पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों के बीच फिर युद्ध के बादल

विश्व व्यवस्था का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब पश्चिम एशिया अशांत हुआ है, तब-तब उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी है। आज एक बार फिर यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, इज़राइल-ईरान संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर मंडराते खतरे और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते हमलों ने वैश्विक समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। हाल के घटनाक्रमों में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी जवाबी कार्रवाई तथा अमरीका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया अभी भी स्थायी शांति से बहुत दूर है। यह केवल दो देशों का टकराव नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में यह आवश्यक हो जाता है कि इस पूरे संकट को उसके ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संदर्भों में समझा जाए।
पश्चिम एशिया सदियों से सभ्यताओं का संगम रहा है। यही क्षेत्र विश्व के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों का केंद्र भी है। ईरान, इराक, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, इज़राइल और अन्य खाड़ी देशों की सामरिक स्थिति उन्हें वैश्विक राजनीति का केंद्र बना देती है। यही कारण है कि अमरीका, रूस, चीन और यूरोपीय देशों की विदेश नीति में पश्चिम एशिया हमेशा विशेष स्थान रखता है। ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद, धार्मिक मतभेद तथा क्षेत्रीय प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा इस क्षेत्र को लगातार अस्थिर बनाए रखती है। आज का संकट भी इन्हीं जटिल परिस्थितियों की उपज है।
अमरीका और ईरान के संबंध 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमरीका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध, पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा और इज़राइल के प्रति दोनों देशों की विपरीत नीतियां समय-समय पर संघर्ष का कारण बनती रही हैं। यद्यपि कई बार वार्ता और समझौतों के माध्यम से तनाव कम करने का प्रयास किया गया, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका। वर्तमान घटनाक्रम इसी लंबे संघर्ष का नया अध्याय है, जिसने पूरे क्षेत्र को फिर से अस्थिरता की ओर धकेल दिया है।
हालिया घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष युद्ध से बचना चाहते हैं, लेकिन अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन भी जारी रखना चाहते हैं। ईरान द्वारा अमरीकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाना और अमरीका द्वारा उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करना इस बात का संकेत है कि अविश्वास की खाई पहले से कहीं अधिक गहरी हो चुकी है। यदि यह संघर्ष और आगे बढ़ता है तो इसमें इज़राइल, हिज़्बुल्लाह, हूती विद्रोही तथा अन्य क्षेत्रीय संगठन भी सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहेगा, बल्कि पूरा पश्चिम एशिया व्यापक युद्ध की चपेट में आ सकता है। पश्चिम एशिया के संकट का सबसे संवेदनशील पक्ष होर्मुज जलडमरूमध्य है। विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से का परिवहन इसी रास्ते से होता है। यदि किसी कारण से यह मार्ग बंद होता है या जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल की आपूर्ति बाधित हो जाएगी। परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ेंगी। इसका प्रभाव केवल तेल उत्पादक देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा आयात करने वाले सभी देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। इसलिए होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा आज वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ते ही सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाज़ारों में अस्थिरता दिखाई देती है। निवेशक जोखिम वाले क्षेत्रों से पूंजी निकालने लगते हैं, जिससे शेयर बाज़ारों में गिरावट आती है। तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से परिवहन महंगा हो जाता है। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि होती है। महंगाई का दबाव बढ़ने से आम नागरिक की क्रय शक्ति घटती है। विकासशील देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित होती है और सरकारों के सामने राजकोषीय संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया का कोई भी संकट वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन जाता है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल एक पड़ोसी क्षेत्र नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग इसी क्षेत्र से आयात करता है। यदि तेल की कीमतों में वृद्धि होती है, तो इसका सीधा प्रभाव पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस, परिवहन, कृषि और उद्योगों पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। इसके अतिरिक्त खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं। यदि युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उनकी सुरक्षा, रोज़गार और भारत को भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारतीय निर्यात और समुद्री व्यापार भी प्रभावित होंगे। इसलिए भारत के लिए यह संकट केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आज विश्व अर्थव्यवस्था वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर आधारित है। पश्चिम एशिया से होकर गुज़रने वाले समुद्री मार्ग एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ते हैं। यदि इन मार्गों पर असुरक्षा बढ़ती है, तो जहाज़ों की आवाजाही धीमी हो जाती है, बीमा लागत बढ़ जाती है और माल ढुलाई महंगी हो जाती है। इसका प्रभाव खाद्यान्न, उर्वरक, मशीनरी, दवाइयों तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है। इस प्रकार एक क्षेत्रीय संघर्ष पूरी दुनिया के व्यापारिक तंत्र को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता युद्ध नहीं, बल्कि संवाद की होती है।
पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता आज केवल क्षेत्रीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है। अमरीका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, इज़राइल-ईरान संघर्ष, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और समुद्री व्यापार पर मंडराता खतरा पूरी दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है क्योंकि उनकी आर्थिक प्रगति वैश्विक स्थिरता से जुड़ी हुई है। इसलिए समय की मांग है कि शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर संवाद, प्रतिशोध के स्थान पर विश्वास और युद्ध के स्थान पर शांति को प्राथमिकता दी जाए। पश्चिम एशिया में शांति की स्थापना केवल उस क्षेत्र की आवश्यकता नहीं, बल्कि पूरे विश्व की साझा ज़िम्मेदारी है। (एजेंसी)

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