पुलों का प्रकृति प्रेम समझिए साहब !

सृष्टि की जब से रचना हुई है तब से इसमें निर्माण और विध्वंस दोनों साथ-साथ चलते रहते हैं। किसी एक का भी रुकना प्रकृति के नियम विपरीत है। हम भले ही दुनिया भर के नियमों की अवहेलना करें या करते रहे लेकिन प्रकृति के नियमों का अवहेलना नहीं किया जा सकता है। आखिर हम प्रकृति से परे जा भी तो नहीं सकते हैं। और जिन्होंने प्रकृति से परे जाने की कोशिश की प्रकृति उनका नामोंनिशान मिटा देती है। ऐसा सिर्फ धरती की राजनीति में नहीं होता है। प्रकृति की नीति में भी यही होता है। इसीलिए इसे झक मार कर मानना ही पड़ता है।
मनुष्य पैदा होता है फिर एक दिन मर जाता है। फिर वह पैदा होता है और फिर मर जाता है। मनुष्य का पैदा होना निर्माण है। और उसके शरीर का मिट जाना विध्वंस है। विध्वंस से ही निर्माण के रास्ते का जन्म होता है। और निर्माण से विध्वंस का जन्म होता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यही सृष्टि का नियम है और यही शाश्वत सत्य है। निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे लगातार चलती रहनी चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है जब उसके लिए जगह खाली हो। और वह खाली जगह बनती है विध्वंस से। मनुष्य विध्वंस को बहुत ही कुदृष्टि से देखता है। जबकि उसमें ऐसा बुरा कुछ भी नहीं है। बस देखने वालों की अपनी अपनी दृष्टि है। और दृष्टि का क्या है। जिसके पास जैसी नज़र होता है वैसा नजरिया होता है। अगर किसी को विध्वंस गलत लगता है तो उसे निर्माण भी गलत लगना चाहिए। लेकिन इस दुनिया में हर व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार अपनी परिभाषा गढ़ता है।
लोग की बात करे तो वह अंधा धुंध निर्माण तो चाहता है। लेकिन विध्वंस होते ही उसे तकलीफ होने लगता है। वह यह नहीं सोच पाता है कि यदि सिर्फ निर्माण ही होता रहे। और यदि पुख्ता निर्माण होता रहे। तो फिर सृष्टि का संचालन रुक जाएगा। क्योंकि कभी ना कभी ऐसा दिन आ जाएगा कि जब निर्माण करने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। तो जो पुल बनने के बाद तुरंत गिर जाते हैं। वह बेहद प्रकृति प्रेमी होते हैं उनके प्रकृति प्रेम को समझने की जरुरत है।
उदाहरण के लिए आप यह मान लीजिए कि यदि किसी मनुष्य का जन्म होता है और उसकी मृत्यु ही ना हो। मान लीजिए कि वह अमर हो जाए। और ऐसा बहुत सालों तक चलता रहे। तो फिर क्या इस धरती पर कहीं पर रहने के लिए जगह बचेगा? कोई मरता है तो कोई पैदा होता है। मरने वाला जगह खाली करता है। पैदा होने वाला उस जगह को भरता है। इसी तरह तो यह सृष्टि चलती है।इस मामले में अपने देश के पुल निर्माता सृष्टि के नियम को पूरी तरह फॉलो करते हैं। वह जानते हैं कि सिर्फ निर्माण करना काफी नहीं है। बल्कि विध्वंस के लिए भी गुंजाइश बचा के रखना हैं। वरना नए निर्माण की संभावना समाप्त हो जाएगी। जैसे वह किसी ओवर ब्रिज या पुल का निर्माण करते हैं। तो वह चाहते तो उसे अंग्रेजों के जमाने के कोलकाता के हावड़ा ब्रिज की तरह निर्माण कर सकते हैं। लेकिन वह सृष्टि के नियम को नहीं तोड़ना चाहते। वह चाहते हैं कि एक तरफ निर्माण भी  चलता रहे। और दूसरी तरफ विध्वंस भी होता रहे। ताकि निर्माण की गुंजाइश बनी रहे। वह उतना ही उसे मजबूत बनाते हैं कि बनने के बाद कुछ समय बाद ही निर्माण की गुंजाइश बन सके। 
लेकिन जैसे प्रकृति किसी भी कार्य का दोष अपने ऊपर नहीं लेती है। वह जीवों के ऊपर ही डाल देती है। वैसे ही पुल निर्माता भी कोई दोष अपने ऊपर नहीं लेना चाहते हैं। इसलिए वह कभी बारिश तो कभी बाढ़ के ऊपर यह काम छोड़ देते हैं। और बारिश और बाढ़ तो बस एक बहाना है। पुल बहने, टुटने का मुकम्मल इंतजाम पुल निर्माता ही करते हैं। बस वह अपनी महानता के कारण इसका श्रेय नहीं लेना चाहते।
पुल निर्माता, पुख्ता निर्माण होने से प्रकृति के कामों में खलल पड़ेगी यह बात समझते हैं। इसलिए वह विध्वंस होने पर ज्यादा परेशान नहीं होते हैं बल्कि नए के निर्माण की संभावना पर प्रसन्न होते हैं। इसीलिए आप भी प्रश्न रहिए जनाब।

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