नेपाल का प्राकृतिक प्रकोप

पड़ोसी हिमालय देश नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने भयानक तबाही मचाई है। इससे सैकड़ों लोगों के मारे जाने तथा भारी संख्या में लापता होने के समाचार आए हैं। यह प्राकृतिक त्रासदी  सिर्फ नेपाल की नहीं हैं, अपितु भारत के साथ विश्व के उन देशों की भी है, जिनके नागरिक अचानक इस बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। एक अनुमान के अनुसार कम से कम 30 देशों के पर्यटक नेपाल की यात्रा पर आए हुए थे। भारत के विभिन्न राज्यों से दर्जनों व्यक्ति कैलाश-मानसरोवर की यात्रा पर गए हुए थे। नेपाल के पर्यटन विभाग के  अनुसार 1500 से अधिक लोगों के लापता होने का समाचार है। तिब्बत से सटे नेपाल के कई ज़िलों में भारी तबाही हुई है। इसमें कई पन-बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ घर, सड़कें तथा बाज़ार तक बह गए हैं। नेपाल पुलिस ने ये पंक्तियां लिखे जाने तक 547 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है। दूसरी ओर चीन ने अपनी तरफ तिब्बत में 5 लोगों के मारे जाने तथा 558 लोगों के लापता होने की जानकारी दी है। नेपाल में लापता हुए 500 विदेशी लोगों में से 320 भारतीय बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश जारी है। 
भारत ने तुरंत कार्रवाई करते हुए एक सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान के ज़रिये राहत सामग्री की पहली खेप भी भेज दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाली प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बात करके जल्द से जल्द हर सम्भव सहायता भेजने का आश्वासन दिया है। नेपाल की सीमा से सटे बिहार तथा उत्तर प्रदेश में अभी इस बाढ़ का नुकसान नहीं देखा गया, परन्तु इसने भारत की चिन्ता में वृद्धि अवश्य कर दी है। इस तबाही का अनुमान तो ग्लेशियर के कमज़ोर पड़ जाने से एकाएक पानी तथा चट्टानों के टूटने से हुआ है। नेपाल में पहले भी ऐसे प्राकृतिक हादसे घटित होते रहे हैं, परन्तु इससे पहले वहां इतनी भारी तबाही का मंजर नहीं देखा गया। इसका बड़ा कारण धरती की तपिश से भी जोड़ा जा रहा है। नेपाल में पिछले दशकों में लगातार ग्लेशियरों के पिघलने के समाचार आते रहे हैं। विश्व भर में विगत लम्बे समय से पर्यावरण वैज्ञानिकों में ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तपिश) की बात चलती रही है। इसका बड़ा कारण ग्रीन हाऊस गैसों का लगातार फैलना भी कहा जा सकता है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हर सूरत में इन गैसों को सीमित करने की योजनाएं बनाई जाती रही हैं। पहाड़ों में आती ऐसी आपदाओं को आधुनिक जीवन की बेतरतीबी से भी जोड़ा जाता है। लगातार निर्माण, सड़कों, घरों और बाज़ारों के निर्माण की बेतरतीबी भी पहाड़ों के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। पहाड़ों में हर तरह के निर्माण की भी एक सीमा होनी ज़रूरी है। जंगलों की लगातार कटाई भी बाढ़ का कारण बनती है। बड़ी संख्या में पर्यटकों को सुविधाएं देने के लिए बनाई जा रही योजनाओं की बहुतायत अक्सर प्राकृतिक आपदा का रूप धारण कर लेती है। आज तकनीकी युग में सैटेलाइटों द्वारा लगातार ग्लेशियरों की निगरानी बेहद ज़रूरी है, जिससे आने वाली प्राकृतिक आपदा का पता लगाया जाना संभव हो सकता है। ऐसी तकनीकों से बड़ी संख्या में मानवीय जीवन बचाने में सहायता मिल सकती है। यह भयानक बाढ़ एक ऐसी चेतावनी है, जो पहाड़ों में हो रहे हर प्रकार के निर्माण के प्रति सचेत योजनाबंदी की ज़रूरत की ओर इशारा करती है। विशाल हिमालय की शरण में बैठे एशिया के इस बड़े क्षेत्र पर बढ़ रहे पर्यावरण असंतुलन के पड़ने वाले प्रभाव को लेकर और भी सचेत होकर सोचने की ज़रूरत होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#नेपाल का प्राकृतिक प्रकोप