स्मृतियों के संगीत में आज भी मौजूद हैं लता मंगेशकर

भारतीय सिनेमा और संगीताकाश का वह जादुई स्वर, जिसके बिना इस राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृतियां, भावनाएं और कला का इतिहास अधूरा-सा प्रतीत होता है, वह और कोई नहीं, स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर हैं। 28 सितम्बर 1929 को इंदौर की पावन वसुंधरा पर जन्मी इस विलक्षण प्रतिभा की जीवन-यात्रा केवल एक महान गायिका के शिखर तक पहुंचने की कहानी नहीं, संघर्ष, साधना, अनुशासन और अदम्य संकल्प से निर्मित उस अमर सुर-गाथा का नाम है, जिसने भारतीय सुगम संगीत को नई ऊंचाइयां प्रदान की। पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से प्राप्त संगीत-संस्कारों ने उनके भीतर सुरों की वह चेतना जगाई, जो आगे चलकर करोड़ों हृदयों की धड़कन बन गई। कठिन परिस्थितियों, आरंभिक अस्वीकृतियों और अथक रियाज से गुजरते हुए लता ने अपनी आवाज को ऐसी विशिष्ट पहचान दी, जिसमें माधुर्य के साथ भावनाओं की गहनता भी थी। उनके स्वर ने प्रेम, विरह, भक्ति, करुणा और राष्ट्रप्रेम को ऐसी अभिव्यक्ति दी, जो पीढ़ियों की सामूहिक स्मृति में आज भी जीवित है।
सुरों में पली बालिका, संघर्ष में बनी स्वर-साधिका : लता मंगेशकर का जन्म ऐसे संस्कारसमृद्ध परिवार में हुआ था, जहां संगीत केवल कला नहीं, जीवन की सहज साधना था। घर का वातावरण शास्त्रीय संगीत और रंगमंच की सुरमयी आभा से अनुप्राणित रहता था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायन के प्रकांड विद्वान, संगीतकार और प्रतिष्ठित रंगमंचीय कलाकार थे। बाल्यावस्था से ही लता के कानों में राग-रागिनियों की मधुर तानें गूंजती रही और उन्हीं सुरों ने उनके भीतर संगीत के प्रति गहरी अनुरक्ति जगाई किंतु प्रतिभा की इस कोमल कली को नियति ने आरंभ से ही कठोर परिस्थितियों की धूप में तपाया। मात्र 13 वर्ष की आयु में वर्ष 1942 में पिता के निधन ने परिवार को गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण परिवार की जिम्मेदारियों का भार उनके नन्हे कंधों पर आ गया। जीवनयापन के लिए उन्होंने बाल कलाकार के रूप में नाटकों तथा मराठी-हिंदी फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभाई लेकिन अभिनय उनके अंतर्मन की मंजिल नहीं था। उनका हृदय तो केवल सुरों की साधना में रमा था।
संघर्ष की तपिश से सुरों के स्वर्णिम शिखर तक : उस दौर में पार्श्वगायन का आकाश नूरजहां और शमशाद बेगम जैसी बुलंद, दमदार और गूंजदार आवाजों से आलोकित था। ऐसे समय में जब लता मंगेशकर ने अपनी पतली, कोमल, पारदर्शी और रेशमी आवाज के साथ फिल्म संगीत की दुनिया में प्रवेश किया तो अनेक संगीतकारों को उनका स्वर तत्कालीन प्रचलन के अनुरूप नहीं लगा। कई बार उनकी आवाज को अत्यधिक महीन और नाजुक मानकर अवसर से वंचित किया गया किंतु इन अस्वीकृतियों ने लता के संकल्प को कमजोर करने के बजाय उनकी साधना को और प्रखर किया। उन्होंने शास्त्रीय संगीत का कठोर रियाज जारी रखा और अपनी आवाज को निरंतर परिष्कृत करती रही। फिर 1949 में प्रदर्शित खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘महल’ का गीत ‘आएगा आने वाला’ उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनकर आया। गीत की रहस्यमयी प्रस्तुति और लता के स्वच्छ, विलक्षण स्वर ने संगीत-जगत को चमत्कृत कर दिया। उसके बाद 1950 और 1960 के दशक उनके उत्कर्ष के स्वर्णिम अध्याय बने। नौशाद, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, सलिल चौधरी, रोशन तथा कल्याणजी-आनंदजी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ उन्होंने असंख्य अमर धुनों को अपनी आवाज से कालजयी बना दिया। लता जी ने 30 हजार से अधिक गीत गाए और 36 से भी अधिक भाषाओं में अपनी आवाज का जादू बिखेरा।
हर नायिका की धड़कन बन जाता था लता का स्वर : लता मंगेशकर की गायकी का सबसे अद्भुत पक्ष यह था कि वे केवल शब्दों और धुनों को स्वर नहीं देती थी बल्कि जिस चरित्र के लिए गाती थी, उसकी मन:स्थिति को अपने कंठ में आत्मसात कर लेती थी। उनके स्वर में अभिनेत्री का चेहरा, भाव और व्यक्तित्व जैसे स्वत: आकार लेने लगता था। 1950 के दशक में ‘बरसात’ और ‘आवारा’ जैसी फिल्मों में नर्गिस की मासूमियत, कोमलता और भावुकता को लता के पारदर्शी स्वरों ने ऐसी अभिव्यक्ति दी कि गीत और चरित्र एकाकार हो गए। मधुबाला के अप्रतिम सौंदर्य और अनारकली की चुनौतीपूर्ण भाव-भूमि को ‘मुगल-ए-आजम’ के ‘प्यार किया तो डरना क्या’ में लता की निर्भीक, बुलंद और भावपूर्ण आवाज ने अमरता प्रदान की। मीना कुमारी की आंखों में बसे विरह, करुणा और मौन वेदना को ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ तथा ‘पाकीजा’ के गीतों में उनके स्वर ने मार्मिक गहराई दी। वहीं ‘संगम’ और ‘ज्वैल थीफ’ जैसी फिल्मों में वैजयंतीमाला के नृत्य-सौंदर्य को लता की चंचल, लयात्मक और सधी हुई गायकी ने अतिरिक्त मोहकता प्रदान की। यही उनकी महानता थी कि हर नायिका के लिए उनकी आवाज अलग व्यक्तित्व ग्रहण कर लेती थी।
सुरों में राष्ट्रभक्ति, सम्मान में राष्ट्र का गौरव : 26 जनवरी 1963 को नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप की रचना और सी. रामचंद्र के संगीत से सजे अमर देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को स्वर दिया। यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को समर्पित था और इसके प्रभाव से श्रोता गहरे भावावेग से भर उठे। कार्यक्रम में उपस्थित तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के भावुक होने का विवरण भी व्यापक रूप से मिलता है। उस प्रस्तुति ने लता मंगेशकर के स्वर को राष्ट्रीय चेतना और सैनिक बलिदान की सामूहिक स्मृति से स्थायी रूप से जोड़ दिया। कला और संगीत के क्षेत्र में उनके विराट योगदान के लिए उन्हें देश-विदेश में अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म भूषण (1969), दादा साहिब फाल्के पुरस्कार (1989), पद्म विभूषण (1999) और भारत रत्न (2001) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले। 2007 में फ्रांस ने उन्हें ऑफिसर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया। इन सम्मानों से भी व्यापक उनकी जनस्वीकृति थी, जिसने उन्हें भारतीय संगीत की अमर सांस्कृतिक पहचान बना दिया।
6 फरवरी 2022 को जब इस महान स्वर-साधिका ने अंतिम सांस ली तो लगा मानो भारतीय संगीत और संस्कृति का एक दीप्तिमान युग मौन हो गया। उनके निधन ने देश ही नहीं, विश्वभर के संगीत-प्रेमियों को शोकाकुल कर दिया किंतु महान कलाकारों की वास्तविक अमरता उनकी भौतिक उपस्थिति में नहीं, उनकी सृजित संवेदनाओं में होती है।  लता जी केवल एक महान पार्श्वगायिका नहीं थी, वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना की जीवंत विरासत थी। संगीत की प्रत्येक धड़कन में उनकी स्मृति और प्रत्येक मधुर स्वर में उनकी अनुगूंज सदैव जीवित रहेगी।

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