अनंत नाग दादा साहिब फाल्के अवार्ड से सम्मानित

अभिनय के संदर्भ में अपने नज़रिये को व्यक्त करते हुए अनंत नाग ने एक बार ज़ोर देकर कहा था, ‘मैं इसे एक्टिंग नहीं बीहेविंग (व्यवहार) कहना पसंद करूंगा।’ अनंत नाग ने अपनी अभिनय कला किसी फिल्म स्कूल में नहीं बल्कि मुंबई के स्टेज पर विकसित की, ‘बीहेवियरल एक्टिंग’ पर निर्भर रहते हुए। इसलिए वह बहुत आसानी से दोनों समानांतर व कमर्शियल सिनेमा में सफल हो सके और सोशल ड्रामा, रोमांस, कॉमेडी, हॉरर आदि सभी विधाओं में अपनी कला का लोहा मनवा सके। पांच दशक से अधिक भारतीय सिनेमा में अपने इस उल्लेखनीय योगदान के लिए गुजरात में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के दौरान अनंत नाग को 22 सितम्बर 2026 को वर्ष 2024 के दादा साहिब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया। ज्ञात रहे कि पिछले साल उन्हें पदम् भूषण से सम्मानित किया गया था।
डॉ. राजकुमार के बाद फाल्के पुरस्कार पाने वाले अनंत नाग दूसरे कन्नड़ अभिनेता हैं। अनंत नागरकट्टे के रूप में अनंत नाग का जन्म तटीय कर्नाटक के उत्तरा कन्नड़ ज़िले में 1948 में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन धार्मिक मठ व आश्रम में गुज़ारा, जहां उनके पैरेंट्स काम किया करते थे। किशोरावस्था के आरंभ में जब वह स्कूली शिक्षा के लिए मुंबई आये तो यह उनके लिए कल्चरल शॉक था, लेकिन 1960 व 1970 के दशकों में मुंबई के ज्वलंत थिएटर दुनिया में उन्हें अपने पैर ज़माने का अवसर मिल गया और वह कोंकणी, कन्नड़ व हिंदी नाटकों में काम करने लगे। थिएटर से सिनेमा की ओर अनंत नाग ने 1973 में रुख किया, जब पीवी नंजाराजे की फिल्म ‘संकल्प’ में उन्हें एक तर्कवादी की भूमिका मिली जो धार्मिक आस्था पर सवाल उठाता है। इसके एक साल बाद उनका परिचय श्याम बेनेगल से हुआ, जिनके साथ उन्होंने छह फिल्में कीं, जो 1970 व 1980 के दशकों में आयीं भारतीय सिनेमा की नई लहर में मील का पत्थर साबित हुईं। ‘अंकुर’ में वह एक ज़मींदार के पुत्र की भूमिका में थे। इसके बाद ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘कोंडुरा’ व ‘कलयुग’ में वह अलग-अलग भूमिकाओं में थे, ग्रे शेड्स के साथ।
अनंत नाग ने हमेशा कहा है कि उन्होंने कमर्शियल सिनेमा की तरफ रुख इस एहसास के साथ किया कि समानांतर सिनेमा में फुल-टाइम करियर बनाना कठिन था। ‘बयालू दारी’ (1977) उनकी पहली कमर्शियल फिल्म थी जो हिट हुई। इसमें वह रोमांटिक लीड में थे। इसके बाद ‘चंदनदा गोम्बे’, ‘बेन्किया बाले’, ‘ना निन्ना बिदलारे’ आदि फिल्में आयीं। पॉपुलर उपन्यासों पर आधारित इनमें से अधिकतर फिल्मों में वह कमज़ोर मध्यवर्गीय व्यक्ति की भूमिका में थे और लक्ष्मी के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी विशेषरूप से हिट थी। दिलचस्प बात यह है कि सुपरस्टार्स राजकुमार, विष्णुवर्धन और अम्बरीष के युग में भी पॉपुलर थे, जिनके अपने-अपने फैन क्लब थे, जो अक्सर एक-दूसरे से मुकाबला करते थे। हालांकि अनंत नाग के चाहने वालों की भी कमी नहीं रही, लेकिन उन्होंने अपने आपको इस भेड़चाल से हमेशा दूर रखा, विशेषकर इसलिए कि वह कभी ‘एक्शन हीरो’ नहीं थे और इसलिए भी कि वह किसी एक इमेज में बंधना या टाइपकास्ट नहीं होना चाहते थे। 
अनंत नाग के अभिनय करियर का सबसे महत्वपूर्ण दौर वह था जब उन्होंने अपने छोटे भाई शंकर नाग के साथ मिलकर फिल्में बनायीं। शंकर कन्नड़ फिल्म व थिएटर के स्वतंत्रचेता प्रतिभा थे, एक दुर्घटना में 1990 में उनका निधन हो गया था। दोनों भाइयों ने मिलकर ‘एक्सीडेंट’, मिनचिना ओटा’ और ‘नोडी स्वामी नविरोड़े’ जैसी फिल्में बनायीं, जिनका कन्नड़ सिनेमा में विशिष्ट स्थान है। टेलीविज़न के शुरुआती दौर में दोनों भाइयों ने आरके नारायण के कार्य पर आधारित ‘मालगुड़ी डेज’ सीरियल बनाया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली। अनंत नाग ने अपने संस्मरण ‘नन्ना थम्मा शंकरा’ में अपने भाई के साथ सहयोग व संग का मार्मिक चित्रण किया है। अनंत नाग के पास 1990 के दशक के आखिर में कोई खास काम नहीं था, लेकिन 2000 के दशक में भी उन्होंने एक्टिंग जारी रखी और अधिकतर सहायक भूमिकाएं ही निभाते रहे। फिर उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता मुख्य भूमिकाएं दोबारा मिलने लगीं, जैसे ‘गोधी बन्ना सधारना मैकट्टू’ में एक अल्झाइमर रोगी के रूप में उनकी अदाकारी शानदार रही और ‘कवलु दारी’ में वह एक रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर बने थे।
अनंत नाग उन चंद कन्नड़ एक्टर्स में शामिल हैं, जो सियासी क्षेत्र में भी सफल रहे। वह 1970 के दशक के जेपी आंदोलन से प्रभावित थे और उन्हें दिवंगत मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने मुख्य धारा की राजनीति में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उन्हें 1988 में कर्नाटक विधान परिषद में नामांकित किया गया और बाद में वह विधायक भी चुने गये। वह 1996 में जेएच पटेल की सरकार में बेंग्लुरु विकास मंत्री भी थे। जब सिनेमा पर पूरी तरह से फोकस करना उनके लिए कठिन हो गया तो उन्होंने अपनी मज़र्ी से सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया। बहरहाल, अपने राजनीतिक विचार साझा करने में वह कभी पीछे नहीं हटे हैं। वह पिछले कुछ वर्षों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेबाक समर्थक हैं और अनेक अवसरों पर उन्होंने हिंदुत्व राजनीति का खुलकर समर्थन किया है, जिससे कर्नाटक के उदारवादियों ने उनकी जमकर आलोचना की है। जब अनंत नाग से मालूम किया गया कि फाल्के अवार्ड मिलने पर उन्हें कैसा महसूस हुआ तो उनका जवाब था, ‘एक्स पर प्रधानमंत्री से मुबारकबाद का संदेश मिलने पर ऐसा महसूस हुआ जैसे दो फाल्के अवार्ड मिल गये हों।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#अनंत नाग दादा साहिब फाल्के अवार्ड से सम्मानित