समरसता की संस्कृति का विराट उत्सव है जगन्नाथपुरी रथ यात्रा

भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों में जगन्नाथपुरी की रथ यात्रा का अपना एक विशेष महत्व है। यह केवल एक धार्मिक आयोजनभर नहीं है बल्कि भारतीय दर्शन, लोकजीवन, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी जीवंत उत्सव है। वर्ष में एक बार ऐसा अवसर आता है, जब मंदिर के गर्भग्रह में विराजमान भगवान स्वयं बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को ‘भगवान का जनता के बीच आगमन’ भी कहा जाता है। इस वर्ष यह यात्रा 16 जुलाई से शुरु होगी और 24 जुलाई 2026 तक चलने वाले विभिन्न उत्सवों की श्रृंखला का हिस्सा है। 16 जुलाई को भव्य रथ यात्रा निकलेगी, जबकि 24 जुलाई को ‘बहुदा यात्रा’ (वापसी की यात्रा) होगी। बीच में गुंडिचा मंदिर में भगवान का प्रवास तथा अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होंगे। रथ यात्रा दरअसल वह अवसर है जब भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ अपने विशाल लकड़ी के रथों पर सवार होकर जगन्नाथपुरी के मुख्य मंदिर से निकलकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। मान्यता यह है कि गुंडिचा मंदिर उनकी मौसी का घर है। इस दौरान देश-विदेश से आये लाखों श्रद्धालु रथों की रस्सियां खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं और पुण्य कमाते हैं। 
रथ यात्रा के पीछे अनेक धार्मिक मान्यताएं हैं जिनमें सबसे लोकप्रिय मान्यता यह है कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी मौसी के घर जाते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार यह भगवान के अपने भक्तों तक स्वयं पहुंचने का प्रतीक है। जो लोग मंदिर के भीतर दर्शन नहीं कर सकते, वे भी इस दिन भगवान के दर्शन कर सकते हैं। वास्तव में यह संदेश भारतीय संस्कृति के उस मूल विचार की पुष्टि करता है कि ईश्वर किसी एक वर्ग या स्थान तक सीमित नहीं है। ईश्वर सबके हैं और सब जगह है। जगन्नाथपुरी रथ यात्रा के पीछे समरसता और समानता का अद्भुत संदेश छिपा है। क्योंकि रथ यात्रा में जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति आदि का कोई भेद नहीं रहता। लाखों लोग एक साथ रथ खींचते हैं। इसी दौरान यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान ‘छेरा पहंरा’ है, जिसमें गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा बताती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान है। भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि ये परंपरा अत्यंत प्रेरणादायक मानी जाती है। रथ यात्रा में निकलने वाले तीनों रथ अपनी-अपनी बनावट और पहचान के कारण भी अद्वितीय हैं। जिस रथ में भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं, उसे नंदीघोष कहते हैं और इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है। दूसरे रथ का नाम ताल ध्वज है। जिस पर भगवान बलभद्र सवार होते हैं। जबकि तीसरा रथ जिस पर देवी सुभद्रा सवार होती हैं, उसे दर्पदलन या देवदलन कहते हैं। हर वर्ष इन रथों का निर्माण नई लकड़ी से किया जाता है। इस दौरान सैकड़ों पारंपरिक कारीगर जो पीढ़ियों से इस काम को करते आ रहे हैं, उन्हें नये सिरे से काम मिलता है। रथ बनने के बाद पुरानी लकड़ी का पुन: उपयोग नहीं किया जाता है, जिससे इस परंपरा की पवित्रता बनी रहती है। रथ यात्रा के पहले दिन होने वाली ‘पहंडी’ परंपरा अत्यंत आकर्षक होती है। इसमें भगवान की प्रतिमाओं को झूलते हुए विशेष शैली में गर्भग्रह से बाहर लाया जाता है। इस दौरान ढोल, मृदंग, शंख और जयघोष के बीच यह दृश्य भक्तों को भावविभोर कर देता है। पुरी की रथ यात्रा भारत की लोककला, संगीत, नृत्य, शिल्प और पारंपरिक स्थापना का भी महोत्सव है। ओड़िसा की लोकसंस्कृति, हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र, महाप्रसाद, लोकवाद्य और भक्ति संगीत इस दौरान अपने चरम पर दिखाई देते हैं। यह उत्सव पुरी शहर की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया भी होता है। इस दौरान शहर में देश-विदेश के लाखों पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो स्थानीय होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और छोटे व्यापारियों की सालभर की कमाई का जरिया होते हैं। पुरी की रथ यात्रा इस कदर पूरी दुनिया में लोकप्रिय है कि आज पुरी की रथ यात्रा दुनिया के कई शहरों में इसकी प्रतिकृति के रूप में निकलती है, जिसमें लंदन, न्यूयार्क, सिडनी, मास्को और टोरंटो जैसे दुनिया के तमाम बड़े और आधुनिक शहर शामिल हैं। इसके जरिये भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रसार होता है। आज अनेक विदेशी जिनका हिंदी धर्म से भले कोई रिश्ता न हो, वो भी इस यात्रा को पूरे मनोयोग और उल्लास के साथ लेते हैं। 

#समरसता की संस्कृति का विराट उत्सव है जगन्नाथपुरी रथ यात्रा