निर्धारित की है। नीति में 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा का अनुभव देने का लक्ष्य रखा गया था। आवश्यकता अब लक्ष्य निर्धारित करने से आगे बढ़कर उसकी प्रभावी ज़मीन तैयार करने की है।महात्मा गांधी शिक्षा को हाथ, दिमाग और हृदय तीनों के विकास से जोड़ते थे। उनकी बुनियादी शिक्षा में उत्पादनकारी कार्य और शिक्षा का संबंध महत्वपूर्ण था। इसका अर्थ यह था कि विद्यार्थी केवल किताब से नहीं, काम करते हुए भी सीखता है। आज इस विचार को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।
कक्षा छह या आठ से ही विद्यार्थियों को स्थानीय अर्थव्यवस्था और भविष्य के रोज़गार से परिचित कराया जा सकता है। कोई बच्चा कृषि-तकनीक सीखे, कोई सौर ऊर्जा, कोई इलेक्ट्रॉनिक्स, कोई ड्रोन संचालन, कोई कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, कोई बढ़ईगीरी, कोई खाद्य प्रसंस्करण, कोई स्वास्थ्य सहायता, कोई डिजिटल डिजाइन और कोई स्थानीय हस्तशिल्प। -मो. 90094-15415

