जारी हैं अकाली-भाजपा गठबंधन के संबंध में कयास

चुभन सहते हैं उन की पर उन्हें खुलने नहीं देते,
हमारे दरम्यां ऐसे भी कुछ गठजोड़ आते हैं।
—़गज़नफर 
यही हालत अकाली दल तथा भाजपा की है। वे चुभन तथा दर्द के बावजूद भीतर से गठबंधन के प्रयास में लगे हुए हैं। चाहे अकाली दल तथा भाजपा के राजनीतिक लक्ष्य तथा मुद्दे बिल्कुल अलग-अलग हैं। अकाली दल ‘सरबत दा भला’ संघवाद, पंजाब तथा सिखों का अलमबरदार होने के दमगजे मारता है और भाजपा ‘एक राष्ट्र-एक कानून’ की समर्थक है। वह अकाली दल की मांग के अनुसार बंदी सिंहों की रिहाई तो क्या, उन्हें पैरोल देने के लिए भी तैयार नहीं, अपितु भाजपा सरकार डेरा सिरसा प्रमुख को बार-बार पैरोल या फरलो देकर सिखों को कई बार तो चिढ़ाती ही प्रतीत होती है, परन्तु अकाली दल तथा भाजपा ही नहीं, सभी पार्टियां ही इस यत्न में हैं कि सत्ता कैसे बचाई जाए या कैसे हथियाई जाए। 
़खैर हमारी जानकारी के अनुसार अकाली दल-भाजपा गठबंधन की बातचीत चल रही है, चाहे भाजपा के संगठन महासचिव बी.एल. संतोष तथा उनके साथी कह रहे हैं कि हम 117 सीटों पर ही चुनाव लड़ेंगे। हमारी समझ के अनुसार यह बयान देना राजनीतिक समझदारी का काम है, क्योंकि जब तक समझौता सफल न हो जाए, यही स्टैंड लेना ठीक है। यदि समझौता सम्पन्न न हो, तो फिर राजनीतिक नुकसान नहीं होता या कम होता है। यदि यह प्रभाव दे दें कि समझौता हो गया है और बाद में न हो सके, तो वृत्तांत बुरी तरह खराब हो जाता है।  देखने वाली बात है कि समझौते के सबसे बड़े विरोधी गृह मंत्री अमित शाह को माना जाता है, परन्तु उन्होंने मोगा रैली के बाद इस संबंध में चुप्पी साध ली है और भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन  ने जून में कहा था कि ‘पार्टी (भाजपा) समझौते के पक्ष या विरोध में नहीं है।’ जो ‘सरगोशियां’ सुनाई दे रही हैं, उनके अनुसार भाजपा इस समय 52 सीटें मांग रही है। इनमें से 8-10 सीटें वह अकाली दल पुनर्सुरजीत के नेताओं के लिए मांग रही है। इस बात की सम्भावना भी बताई जा रही है कि अकाली दल पुनर्सुरजीत के उम्मीदवार चाहे भाजपा के खाते से टिकट लेंगे, परन्तु वे चुनाव चिन्ह अकाली दल बादल का ही लेंगे। पता चला है कि अकाली दल कुल 45 सीटें देने के पक्ष में है, जिनमें से भाजपा स्वयं 35 से 37 उम्मीदवार ही खड़े करे। 
पाठकों को शायद यह बात अस्वीकार्य लगे कि ‘आप’ भी चाहती है कि अकाली-भाजपा गठबंधन हो जाए। नि:संदेह मुख्यमंत्री अकाली-भाजपा गठबंधन पर तीखे व्यंग्य कस रहे हैं, परन्तु ‘आप’ में एक प्रभाव है, कि यदि अकाली-भाजपा इकट्ठे चुनाव लड़े तो ‘आप’ विरोधी शहरी हिन्दू वोट भाजपा की ओर रहेगी, नहीं तो वह भाजपा की हार को देखते हुए कांग्रेस की ओर खिसक सकती है। एक बड़े मंत्री ने निजी बाचतीत में कहा भी कि अकाली-भाजपा गठबंधन तो ‘आप’ के पक्ष में है। वैसे ‘आप’ प्रमुख अरविन्द केजरीवाल हिन्दू वोट लेने के लिए भाजपा से भी अधिक हिन्दुत्व का सहारा ले रहे हैं। इसीलिए उनके नेतृत्व में हिन्दू तीर्थ स्थलों की मुफ्त यात्रा, भगवान शिव के नाम  एक शाम तथा श्री राम जी बारे कार्यक्रम  करवाए जा रहे हैं, परन्तु वक्त बहुत बलवान है। यह वक्त ही बताएगा कि नतीजे क्या होंगे?
वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज,
वक्त की हर शैअ ़गुलाम, वक्त का हर शैअ पे राज।
—साहिर लुधियानवी
कम हो रही सिख आबादी संबंधी चिन्ता
हुस्न-ए-तनासब के बिना ज़िन्दगी की ़खैर नहीं,
हुस्न-ए-तनासब के बिना कौमें बिखर जाती हैं।
—लाल फिरोज़पुरी 
इस शे’अर का अर्थ है कि सही अनुपात, सही तालमेल, सही संतुलन तथा सही समानता की खूबसूरती के बिना ज़िन्दगी सही तरह नहीं चल सकती और इस तनासब की खूबसूरती न रहे तो कौमें भी बर्बाद हो जाती हैं। इस शे’अर का ज़िक्र इस लिए करना पड़ा क्योंकि सिखों में जन्म दर का तनासब खत्म हो गया है और कार्यकारी जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज बार-बार अपील कर रहे हैं कि प्रत्येक सिख परिवार कम से कम तीन बच्चे पैदा करे। 30 वर्ष तक युवा बच्चे विवाह अवश्य करवा लें। जब कोई धार्मिक नेता, विशेषकर किसी अल्पसंख्यक का धर्म नेता ऐसा बयान देता है तो उसे साम्प्रदायिक रंगत दे दी जाती है, परन्तु भारत के सबसे बड़े बहुसंख्यक की सबसे ताकतवर संस्था आर.एस.एस. के स्वर्गीय प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने तो नवम्बर 2005 में ही एक किताब ‘रिलीजस डेमोग्राफी ऑफ इंडिया’ के रिलीज़ होने के अवसर पर कहा था कि ‘तीन से कम नहीं, आप जितने अधिक (बच्चे पैदा) कर सकें, उतना अच्छा।’ मौजूदा सरसंघ चालक मोहन भागवत ने 2024 में नागपुर में कहा था कि जनसंख्या विज्ञान के अनुसार यदि टोटल फर्टीलिटी रेट (जन्म दर) 2.1 से कम हो तो समाज खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है। इस लिए (हिन्दू) महिलाओं को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिएं। लगभग यही विचार उन्होंने अगस्त 2025 में दिल्ली में तथा फरवरी 2026 में लखनऊ तथा मुम्बई में भी दोहराये। हालांकि हिन्दू समाज को कम होने का कोई खतरा नहीं है, क्योंकि विश्व स्तर पर हिन्दुओं की जन्म दर 2.3 है, जो धर्म की मौजूदा संख्या बनाए रखने की दर 2.1 से अधिक है। हां, भारत में हिन्दू परिवारों की जन्म दर 1.94 है। विश्व स्तर पर मुसलमानों की जन्म दर 3.1, ईसाइयों की 2.7 तथा यहूदियों की 2.3 है, परन्तु सिखों की विश्व स्तर पर जन्म दर (टी.एफ.आर.) सिर्फ 1.4 है, जो पंजाब में 1.6 है। कनाडा में तो शायद 1.2 है। यदि यह टी.एफ.आर. या जन्म दर 1.4 ही रही तो 28 वर्ष बाद विश्व भर में सिखों की आबादी अब से तीसरा हिस्सा कम हो जाएगी और 100 वर्ष बाद अब से 75 प्रतिशत कम होकर सिर्फ चौथा हिस्सा ही बचेगी। वैसे एक सरकारी अध्ययन के अनुसार अब पंजाब के स्कूली बच्चों में सिखों की संख्या 57-58 प्रतिशत से कम होकर 49 प्रतिशत अभिप्राय पंजाब में भी यह संख्या कम हो चुकी है। ये अनुमान सिर्फ जन्म दर कम होने के हैं, परन्तु यदि इससे धर्म परिवर्तन के आंकड़े भी जोड़ लिए जाएं तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। हां, प्रवास से धर्म की संख्या नहीं कम होती। यदि यहां कम हुई तो विदेश में बढ़ेगी। विश्व स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
विरोधियों की मुख्य आपत्तियों की बात
कुछ लोग कहते हैं कि संख्या नहीं, ‘गुणवत्ता’ महत्वपूर्ण है, परन्तु नोट करें कि यदि संख्या नहीं तो लोकतंत्र में आपकी कोई नहीं सुनता, गुणवत्ता की भी कोई कद्र नहीं होती। आज विश्व भर में राजनीतिक प्रतिबद्धता, स्रोतों का वितरण तथा सांस्कृतिक मौजूदगी संख्या पर ही निर्भर करती है। कुछ लोग कहते हैं कि 3 बच्चों का आज के युग में पालन-पोषण सम्भव नहीं। शायद वे किसी सीमा तक ठीक ही हों, परन्तु हमारे सामने है, कि जिन देशों की आबादी कम हुई या युवा आबादी घटी है, वे बड़े आर्थिक संकटों की ओर जा रहे हैं। बच्चे पैदा करने के लिए सुविधाएं दे रहे हैं। कुछ लोग इसे ‘रूढ़िवादी’ विचार कहते हैं, परन्तु क्या समय रहते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सचेत होना ज़रूरी नहीं? हमारे सामने है कि बहुसंख्या के दम पर भरत में प्रत्येक क्षेत्र में आर.एस.एस. का कब्ज़ा हो गया है। संख्या कम होना सिर्फ आंकड़े ही नहीं हैं, कौम की सामूहिक आवाज़ भी कमज़ोर पड़ती है। पंजाब में सिखों के बहुसंख्यक न रहना सिखों के लिए बड़ा आघात है। भारत में पारसी सबसे अमीर तथा पढ़े-लिखे लोग हैं, परन्तु क्या उनकी भारत की राजनीति में कोई भूमिका दिखाई देती है? पारसी 1941 में 1 लाख 14 हज़ार थे और 2011 में सिर्फ 57 हज़ार, नई जनगणना में उनकी संख्या 45 हज़ार से भी नीचे जाने की आशंका है। बौद्ध धर्म की भी यही हालत है। एक ईसाई सम्प्रदाय ‘शैकज़र्’ जन्म दर कम होने तथा विवाह न करवाने की प्रथा के कारण लगभग अलोप ही हो गया है। अत: जत्थेदार की अपील को एक धार्मिक नेता का कट्टरवाद समझ कर दृष्टिविगत करना ठीक नहीं। कहा जा सकता है कि सिखों ने अल्पसंख्यक होते हुए राज कायम किया था, परन्तु हालात तथा समय अलग था। फिर जन्म दर कम होना कोई बाहरी हमला नहीं है। यह तो भीतरी कमी है। यह वक्त सच्चाई को समझने का है, नहीं तो भावी पीढ़ियों को यह सवाल पूछना तथा सुलझाना पड़ेगा कि हमारे बुज़ुर्ग समय पर सम्भले क्यों नहीं?
ये जब्र भी देखा है ताऱीख की नज़रों ने,
लम्हों ने ़खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।
—मुजफ्फर रज़मी
सिख नेता स्थिति स्पष्ट करें
भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि वंदे मातरम् गीत के टुकड़े करना ऐतिहासिक गलती थी, हमने पूरा गीत गाने का फैसला लेकर इस गलती को ठीक किया है। वह इसे मुस्लिम तुष्टिकरण भी कहते हैं, परन्तु वह यह क्यों भूल गए हैं कि रबिन्द्र नाथ टैगोर की जिस कविता ‘भारत भाग्य विधाता’ में से राष्ट्र गान ‘जन गण मन’ लिया गया है, उसके भी कुल 5 अंतरे हैं और सिर्फ एक अंतरा ही राष्ट्र गान के रूप में अपनाया गया है। हालांकि शेष 4 अंतरों में भी साम्प्रदायिकता वाली कोई बात नहीं है। ़खैर देश के दो अल्पसंख्यक मुसलमानों और ईसाइयों ने तो शेष 4 अंतरे पढ़ने पर अपनी आपत्तियां व्यक्त की दी हैं, परन्तु सिखों ने अभी सामूहिक रूप में इस संबंध में कोई फैसला नहीं किया। जत्थेदार अकाल तख्त साहिब तथा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को अपनी परम्पराओं, धर्म की समझ तथा राजनीति के बारे में गम्भीर विचार-विमर्श करके इस संबंध में एक स्पष्ट निर्णय अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इससे ही सारी कौम इसे अपनाने या न अपनाने बारे एक ही तरह का रवैया अपना सकेगी।
निशान-ए-हिटलरी-ओ-कैसरी नहीं मिलता,
जो इबरतों ने निखी हैं, इबारतें मत पूछ। 
—अली सरदार ज़ाफरी
(इबरतें = डल, सबक देने वाली स्थितियां, इबारतें = लिखित)


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