भारत की जनसंख्या : सबसे बड़ी ताकत या चुनौती
आज विश्व जनसंख्या दिवस विशेष
प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। हर साल यह दिन दुनिया की बढ़ती आबादी के आंकड़ों की चर्चा का अवसर बनता है, लेकिन भारत के लिए इसका महत्व इससे कहीं अधिक है। यह केवल जनसंख्या गिनने का दिन नहीं बल्कि यह सोचने का अवसर है कि क्या देश अपनी सबसे बड़ी मानव पूंजी को विकास की ताकत बना पाएगा या यही आबादी भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगी। भारत आज लगभग 148 करोड़ लोगों के साथ दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। एक वर्ग इसे देश की सबसे बड़ी शक्ति मानता है, जबकि दूसरा इसे बेरोज़गारी, संसाधनों पर बढ़ते दबाव और सामाजिक असमानता की वजह मानता है। सच यह है कि आबादी अपने आप में न ताकत होती है और न बोझ। उसकी दिशा शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोज़गार तय करते हैं।किसी भी देश की वास्तविक ताकत उसके नागरिकों की गुणवत्ता से तय होती है। यदि लोग शिक्षित, स्वस्थ और कुशल हैं तो बड़ी आबादी आर्थिक विकास का इंजन बन जाती है, लेकिन कमज़ोर शिक्षा, सीमित रोज़गार और खराब स्वास्थ्य व्यवस्था उसी आबादी को विकास में बाधा बना देती है।
चीन ने दशकों तक प्रशिक्षित कार्यबल के दम पर दुनिया की फैक्टरी बनने का गौरव हासिल किया, लेकिन आज वहां तेज़ी से बढ़ती वृद्ध आबादी नई चुनौती बन गई है। जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों में भी श्रमिकों की संख्या घट रही है। भारत की स्थिति अलग है। यहां औसत आयु लगभग 29 वर्ष है और करीब 65 प्रतिशत आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। हमारे लिए यह जनसांख्यिकीय लाभांश है लेकिन यह अवसर स्थायी नहीं है। यदि आने वाले वर्षों में शिक्षा, कौशल और रोज़गार पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ तो यही लाभांश भविष्य में आर्थिक और सामाजिक दबाव में बदल सकता है।
भारत केवल आबादी के लिहाज से बड़ा नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे आकर्षक उपभोक्ता बाज़ारों में भी शामिल है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा, हेल्थकेयर, इलेक्ट्रिक वाहन और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में करोड़ों संभावित ग्राहक मौजूद हैं। यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां भारत को अगले दो दशकों का सबसे महत्वपूर्ण बाज़ार मान रही हैं। डिजिटल इंडिया और यूपीआई जैसी पहलों ने इस क्षमता को नई गति दी है। इंटरनेट गांवों तक पहुंचा है, डिजिटल भुगतान आम हो चुका है और स्टार्टअप संस्कृति ने युवाओं के लिए नए अवसर खोले हैं। इन उपलब्धियों के बावजूद एक बड़ी चुनौती सामने है। हर साल लाखों युवा रोज़गार बाज़ार में प्रवेश करते हैं, लेकिन उद्योगों को योग्य कर्मचारी नहीं मिलते और युवाओं को उनकी क्षमता के अनुरूप रोज़गार नहीं मिलता। समस्या केवल नौकरियों की संख्या नहीं, बल्कि रोज़गार योग्य कौशल की भी है। यहीं सरकार की नीतियों की असली परीक्षा शुरू होती है। पिछले एक दशक में नई शिक्षा नीति, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और आयुष्मान भारत जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की गईं। इनसे नए अवसर ज़रूर बने हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं।
इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था अनिवार्य है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने लाखों परिवारों को राहत दी है, लेकिन ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं, डॉक्टरों की उपलब्धता, कुपोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियां अभी भी गंभीर हैं। इसी तरह महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाए बिना भारत अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर सकता। यदि अधिक महिलाएं शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता और नेतृत्व से जुड़ें तो देश की आर्थिक वृद्धि को नई गति मिल सकती है।
बढ़ती आबादी का असर जल, भूमि, आवास, प्रदूषण और कचरा प्रबंधन जैसी चुनौतियों पर साफ दिखाई देता है। जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं को और गंभीर बना रहा है। इसलिए सतत विकास अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जनसंख्या प्रबंधन का भी अहम हिस्सा बन चुका है। भारत के पास बड़ा घरेलू बाज़ार और युवा कार्यबल है। यदि सही नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन पर ज़ोर दिया जाए तो उसकी संभावनाएं कहीं अधिक व्यापक हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर किसी भी देश को केवल एक बार मिलता है। भारत के लिए अगले 20 से 25 वर्ष निर्णायक हैं। यही समय तय करेगा कि देश विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में पहुंचेगा या मध्यम आय वाले देशों के जाल में फंस जाएगा। इसलिए अब केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल, रोज़गार, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, विनिर्माण और तकनीकी नवाचार में तेज़ और ठोस परिणाम देने होंगे। 148 करोड़ की आबादी न उपलब्धि है और न समस्या। असली सवाल यह है कि इन लोगों में कितने शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और उत्पादक हैं। यदि भारत अपनी मानव पूंजी में सही निवेश करता है तो यही आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत बनेगी, लेकिन यदि यह अवसर चूक गया तो यही संख्या भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती भी साबित हो सकती है। (युवराज)



