उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सुंदर झरने

कुछ दिन पहले मैं वाराणसी में था, अपने किसी काम की वजह से। तभी मुझे एक दोस्त ने बताया कि मिज़र्ापुर ज़िले के दो वाटरफाल्स यानी झरनों को एक बार फिर पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। दोनों झरने लखनिया दरी और सिद्धनाथ की दरी हैं, तो उत्तर प्रदेश के मिज़र्ापुर ज़िले में, लेकिन वाराणसी की सीमा पर स्थित हैं। मैंने सोचा कि पास में हैं तो क्यों न इनकी सैर कर ली जाये। यह इच्छा इसलिए भी प्रबल हुई क्योंकि मैंने पहले इन झरनों के दीदार नहीं किये थे। मैं एक और पर्यटन स्थल को अपनी डायरी में जोड़ना चाहता था। 
मिज़र्ापुर के ये दोनों वाटरफॉल्स खासे विख्यात हैं और इनके बारे में मैं पहले भी सुन चुका था, लेकिन कभी जाने का इत्तेफाक नहीं हुआ था, बावजूद इसके कि वाराणसी अनेक बार जाने का अवसर मिला और मिज़र्ापुर से बहुत बार गुज़रा। फिर सुनने में यह आया कि सुरक्षा कारणों को मद्देनज़र रखते हुए इन दोनों झरनों को पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है। दरअसल, लखनिया दरी में स्थित चुना दरी बहुत खतरनाक है। चुना दरी में डूबने से अनेक पर्यटकों की मौत हो गई थी। सत्तेशगढ़ में स्थित सिद्धनाथ की दरी को भी सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया था। यह झरने लगभग 4 माह तक पर्यटकों के लिए बंद कर दिये गये थे। इस बीच सुरक्षा के इंतज़ाम कड़े किये गये और अब स्थानीय प्रशासन को विश्वास है कि सुरक्षा व्यवस्था मज़बूत है, कहीं कोई चूक की गुंजाइश नहीं है, इसलिए झरनों को फिर से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है।
मानसून की खुशनुमा सुबह को जब मैं लखनिया दरी पहुंचा तो लगभग 100 फीट की ऊंचाई से गिरते पानी की कल कल को सुनते और पहाड़ियों पर हरियाली का खूबसूरत नज़ारा देखते ही मुझे इस प्रश्न का जवाब मिल गया कि यह वाटरफॉल विश्व प्रसिद्ध क्यों है और प्रकृति प्रेमी व पर्यटक यहां दूरदराज़ से क्यों आते हैं। हालांकि मैं बहुत सवेरे ही इस झरने पर पहुंच गया था, लेकिन मुझे देखकर यह आश्चर्य हुआ कि वहां पहले से ही काफी पर्यटक मौजूद थे। मुझे लगा कि ज्यादातर लोग मिज़र्ापुर व वाराणसी से ही अपने-अपने परिवारों के साथ पिकनिक मनाये आये होंगे, क्योंकि उस दिन छुट्टी का भी दिन था, लेकिन वहां विदेशी भी बड़ी तादाद में थे और खूबसूरत वादियों के बीच जल क्रीड़ा का आनंद लेने में लगे हुए थे। स्थानीय पर्यटक बाटी-चोखा बनाते हुए पिकनिक का आनंद ले रहे थे। पहाड़ियों से घिरा यह झरना इतना सुंदर है कि मुझे लगा अगर कहीं जन्नत होगी तो ऐसी ही होगी। 
कुछ घंटे लखनिया दरी में बिताने के बाद मैं स्तेशगढ़ गया, जहां सिद्धनाथ की दरी है। इस वाटरफॉल पर भी देश-विदेश के पर्यटकों का अच्छा खासा जमावड़ा था। सिद्धनाथ की दरी का नज़ारा भी किसी जन्नत से कम न था। यहां पर दूर से पानी आता है और पहाड़ों से टकराते हुए तकरीबन 100 फीट नीचे गिर जाता है। गिरते हुए पानी की आवाज़ मंत्रमुग्ध करती है। पानी की यह गूंज सुनकर मेरा इस जगह को छोड़ने का मन ही नहीं किया। फॉल का दीदार अपने आपमें एक हमेशा याद करने वाला अनुभव रहा। अपनी इस यात्रा से मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और रमणीक स्थल पर पिकनिक मनाना चाहते हैं तो अपनी बकट लिस्ट में मिज़र्ापुर के इन दो वाटरफॉल्स को अवश्य शामिल करें। 
बहरहाल, मैंने अपनी यात्राओं के दौरान बहुत से झरने देखे हैं, जिनमें से कुछ की याद मिज़र्ापुर के झरनों का आनंद लेते हुए खुद ही ताज़ा हो गई। मसलन, कर्नाटक में अगुम्बे पश्चिमी घाटों में है और इसे अक्सर ‘दक्षिण भारत का चेरापूंजी’ कहते हैं और यह अकारण नहीं है। इसकी धुंध से ढकी पहाड़ियां और हरे भरे वर्षा वन एक अलग ही दिलकश नज़ारा पेश करते हैं। यहां डूबते हुए सूरज को देखने का मंज़र हमेशा के लिए यादों में बस जाता है। इसकी जैव-विविधता ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों के लिए तो जन्नत है। मैं जब वहां था, तो खूबसूरत जंगल के बीच से ड्राइव करते हुए बरकाना झरने को देखने गया था, जोकि भारत के सबसे ऊंचे झरनों में से एक है और फिर मैं अगुम्बे रेनफारेस्ट रिसर्च स्टेशन पर भी रुका था। मानसून के बाद वाले दिन अगुम्बे की वास्तविक सुंदरता को निखार देते हैं, आसमान साफ होता है और लैंडस्केप पन्ना जैसा हरा हो जाता है।
केरल का सबसे बड़ा झरना अथिरापिल्ली में है, जिसे अक्सर ‘दक्षिण भारत का नियाग्रा फॉल्स’ भी कहा जाता है। चलाकुडी नदी तेज़ी से 80 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती है। घने जंगलों से घिरी यह जगह मानसून के बाद जीवंत हो जाती है। सुंदर अथिरापिल्ली का आनंद लेने के अतिरिक्त आप पास के वजहाचल झरने पर भी जा सकते हैं। प्राकृतिक नज़ारों को देखते हुए चहलकदमी कर सकते हैं, पक्षियों को देखने के लिए जा सकते हैं या थुमबूरमुज्ही बांध व उसके तितली पार्क को भी देख सकते हैं। यह जगह शांतिपूर्ण होने के बावजूद नाटकीय है, जिससे यह केरल की सबसे सुंदर जगह बन जाती है, लेकिन इसे कम ही महत्व दिया जाता है। क्यों? मालूम नहीं।
तमिलनाडु में सलेम के निकट शेवरॉय पहाड़ियों में येरकौड़ एक शांत हिल स्टेशन है, जो अपने कॉफी प्लांटेशन, ठंडे वातावरण व स्वच्छ झील के लिए विख्यात है। येरकौड़ झील में नौका विहार करने के अतिरिक्त कुछ व्यूपॉइंट्स पर जाया जा सकता है, जैसे सुंदर वादी को देखने के लिए पगोडा पॉइंट और किल्युर झरने तक ट्रेक किया जा सकता है। ऊटी या कोडईकनाल जितना कमर्शियल तो नहीं है, लेकिन येरकौड़ हरियाली से घिरी शांति ऑफर करता है। यह एक ऐसी जगह है जहां समय धीमी रफ्तार से चलता हुआ प्रतीत होता है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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